आपदा ने हमें पाषाणकाल में पटक दिया


केशव भट्ट
July 12, 2018

उत्तराखंड के बद्रीनाथ धाम के नीलकंठ बेस कैंप के साथ ही तुंगनाथ में इस बार यात्रा तो रही लेकिन आपदा के हालातों को देख मन उदास सा रहा. मानवीय हस्तक्षेपों से लगा प्रकृति भी रो रही है और अपना गुस्सा भी निकालते रहती है.
जून 2013 को आपदा ने गढ़वाल और कुमाउं में भारी कहर बरपा किया था. पांच साल बीत जाने के बाद भी आपदा के जख्म अभी भी हरे ही हैं. लोग आज तक कर्ज में डूबे हुए हैं. सिस्टम से थकहार कर लोग अब खुद ही खड़े हो रहे हैं. आपदा से पहले की खुशहाल जिंदगी को जब भी वो याद करते हैं तो उनकी आॅंखें नम हो ही जाती हैं.
बद्रीनाथ में पर्वतारोही मित्र विमल पंवार उर्फ गुडडू से इस बार मिलना हुवा. बद्रीनाथ में पहुंचते ही बस अड्डे से पहले सड़क के दाहिने ओर करीब सौ मीटर की पैदल दूरी पर ‘नागनी हिल्स’ में एक खूबसूरत रिसोर्ट है ‘बद्री विला’. बाहर से बांस की आकर्षक नक्काशी और अंदर से गर्म कमरे. हर जरूरत को ध्यान में रखा गया है. विमल पर्वतारोहण में पारंगत हैं. नेहरू पर्वतारोहण संस्थान उत्तरकाशी से बेसिक, एडवांस, सर्च एंड रैस्क्यू का कोर्स किए हैं. ‘नागनी हिल्स’ के शीर्ष में कुबेर बामक से कंचन गंगा का उदगम होता है. ‘नागनी हिल्स’ के बारे में कहा जाता है यहां देवताओं का निवास है.
बच्चे कई सालों से ट्रैकिंग की जिद्व करते आ रहे थे तो उन्हें एक छोटा ट्रैक कराने का मन बनाया. ताकि वो कम परेशानी में थोड़ा बहुत ट्रैकिंग के साथ ही हिमालय को समझ सकें. इसके लिए बद्रीनाथ में नीलकंठ बेस कैम्प ही उचित जान पड़ा. बद्रीनाथ से करीब छह किलोमीटर की हल्की चढ़ाई लिए हुए पैदल दूरी पर करीब 3758 मीटर की उंचाई पर है नीलकंठ बेस कैम्प. हांलाकि बद्रीनाथ में माणा गांव से आगे वसुधारा, सतोपंथ ट्रैक भी है. बच्चों के हिसाब से सतोपंथ लंबा ट्रैक लगा और वसुधारा फिर कभी जाएंगे सोच नीलकंठ बेस कैम्प का ही फाइनल कर दिया. गुडडू भाई से फोन में बमुश्किल आने की बात हो गई थी. बीएसएनएल और एयरटेल की आधी—अधूरी सेवा रहती है. नेट को तो यहां भूल जाना हुवा, फोन मिल जाए और साफ बात हो जाए वो ही गनीमत समझो. केदारनाथ के भक्त अंबानी ने केदारघाटी में अच्छी हैल्लो—हाय करवा रखी है, यहां बद्रीनाराण से सायद उनकी कम पटती होगी तभी तो यहां के वाशिंदों को वो ‘जिओ’ नहीं कह रहे हैं.
बागेश्वर से ग्वालदम, कर्णप्रयाग, चमोली, जोशीमठ होते हुए बद्रीनाथ पहुंचने तक शाम घिरने लगी थी. यहां की उंचाई करीब 3000 मीटर है. गुडडू भाई रोडवेज बस अड्डे के बगल में ही मिल गए. उनके रिसोर्ट में पहुंचते ही दिल खुश हो गया. सामान रख बद्रीनाथ मंदिर और बाजार की परिक्रमा पर आपस में राय बन गई. और फिर हम 850 मीटर की उंचाई से 3000 मीटर की उंचाई पर आ चुके थे तो एक्लमटाइजेशन होना भी जरूरी था. आराम करने से सर दर्द सहित अन्य बीमारियों के होने का भी खतरा हो जाता है. बस अड्डे के किनारे से मंदिर को रास्ता है. इसी से होते हुए चलते गए. आगे धीरे—धीरे छोटी दुकानें चाय, भोजन, प्रसाद की शुरू होने लगी. अलकनंदा नदी पर बने पैदल पुल से होते हुए पार पहुंचे. अलकनंदा नदी अल्कापूरी ग्लेशियर से तथा सरस्वती नदी देवताल से निकलती है. ये दोनों नदियां माणा में केशव प्रयाग में मिलती हैं. सरस्वती के बारे में कहा जाता है कि ये संगम के पास लुप्त हो जाती है.
बद्रीनाथ मंदिर की स्थापना की कई किवदंतियां हैं. कहा जाता है कि आदि शंकराचार्य अपने 109 शिष्यों के साथ जोशीमठ आये तथा अपने चार सर्वाधिक विद्वान शिष्यों को चार मठ, बदरिकाश्रम, शृंगेरी पीठ, द्वारिका पीठ और शारदा पीठ की गद्दी पर आसीन कर पूरे देश को सांस्कृतिक, धार्मिक, दार्शनिक, आध्यात्मिक तथा भौगोलिक एकता के सूत्र में बाँध दिया. इन मठों के प्रबंधक तथा गद्दी के अधिकारी ‘शंकराचार्य’ कहे जाते हैं. उनके शिष्य ट्रोटकाचार्य इस प्रकार ज्योतिर्मठ के प्रथम शंकराचार्य हुए. जोशीमठ वासियों में से कई उस समय के अपने पूर्वजों की संतान मानते हैं जब दक्षिण भारत से कई नंबूद्रि ब्राह्मण परिवार यहां आकर बस गए तथा यहां के लोगों के साथ शादी-विवाह रचा लिया. जोशीमठ के लोग परंपरागत तौर से पुजारी और साधु थे जो बहुसंख्यक प्राचीन एवं उपास्य मंदिरों में कार्यरत थे तथा वेदों एवं संस्कृत के विद्वान थे. नरसिंह और वासुदेव मंदिरों के पुजारी परंपरागत डिमरी लोग हैं. नंबूद्रि पुजारियों को बिठाने के समय से ही जोशीमठ बद्रीनाथ के सर्दियों का स्थान रहा है. सर्दियों के छह महीनों के दौरान जब बद्रीनाथ मंदिर बर्फ से ढंका होता है तब भगवान विष्णु की पूजा जोशीमठ के नरसिंह मंदिर में ही होती है. बद्रीनाथ के रावल मंदिर कर्मचारियों के साथ जाड़े में जोशीमठ में ही तब तक रहते हैं जब कि मंदिर का कपाट जाड़े के बाद नहीं खुल जाता.
