अग्निवेश पर हमला : कठमुल्लेपन का विरोध बर्दाश्त नहीं


nainitalsamachar
July 20, 2018
हिन्दू धर्म को कबीर की परम्परा जैसा एक आधुनिक सुधारक मिला, जिसने अपनी वैज्ञानिक सोच और धर्म में अंधविश्वास और दकियानूसी कट्टरवाद की पुरजोर खिलाफत की, जिसके कारण वे हमेशा से हिन्दू धर्म के खलनायक के रूप मे मशहूर हो गए.
तैश पोठवारी
स्वामी अग्निवेश पर हुए हमले के बाद कल से मैं सोशल मीडिया पर हिन्दू धर्म के तथाकथित ठेकेदारों व राष्ट्रभक्तों को विजय उल्लास के साथ हमलावरों का महिमामंडन देख रहा हूँ. स्वामी अग्निवेश को हिन्दू धर्म का सबसे बड़ा दुश्मन, मुसलमानों, आंतकवादियों, नक्सलियों का एजेंट कहने के साथ साथ संस्कृति रक्षकों ने माँ-बहन की गन्दी गालियों के साथ सोशल मीडिया में चेतावनी जारी कर दी है, वामियों—कांग्रेसियों का यही हश्र होगा.
अभी आप स्वामी अग्निवेश को भूल जाइए, मैं आपको एक साधु की कहानी सुनाता हूँ.
ये कहानी है दक्षिण के ब्राह्मण परिवार में जन्मे श्याम वेपा राव की, जो बचपन से ही पढ़ने—लिखने और वाद विवाद में बहुत तेज थे. बाप की मृत्यु बचपन में ही हो गई। मां और बड़ी बहन ने अभावों में भी बड़