बहरहाल! वर्तमान में बद्रीनाथ मंदिर के रास्ते में दोनों ओर मंदिर के आंगन तक प्रसाद वाली दुकानों की भरमार है. हजारों की संख्या में श्रद्वालुओं का मंदिर में तांता लगा दिखा. बीमार, बूढ़े श्रद्वालुओं को नेपाली मजदूर पीठ में लगी अपनी कंडी में ढोते हुए आते—जाते दिख रहे थे. कुछ श्रद्वालु फेसबुक पर लाइव अपडेट देने में लगे थे. मुख्य द्वार से मंदिर के अंदर दर्शनों के लिए सैकड़ों की तादात में लाईन में लगे कुछ श्रद्वालुओं में सैल्फी लेने की होड़ लगी थी. एक जगह दीवार में लगे बोर्ड में पूजा—पाठ के रेट लिस्ट लिखी थी. रू.151 की साधारण पूजा से लेकर दिन भर की पूजा के रू. 11700 तथा सप्ताह पाठ के रू. 35101 की दरें तय की गई हैं.

प्राचीन शैली में बना करीब 15 मीटर ऊँचा भगवान विष्णु का यह मंदिर भव्य व विशाल लगा. लेकिन मंदिर के चारों ओर बन चुकी बाखलियों ने मंदिर की भव्यता कुछ कम कर दी है. मंदिर के दर्शन प्रात: करने थे इसलिए कुछ देर ठहर कर यहां से नीचे तप्तकुंड के रास्ते पार को निकल गए. तप्तकुंड में श्रद्वालु डुबकियां लगाने में मग्न थे. कुंड और आसपास की जगहों से आ रही टनों गंदगी का भी संगम नीचे अलकनंदा में हो रहा था. भारत सेवा आश्रम का छएक मंजिला भवन जो की अस्पताल के नाम बनाया गया था अब होटल बनके रह गया है. भारत सेवार्थ समेत देश के अधिकांश राज्यों की धर्मशालाओं व होटलों का शिविर भी बर्फबारी के दौरान पाईपों के टूटने पर अलकनंदा में समाते रहता है. ये लोग पहुंच वाले हैं जिस वजह से इन्हें कोई कुछ नहीं कहता. कभी कभार गांव वाले लठ्ठ लेकर आते हैं तो हंगामा होने के बाद ही ये लोग शिविर के पाइपों को ठीक करते हैं. वैसे बद्रीनाथ में गंगा प्रदूषण का आॅफिस भी है लेकिन वो भी इनसे दक्षिणा पाकर अपनी आॅंखें बंद कर प्रभु भक्ति में मगन रहते हैं.
अंधेरा घिर आया था. मार्ग में दोनों ओर जगमग करती दुकानों से होते हुए माणा रोड़ में पहुंचे. बद्रीनाथ के पीछे नीलकंठ चोटी अपनी चमक बिखेरती दिखी. यहां ठंड मीठी जैसी लग रही थी. बद्री विला में पहुंचे तो रात्रि भोजन डायनिंग हॉल में किया. गुडडू भाई अपने इस रिसोर्ट में ये नियम बनाया है कि नाश्ता—भोजन डायनिंग हॉल में होगा, रूम में नहीं. दरअसल इसके पीछे कारण यही लगा कि इस रिसोर्ट में जो कमरे हैं वो फाईव स्टार के कमरों से भी ज्यादा साफ—सुथरे और सहुलियत वाले हैं. हर चीज का ध्यान रखा गया है. बकायदा आपकी सेवा के लिए दो जोड़े बाथरूम स्लीपर भी रखे गए हैं. रूम में सर्विस होने पर कमरों की हालत पतली होने की आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता है. अकसर होटलों में रूकने वाले कभी रिसोर्ट में रूके तो वो उसे भी होटल की तरह ही ले लेते हुए अपने मयखाने का दरबार सजा ही लेते हैं. और कमरे में भोजन आने पर वो भोजन उनके पेट में कम कमरे में इधर—उधर ज्यादा बिखर जाने वाला हुवा.
सुबह तक गुडडू भाई ने हमारे ट्रैक के लिए टैंट व थोड़ा सामान ले जाने के लिए एक नेपाली पोर्टर शेरबहादुर को तय करवा दिया. हम सभी बद्रीनाथ मंदिर के दर्शनों को चले तो गुडडू भाई ने बदरीश पूजा भंडार का एक कार्ड देते हुए हमें समझाया कि ये दुकान वाले राधाकृष्णा भट्ट हैं, इनके वहीं जूता—चप्पल रख देना और ये ही मंदिर के अंदर दर्शनों की व्यवस्था करवा देंगे. राधाकृष्णा भट्ट की दुकान में पहुंचे तो उन्हें गुडडू भाई का संदेश दिया. उन्होंने हमें गेट नंबर दो से अंदर जाकर पंडित रविजी से मिलने को कहा. मंदिर में दर्शनों के लिए हजारों श्रद्वालुओं की भीड़ थी. गेट नंबर दो में पहुंचे तो वहां भी भीड़ की एक लंबी लाइन दिखी. बद्रीनाथ मंदिर तीन भागों में विभाजित है, गर्भगृह, दर्शनमण्डप और सभामण्डप. मंदिर में तीन गेट हैं. सिंह द्वार, कुबेर गली और वीआईपी गेट. नंबर दो गेट कुबेर गली है जहां से हर दसेक मिनट में चढ़ावे से भरे बक्से बाहर को आते दिखे. बमुश्किल पंडित रविजी से मिलना हुवा तो उन्हें संदेश दिया. वो हमें अपने पीछे वीआईपी दीर्घा को पार कराते हुए अंदर ले गए और सीधे विष्णुजी के आगे दर्शनों के लिए बिठा दिया. माईक पर वहां विराजमान पंडितजी ने बताया कि यहां भगवान विष्णु ध्यान मग्न मुद्रा में सुशोभित हैं. जिसके दाहिने ओर कुबेर लक्ष्मी और नारायण की मूर्तियां है. बद्रीनाथ धाम में श्री बदरीनारायण भगवान के पांच स्वरूपों की पूजा अर्चना होती है. विष्णु के इन पांच रूपों को ‘पंच बद्री’ के नाम से जाना जाता है. बद्रीनाथ के मुख्य मंदिर के अलावा अन्य चार बद्रियों के मंदिर भी यहां स्थापित है. श्री विशाल बद्री पंच बद्रियों में से मुख्य है. मंदिर परिसर में 15 मूर्तियां है, इनमें सब से प्रमुख है भगवान विष्णु की एक मीटर ऊंची काले पत्थर की प्रतिमा. मन्दिर में नर-नारायण विग्रह की पूजा होती है और अखण्ड दीप जलता है.
बद्रीनाथ मंदिर में वनतुलसी की माला, चने की कच्ची दाल, गिरी का गोला और मिश्री आदि का प्रसाद चढ़ाया जाता है. दर्शन के बाद पंडित रविजी और राधाकृष्णा भट्ट का आभार व्यक्त कर हम सभी वापस रिसोर्ट में पहुंचे. नाश्ता करते वक्त गुडडू भाई से बद्रीनाथ के बारे में बातचीत में मालूम हुवा कि, पंवार, भंडारी, और मेहता की दो जातियां हर साल पगड़ी लेती हैं, जिसेमें भंडारी लोगों को घंटाकरण, पंवार लोगों को भोगमंडी तथा मेहता लोगों को आरती के चढ़ावे का हिस्सा मिलता है. भोग में चावल और दाल का चढ़ावा होता है. पंवार जाति को भोग में से दो बंटा मिलता था. पैदल यात्रा के जमाने में सिंह द्वार के नीचे चंदन की एक लकड़ी होती थी, उसके नीचे से झुककर श्रद्वालु जाता था और वो अंदर जाने के लिए एक आना कर देता था जो कि पंवार जाति का होता था.
बद्रिनाथ मंदिर में रात दस बजे से सुबह चार बजे तक एक समिति का और एक बामणी पांडुकेश्वर गांव का ताला लगता है. सुबह चार बजे मंदिर की घंटी जब बजती है तो वो एक तरह से अलार्म का ही काम करती है. मान्यता है कि सुबह अभिषेक के वक्त भगवान बद्रीनाथजी यहां रहते हैं. शीतकाल में पांडुकेश्वर में बद्रीनाथ की पूजा होती है.
अपने बचपन के दिनों को याद करते हुए गुडडू भाई ने बताया कि बद्रीनाथ के बगल में बामणी गांव के पुराने रास्ते में पहले उनकी भी दुकानें थी. कहा जाता है कि भगवान विष्णु के तप से उनकी जंघा से एक अप्सरा उत्पन्न हुई जो उर्वशी नाम से विख्यात हुई. बदरीनाथ कस्बे के समीप ही बामणी गाँव में उनका मंदिर है. तब अलकनंदा के इधर सब बंजर था. पैदल यात्री इन दुकानों में ही रूकते थे. भोजन वहीं करने के बाद रात में रूकना फ्री में हो जाता था. कंचन गंगा पर मुख्य बाजार होती थी. वहां से नंगे पैर जाते थे. 1962 में चीन के आक्रमण के बाद जब यहां सड़क बनी तो गढ़वाल मंडल की चोंच जैसी मुंह वाली बसें इस कच्ची रोड से बद्रीनाथ में गड़िया ढलान में खड़ी होती थी. तब पांडुकेश्वर से वनवे रास्ता था.
बद्रीनाथ के पुजारी शंकराचार्य के वंशज होते हैं जो रावल कहलाते हैं. मंदिर में वरिष्ठ और कनिष्ठ दो पुजारी होते हैं. इन्हें केरल के नम्बूदरीपाद ब्राह्मण परिवार से ही चुना जाता है. यह जब तक रावल के पद पर रहते हैं इन्हें ब्रह्मचर्य का पालन करना होता है. रावल के लिए स्त्रियों का स्पर्श भी पाप माना जाता है. पुराणों में बताया गया है कि बद्रीनाथ में हर युग में बड़ा परिवर्तन होते रहेगा. सतयुग तक यहां पर हर व्यक्ति को भगवान विष्णु के साक्षात दर्शन हुआ करते थे. त्रेता में यहां देवताओं और साधुओं को भगवान के साक्षात् दर्शन मिलते थे. द्वापर में जब भगवान श्री कृष्ण रूप में अवतार लेने वाले थे उस समय भगवान ने यह नियम बनाया कि अब से यहां मनुष्यों को उनके विग्रह के दर्शन होंगे. तब से भगवान के उस विग्रह के दर्शन प्राप्त होते हैं.
‘क्या यहां गुफाओं में साधू—सन्यासी रहते हैं कहीं दूर..’ मेरे ये पूछने पर गुडडू भाई ने बताया कि पहले बताते हैं कि थोलिंग मठ से कोई बौद्व आए थे, कुछ समय रहे फिर चले गए. और सुंदरवन में एक नेपाली माई भी रही काफी समय. अब तो यहां साधू—सन्यासी कम ‘डंठ’ ज्यादा हैं.. डंठ.. उनकी नजर तो बस पैंसे वालों पर ही लगी रहती है.
गडडू भाई के पास यहां के इतिहास का खजाना भरा पड़ा देख उनसे ट्रैक से वापस आने के बाद फुरसत से बातचीत का वादा ले हम नीलकंठ बेस कैम्प को चल पड़े. अल्कनंदा के पार बामणी गांव से हल्की चढ़ाई लिए हुए रास्ता है. करीब दोएक किलोमीटर के बाद दाहिनी ओर कुछ श्रद्वालु पूजा में तल्लीन दिखे. यह जगह चरण पादुका थी. एक शिला पर पांव का आकार उभरा था जिसे कि भगवान विष्णु का बताया जा रहा था. चरणपादुका मे कोई मन्दिर नही है बस एक खुले में एक चट्टान पर कुछ पद्दचिन्ह बने है जिन्हे भगवान विष्णु के पदचिन्ह कहा गया है. एक साधु वहां बताने में लगे थे कि भगवान विष्णु ने धरती पर सबसे पहले यही पर पैर रखा था.
नीलकंठ ग्लेशियर से निकलने वाली नदी ऋषि गंगा के हल्की चढ़ाई वाले रास्ते की ओर हम धीरे—धीरे चलते रहे. आसमान में बादल तो घाटी में कोहरे की लुकाछिपी चल रही थी. ऋषि गंगा के पार हरे मैदान में ही नीलकंठ बेस कैम्प है. नदी में एक विशाल पत्थर वर्षों से पुल का काम कर रहा है. नदी इसके नीचे से गर्जना करते हुए निकल जाती है. हरे मैदान के बगल में कुछ छानियां/झोपड़ियां भी दिखी. मैदान में टैंट लगाने शुरू किए तो झोपड़ियों से निकल कुछ महिलाएं और बच्चे बद्रीनाथ को जाने की तैंयारी करने लगे. शेरबहादुर ने बताया कि यहां बेस कैम्प में हर रोज गांव वाले सुबह कीड़ाजड़ी की खोज में आते हैं और शाम को वापस लौट जाते हैं. टैंट लगने तक कोहरे ने सभी को अपने आगोश में ले लिया. अंधेरा घिर आया था. घड़ी यहां की उंचाई 3758 मीटर बता रही थी. दो टैंटों में हम सभी ने अपना सामान सैट कर लिया और भोजन बनाने की जुगुत में लग गए. दाल और चावल का स्वाद लेने के बाद सभी अपने—अपने स्लीपिंग बैगों में घुस गए. तापमान जीरो से नीचे खिसकना शुरू हो गया था.
सुबह मौसम ने करवट बदल ली और रिमझिम बारिश शुरू हो गई. आगे ग्लेशियर के पास तक जाना इस बारिश में संभव नहीं जान पड़ा तो वापसी की तैंयारी करनी शुरू कर दी. नाश्ते के बाद टैंटों को समेट हम धीरे—धीरे नीचे को उतरने लगे. रास्ते में कुछ श्रद्वालु मिले जो कि नील कमल फूलों के लिए ग्लेशियर तक जाना चाह रहे थे. जब उन्हें बताया कि अभी वहां फूल नहीं हैं और उप्पर बारिश भी तेज है तो वो भी वापस हो लिए. बद्रीनाथ पहुंचे तो रिमझिम बारिश भी अब तेज हो गई. घंटेभर बरसने के बाद बादल थमे.
शेर बहादुर दस साल से यहां बद्रीनाथ में काम कर रहा है. वो छह माह बद्रीनाथ में सीजन में काम करता है और फिर छह माह अपने घर नेपाल चला जाता है. यहां वो अपनी कंडी में बूढ़े, बीमार श्रद्वालुओं को मंदिर तक पहुंचाने और वापस लाने का काम करता है. बस स्टेशन से चार सौ से लेकर छह सौ रूपये तक कंडी ढोने वाले ले लेते हैं. यह कंडी दो साल तक चलती है. उसे विदा कर हम बद्री विला में पहुंचे तो गुडडू भाई इंतजार करते मिले. भोजन करने के बाद मैं गुडडू भाई साथ गपियाने बैठ गया. आपदा ने उनके जैसे हजारों परिवारों पर जो कहर बरफाया उसे सुन मैं नि:शब्द सा रह गया.
आपदा की मार से वो धीरे—धीरे खुद के प्रयास से उबरने की कोशिश कर रहे थे. आपदा ने उनका सब कुछ छीन लिया. अपने में सा डूबे वो आपदा के बारे में बताते चले गए.
‘वर्ष 2013 का वो जून का महीना था. तारिख 16. बारिश लगातार हो रही थी. शाम को बारिश थोड़ा सा कम हुवी तो न जाने मुझे क्या सूझा मैंने अपना कैमरा लिया और गोविंदघाट के चक्कर मारते हुए सब जगहों की फोटो लेनी शुरू कर दी.. होटल, गलियां, मंदिर, दुकानें, पुल.. घंटेभर तक मैं अपने एसएलआर से फोटोग्राफी करते रहा. रातभर बारिश होते रही. अलकनंदा उफान में थी. अगले दिन बारिश के साथ ही बाढ़ ने जो कहर ढाया उसमें हमारा सब बह गया.
मैं अपने छह मंजिला दो होटल और पार्किंग के साथ ही अन्य होटलों को अलकनंदा में समाते देखता रहा. नौ होटलों को अलकनंदा ने लील लिया था.
18 जून को जोशीमठ के राहत कैम्प में गए. मन नहीं माना और दूसरे दिन ही वापस गोविंदघाट आ गए. अलकनंदा के पार हजारों लोग फंसे थे. हैलीकाप्टर एक टाइम में चार लोगों को ही ला पा रहा था. मौसम खराब होने पर उसमें भी दिक्कतें आ रही थी. इस आपदा में ‘सर्च एंड रेस्क्यू’ का सीखा हुवा कोर्स काम आया. अपने साथियों के साथ हमने रैस्क्यू करने के लिए थाने से रैस्क्यू के उपकरण लिए और गोविंदघाट में फ्लाइंग फॉक्स विधि से ग्यारह बजे से शाम चार बजे तक करीब पांच सौ लोगों को सुरक्षित निकाल लिया. बारिश के साथ ही हमारे आंसू भी अलकनंदा में समा रहे थे. ये अच्छा था कि भीगे होने कि वजह से हमारे आंसू कोई देख नही पा रहा था. रैस्क्यू उपकरण भी बाद में बारिश तेज होने पर आई बाढ़ में बह गए. और थाने वाले हैं कि आज तक भी कहते रहते हैं कि सामान वापस नहीं किया..
इस आपदा से महिनों तक परेशान रहे हम सब. सबका सब कुछ बरबाद हो गया था. इस आपदा ने हमें पाषाणकाल में पटक दिया था. हमारे आंसू अब सूख चुके थे. बद्रीनाथ में ‘नागनी हिल्स’ में हमारी पांच नाली जमीन थी जिसमें आलू की खेती होती थी. इस आपदा में गोबिंदघाट में सब बह जाने के बाद बद्रीनाथ में ही ठिकाना बनाने की सोची.
घरवालों को नई उम्मीद बंधा कर मैं जुलाई के अंत में देहरादून गया. वहां ‘तानजून एशोसिएटस’ के सुमित अग्रवाल से मिला. सुमित बिल्डिंग वर्क के साथ ही स्पोर्टस का काम करते हैं. उन्हें जब मालूम हुवा कि आपदा में मैंने क्या कुछ खोया तो वो बड़े आत्मीयता से गले मिलते हुए बोले, ‘यार! अदभुत हो तुम, सब वहां आपदा राहत की लाइन में लगे हैं और तुम यहां खड़े हो..’
सुमित ने हौसला अफजाई करते हुए पूरी मदद का भरोसा दिया और बद्रीनाथ में आकर जमीन को देख—समझ कमरों के नक्शे में काफी मदद की. सुमित ने जल्द ही मिस्त्रियों समेत सारा सामान उपलब्ध करा दिया. कुछ सरकारी मदद मिली और दोस्तों से उधार लिया. 2015 में छह कमरों का रिसोर्ट बनकर तैंयार हो गया है. यहां रूकने के लिए टेस्ट वाले लोग ही आते हैं. अभी यात्रा चल रही है बाद में ट्रैकिंग का काम देख लेता हूं.’ थोड़ा बाजार हो आता हूं, कह वो नीचे बाजार को निकल गए.
गडडू भाई के बारे में सोचते हुए मेरी नजर रिसोर्ट के आगे खेतों में गई. आलू व सब्जियों की गुड़ाई में दामू भाई तल्लीनता से लगा हुवा था. दामू भाई उर्फ दामोदर बोरा नेपाल से है और करीब 26 सालों से गडडू भाई के परिवार से जुड़ा है. गोबिंदघाट के बाद अब वो यहीं बद्री विला में अपनी सेवाएं दे रहा है. वो आॅलराउंडर है, ट्रैकिंग में वो गडडू भाई का काफी मददगार रहता है.
सुबह हमें माणा गांव जाकर चोप्ता में तुंगनाथ मंदिर जाना था. गुडडू भाई और उसके स्टॉफ से विदा लेकर हम माणा गांव की ओर निकल गए. माणा गांव इस क्षेत्र में भारत का अंतिम गांव है.
माणा गांव में जड़ी—बूटी की बहुतायत भी है. खुद गुडडू भाई ने अपने खेतों में बालछड़ी, पाखान जड़ी, पत्थरचट्टा समेत कई जड़ी—बूटियां उगाई हैं. सफेद फूल भी क्यारियों के किनारे में काफी मात्रा में झूमते दिखे. इसका वैज्ञानिक नाम कैमोलिन है. स्थानीय नाम सूरजमुंखी है. इसके फूलों को सूखाकर चाय भी बनती है.
माणा गांव समंद्र की सतह से लगभग 3200 मीटर ऊंचाई पर बसा है. माणा में रडंपा जाति के लोग रहते हैं. इस गांव की आबादी बहुत ही कम है यहां पर लगभग साठ ही घर है. गांव की आबादी तीनेक सौ के आसपास बताते हैं. वैसे भी ज्यादातर लोग बाहर ही नौकरी में हैं और युवा वर्ग रोजगार की तलाश में बाहर ही रहता है. ज्यादातर टिन की छत वाले घर दो मंजिल वाले ही दिखे. इनमें लकड़ी का काम ज्यादा है. माणा गांव में मेहमानवाजी घर में बनी कच्ची शराब से होती है. चावल से बनने वाली शराब प्राय: हर घर में बनाई जाती है. माणा की मिट्टी आलू की खेती के लिए अच्छी मानी जाती है. जौ और थापर की खेती भी यहां होती है.
बद्रीनाथ और माणा के बाजार में गलीचे, शालें, कालीन आदि की दुकानें भी दिखी. पता लगा कि पहले गांव में इनको बुनने का काम होता था लेकिन अब बुनने का काम कम हो गया है. छह माह जब बर्फबारी में लोग नीचे चले जाते हैं तो वहीं इनको बुनने का काम होता है. ज्यादातर महिलाए ही इनमें पारंगत हैं. पहले माणा, मलारी, व दारमा व व्यास घाटी के दातु, दुग्तु, मिलम, कुट्टी, गुंजी आदि दर्जनों गांवों के ग्रामीण तिब्बत तक व्यापार के लिए जाते थे. 1962 के बाद चीन के युद्व से यह सब बंद ही हो गया.
गांव के मैदान में सांस्कृतिक कार्यक्रमों के साथ ही बच्चों के खेलकूद भी होते दिखे. पता चला कि यहां तीन दिन का त्यौहार मनाया जाता है जिसे ‘जेठ पूजा’ कहते हैं. मान्यता है कि क्षेत्रपाल घंटाकरण भगवान छह माह तक गुफा में रहने के बाद आज के दिन अपने मंदिर में विराजमान होते हैं. जिस पर यहां के लोग इसे त्यौहार के तौर पर मनाते हैं. गांव की गलियों से होते हुए आगे भीम पुल की ओर गए. श्रद्वालुओं और पर्यटकों का वहां तांता लगा था. किवदंती है कि भीम ने सरस्वती नदी को पार करने हेतु एक भारी चट्टान को नदी के ऊपर रखा था जिसे भीम पुल के नाम से जाना जाता है. अब ये चट्टान कम ही दिखाई देती है. विकास की आंधी ने ईट और सीमेंट से इसे दोनों ओर से ढककर इसका नैसर्गिक सौंदर्य छीन लिया है. जिसके चलते यहां आने वाला हर कोई भीम पुल पर खड़ा होकर तीखी घाटी में सरस्वती नदी के तीव्र बहाव के उप्पर दो पत्थरों के आपसी मिलन को ही भीम पुल मान फोटो खींचना शुरू कर देता है. बाद में बाईं ओर नीचे दुकान की सीढ़ियां उतरने के बाद ही उसे भीम पुल में लगे एक बोर्ड को देखने के बाद ही पता चलता है कि ये भीम पुल है. भीम पुल के रास्ते के दोनों ओर ‘हिंदुस्तान की अंतिम दुकान’ वाले बोर्ड दिखे. सरस्वती नदी के किनारे वाली दुकान के बगल में सरस्वती मंदिर है. सरस्वती नदी पूरे भारत में केवल माणा गाँव में ही प्रकट रूप में दिखती है.
यहां दुकानों में सरस्वती के जल के साथ ही प्रसाद बिकता है. मैगी के साथ ही कोल्ड ड्रिंक के दर्शन यहां भी हो गए. यहां से आगे वसुधारा, माणा पास, सतोपंथ समेत कई जगहों को पैदल ट्रैक है. वसुधारा के बारे में कहावत है कि यहाँ अष्ट-वसुओं ने तपस्या की थी. ये जगह माणा से लगभग पांच किलोमीटर दूर है. भीम पुल के पास ही रास्ते में एक गुफा को भीम गुफा का नाम देकर दो नागा साधुओं ने अपनी धूनी जमाई थी. यहां से वापस लौटे तो वेद व्यास गुफा तथा गणेश गुफा को देखते हुए वापस माणा गांव में आ गए. व्यास और गणेश गुफाओं के बारे में कहा जाता है कि यहीं वेदों और उपनिषदों का लेखन कार्य हुआ था.
बद्रीनाथ में ट्रेकिंग के लिए बहुत सुंदर और साहसिक ट्रेक हैं. नीलकंठ बेस कैम्प, पनपतिया पास, सतोपंथ, स्वर्गारोहणी, कालंदी पास गंगोत्री, माणा पास के साथ ही सरस्वती का उदगम स्थल देवताल सहित अन्य कई छोटे खूबसूरत ट्रेक हैं.
बूंदाबादी होनी शुरू हो गई थी तो माणा गांव से विदा लेकर वापसी की राह पकड़ी. बद्रीनाथ के बाद पांडुकेश्वर तक तीखा ढलान है. रास्ते में नीचे अलकनंदा के किनारे गोविंदघाट दिखा तो थोड़ी देर रूक गए. गोविंदघाट धीरे—धीरे आधा—अधूरा खड़ा होने की कोशिश करता दिखा. आपदा के दशं अभी भी साफ दिखाई दे रहे थे. श्रद्वालुओं के वाहनों का तांता पहाड़ की सर्पिली सड़क में रेंग रहा था. जोशीमठ से गोविंदघाट 23 किलोमीटर है. आगे पांच किलोमीटर पुलना तक अब गाड़ी जाने लगी हैं. पुलना से पैदल यात्रा शुरू हो जाती है.
पुलना से नौ किलोमीटर पैदल चलने के बाद घांघरिया है. घांघरिया से हेमकुंड और फूलों की घाटी के लिए अलग—अलग रास्तें हैं. घांघरिया से हेमकुंड छह किलोमीटर तथा चार किलोमीटर की पैदल दूरी पर फूलों की घाटी है.
जोशीमठ तक सड़क कई जगहों पर संकरी और जानलेवा है. छोटे—बड़े ज्यादातर वाहन चालकों को नियम कानूनों की कोई परवाह नहीं रहती है. खतरनाक सड़कों पर ज्यादातर वाहन चालक लापरवाही के साथ तेज गति से चलते हैं. जोशीमठ पहुंचने पर थोड़ी राहत मिली. यहां से सड़क चौड़ी है. जोशीमठ एक परंपरागत व्यापारिक शहर है और जब तिब्बत के साथ व्यापार होता था तब भोटिया लोग अपना सामान यहां आकर बिक्री करते थे और आवश्यक अन्य सामग्री खरीदकर तिब्बत वापस जाते थे. 1962 में भारत-चीन युद्ध के बाद यह व्यापार बंद हो गया.
चमोली से पहले बिरही संगम के पास लक्ष्मी नारायण मंदिर के पास ‘होटल रोज प्लेस’ में बाहर से इडली, डोसा का बोर्ड दिखा था हल्का भोजन लेने के लिए गाड़ी उसके आहते में रोक ली. अंदर काफी भीड़ दिखने पर लगा कि सही जगह में आए हैं. भूख भी दस्तक देने लगी थी. अंदर बैठे. काफी देर तक हम ईडली—डोसा की कल्पनाओं में तैरते रहे लेकिन कोई नहीं आया तो काउंटर पर जाकर ईडली, डोसा के बारे में कहा. उनका उत्तर चौंकाने वाला था..
अभी नहीं हैं.
तो कब बनते हैं..
सुबह..
ये तो हर वक्त होने चाहिए.. आपका बोर्ड भी लगा है बाहर.. सब उसी की वजह से आ रहे हैं और आप ये उत्तर दे रहे हैं..
काउंटर वाले साहब का उत्तर देने का मन नहीं था तो वो अपने काम में लग गए. वैसे भी सुबह से साम तक उन्हें हर किसी को ये ही उत्तर देना होता था. मजबूरन वहां का चलताउ भोजन उदर में डालके उनका महंगा बिल अदा कर चल दिए. बाद में बाहर आकर अन्य दुकानदारों से पता चला कि बोर्ड तो महज दिखाने के लिए है हांथी के दांत की तरह. ये सब तो यहां बनते ही नहीं. शुरू—शुरू में बनते थे लेकिन प्रोफिट कम होने पर इसे बंद कर दिया हां बोर्ड अपनी जगह है. और बोर्ड की वजह से ही लोग खींचे चले आते हैं. अजीब लूट है इस यात्रा मार्ग में. जबकि चमोली से जोशीमठ के बीच में कुछ जगहों में सरदारों ने लंगर चलाए हैं. कोई भी आए, सिर में रूमाल डाले, जम के प्यार से भोजनरूपी प्रसाद पाए और चल पड़े. वो खुश रहते हैं अपनी इस सेवा से. और यहीं के शख्स इस तरह से यात्रियों को बेवकूफ बनाने से चूकते नहीं.
चमोली से गोपेश्वर होते हुए शाम 2780 मीटर की उंचाई पर चोपता पहुंचे. बारिश की फुहारें पड़ रही थी. पर्यटकों से चोपता पटा पड़ा था. होटल, टैंट सब पैक. यहां तक कि खुद के टैंट लगाने की जगह भी नहीं बची थी. साथी गजेन्द्र रौतेला को फोन से रूकने के बारे में जानकारी लेनी चाही तो बमुश्किल वार्तालाप हो सका. उन्होंने भंडारीजी के बुग्याल रेस्टोरेंट में बात करने को कहा. भंडारीजी से बात हुवी तो रेस्टोरेंट के नीचे नीम अंधेरे में उन्होंने कमरे दे दिए. कमरे क्या थे माशाअल्लाह! दरवाजा खोल अंदर गए तो अंधेरे में टटोल बिजली के स्वीच आॅन किए लेकिन ये क्या यहां तो लाइट ही गायब. रेस्टोरेंट में काम करने वाले महेन्द्र नेगी ने आश्वासन दिया कि यहां अंधेरा होने पर लाइट आ जाएगी. क्या रोज ऐसा होता है पूछने पर हंसते हुए गर्दन हिलाते हुए वो चला गया. हमने हैड लैंप निकाल लिए. बाहर बारिश हो रही थी तो इस अंधेरे कमरे में ही अपने को कैद जैसा कर लिया. एक घंटे बाद अंधेरा होते ही लाइट आ गई. कमरे का मुआयना किया तो कमरे का दरवाजा उखाड़कर उसकी दिशा बदली गई थी, सायद डबल बैडों की सैटिंग के लिए ये किया गया होगा. दरवाजा मोटी प्लाई का था जिसे अदंर से बंद कर रोकने के लिए एक पतली सी चिटकनी लगा रखी थी. इस भीम दरवाजे के पीछे एक एक बदरंग तौलिया लटका था. ऐसा लगा जैसे स्वच्छ भारत अभियान में ये बूरी तरह से जख्मी हो गया हो. बाथरूम में पानी बूंद—बूंद कर आ रहा था तो रेस्टोरेंट में जाकर पानी के लिए कहा. पता चला कि पानी उप्पर तुंगनाथ के पास से आता है. रास्ते में पहुंच वालों ने अपने कनैक्शन लिए हैं और वो अकसर नीचे की पाइप लाइन बंद कर देते हैं. बमुश्किल पानी आ पाता है. खैर! कुछ रहम कर उन्होंने रेस्टोरेंट की छत में लगी टैंकी का बंद गला थोड़ा सा खोल पानी की आपूर्ति बहाल कर मेहरबानी जैसी कर दी.
गजेन्द्र रौतेलाजी से फिर बात नहीं हो सकी. बीएसएनएल के नेटवर्क का यहां बहुत बुरा हाल है. चंद सैकंडों के लिए नेटवर्क तैरता हुवा सा आता है और हैल्लो होते ही गायब हो जाता है. आधी—अधूरी बात हो गई तो समझो ‘हरी’ दर्शन हो गए. वैसे यहां अंधेरा होने के बाद जब लाइट आती है तो बीएसएनएल अपने कपाट बंद कर लेता है.
आज के सफर में थकान हावी थी तो नींद आ ही गई. सुबह जल्द उठकर अपना सामान गाड़ी में डाल कमरों के आतंक से मुक्त हुए. छाता ली और तुंगनाथ मंदिर की चढ़ाई नापनी शुरू कर दी. तुंगनाथ यहां से साढ़े तीन किलोमीटर की चढ़ाई पर है. लगभग 3361 मीटर की उंचाई पर
तुंगनाथ मंदिर, पंच केदारों में सबसे ऊँचाई पर स्थित है. यह मंदिर हजारो वर्ष पुराना बताया जाता है. यहाँ भगवान शिव की पंच केदारों में से एक के रूप में पूजा होती है. यहां की भी एक कहानी है. इस मंदिर का निर्माण पाण्डवों द्वारा भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए किया गया था, जो कुरुक्षेत्र में हुए नरसंहार के कारण पाण्डवों से रुष्ट थे.
तुंगनाथ पहुंचने तक रिमझिम बारिश शुरू हो गई. मंदिर के अगल—बगल दर्जनों मकान बन गए हैं. कुछ अभी बन रहे हैं. आने वाले वक्त में बद्रीनाथ की तरह ही तुंगनाथ भी बाखलियों से घिर जाएगा. फिर इसका इस जगह में जो आकर्षण है वो गायब ही हो जाएगा. पहले यहां दो दुकानें और तीनेक मकान थे, जिनमें रहने का भी इंतजाम हो जाता था. आठ बज चुके थे तो यहीं एक दुकान में मैगी को पेट में उड़ेल कर वापसी की राह ली.
तुंगनाथ से एक किलोमीटर आगे चंद्रशीला है जो कि लगभग 4000 मीटर की उंचाई पर है. बारिश और कोहरे की वजह से यहां जाना नहीं हो सका. चंद्रशिला से नंदा देवी, त्रिशूल, केदार पर्वत, बन्दर पूंछ व चौखम्बा के शानदार दृश्य देखने को मिलते हैं. तुंगनाथ के दर्शन के लिए ज्यादातर पर्यटक घोड़ों से ही आते—जाते हैं. इसके लिए घोड़े वाले दो हजार से ढ़ाई हजार तक लेते है.
नीचे चोपता आने तक दस बज चुके थे. वापसी में ऊखीमठ होते हुए जाने का विचार बना. नेटवर्क गायब होने से गजेन्द्र रौतेलाजी से बात नहीं हो पा रही थी. चोपता से मंदाकनी नदी के किनारे कुण्ड तक तीव्र ढलान है. सड़क भी ज्यादातर जगहों पर संकरी और घुमावदार मोड़ वाली है. सड़क भूस्खलन के कारण जगह—जगह ध्वस्त है.
रास्ते में दुगलबिट्टा पढ़ाव है. यहां खूबसूरत बुग्याल है जो कि लगभग चारेक किमी क्षेत्रफल में फैला है. आगे मक्कूमठ बैंड है यहां से मक्कूमठ गांव के लिए पैदल मार्ग के साथ ही एक संकरी सी सड़क है. शीत काल में तुंगनाथ और रुद्रनाथ जी की पूजा मक्कूमठ में ही होती है। आगे ऊखीमठ में ओम्कारेश्वर मंदिर है. शीतकाल में भगवान केदारनाथ के कपाट बंद होने के बाद केदारनाथ की डोली ऊखीमठ में लायी जाती है और कपाट खुलने तक यहीं उनकी पूजा-अर्चना की जाती है.
कुंड के संकरे रास्ते में कई टूरिस्ट बसें चोपता, गोपेश्वर होते हुए बद्रीनाथ को जाती दिखी. इस संकरे रास्ते में भी अधिकतर बसों की स्पीड तेज थी. उस पर तुर्रा ये कि एक बस का ड्राइवर तो मोबाइल में बात करते हुए एक हाथ से स्टेयरिंग से तीखे मोड़ों को काटने में लगा दिखा तो घबराकर हमने अपनी गाड़ी पहाड़ से चिपका ही ली. इस तरह के वाहन चालकों ने न तो नियम सीखे होते हैं और न ही नियमों से उन्हें कोई मतलब रहता है. नियम उनकी हेकड़ी के खिलाफ होते हैं.
कुंड के पास पहुंचे तो अगस्त्यमुनि के रास्ते में एक बोर्ड में रास्ता बंद का निशान देख पुल पार कर गुप्तकाशी वाले मोटर मार्ग में चले गए. चारेक किलोमीटर चलने के बाद लगा कि दिशा गलत हो गई है. केदारनाथ वाले इस रास्ते में कहीं डाइवर्जन नहीं दिखाई दे रहा था. पूछने पर पता लगा कि कुंड से ही बाएं को जाना है. बोर्ड पहले रास्ता बंद होने पर लगाया गया था जो कि अब रास्ता खुलने के बाद भी लगा ही रह गया. वापस लौटे और व्यवस्था को थोड़ा सा कोसा भी. 2013 की आपदा में यह मार्ग पूरी तरह से ध्वस्थ हो गया था. बाद में पहाड़ काटकर जो रोड बनाई वो अभी तक बनने में ही है. जगह—जगह भूस्खलन से यह मार्ग करीब पांचेक किलोमीटर तक बहुत ही खतरनाक और जानलेवा बना हुवा है. काकड़ागाड़, भीरी, बांसवाड़ा, चन्द्रापुरी होते हुए अगस्त्यमुनि पहुंचे. मोबाइल के सिग्नल कोमा में चले गए थे. गजेन्द्र रौतेलाजी से संपर्क नहीं हो सका. दोपहर हो चुकी थी. सुबह तुंगनाथ में ही उदर में थोड़ा सा मैगी गई थी तो भोजन के लिए रौतेलाजी के भांजे के रेस्टोरेंट में रूक गए. तसल्ली से भोजन करने के बाद बागेश्वर की राह पकड़ी. कर्णप्रयाग से ग्वालदम तक सड़क में करीब बीसेक साल से काम चल रहा है. बारिश में ये सड़क कीचड़ से सन जाने से खतरनाक हो जाती है. अंधेरा होते—होते बागेश्वर पहुंच गए.
उत्तराखंड में विकास के नाम पर दसकों से पहाड़ों का सीना चीरा जा रहा है. पेड़ों को काटा जा रहा है. पर्यावरविद्वों की चेतावनियां नक्कारखाने में तूती की आवाज की तरह दबा दी जा रही है. ऐसा लगता है कि जैसे नेताओं समेत समूचा तंत्र ही ठेकेदार बन जनता के सांथ ही उत्तराखंड की जमीं को लूट—खसोटने में लगा है.
वाह! क्या सिस्टम है इस राज्य में पर्यटन स्थलों का. दुनिया भर में उत्तराखंड में पर्यटन को आने के लिए ढिंढोरा पीटते रहते हैं. और पर्यटक जब इनके झांसे में आता है तो वो अपना सिर पीटता है. पर्यटन और पर्यटकों के लिए बनाए गए नियम सिर्फ कागजों में धूल फांक रहे हैं. धरातल में तो सायद ही वो नियम कभी आएंगे. सड़क, गेस्ट हाउस, होटल, नेटवर्क सहित पानी का पूरे उत्तराखंड के पर्यटन स्थलों में बुरा हाल है. वीआइपी, नेता, उंचे रसूख वाले जब हैलीकाप्टर से घूमेंगे तो उन्हें जमीनी सच्चाई कैसे दिखेगी. वैसे मालूम इन्हें सब रहता है लेकिन ये सोच इन पर हावी रहती है कि, जब पिछली सरकार ने किया तो हमने क्या ठेका ले रखा है सिस्टम को सुधारने का.
और! दशकों से चले आ रहे इस सिस्टम से उम्मीद करना बेमानी ही होगा. इन हालातों में तो ये सिस्टम सदियों तक यूं ही चलता रहेगा. उन्हें विमल पंवार जैसे हजारों लोगों के दु:ख—दर्द से कोई लेना—देना नहीं है. उन्हें जनता और जमीं के विकास के बजाय अपने विकास की फिक्र है और वो ये सब बखूबी कर भी रहे हैं.
उत्तराखंड में 2010 व 2013 की आपदा से ये सबक तो मिला ही है कि तंत्र केवल आश्वासनों के लिए ही होता है. तंत्र में कोई कारिंदा ईमानदारी से काम करना चाहता है तो उसे दरकिनार कर दिया जाता है. आपदा के दंश लोग अभी भी झेल रहे हैं. उन्हें मिलते हैं तो मात्र आश्वासन. कोई कहता है कि भगवान के भजन करो तो कोई कहता है कि नौकरी का बांड भरते वक्त अपनी परेशानियों के बारे में सोच लेना चाहिए था.
इतिहास के पन्ने भी यदि पलटें तो ऐसा कोई देश, राज्य, प्रांत नही मिलता है जहां की जनता ने पीढ़ियों तक सुख शांति भोगी हो. सदियों से उनकी नियति मरते हुए जीने की ही रही और वर्तमान में भी वो मरते हुए जीते चले जा रहे हैं.

केशव भट्ट

बागेश्वर निवासी केशव भट्ट पत्रकार होने के साथ-साथ घुमक्कड़ और पर्वतारोही हैं.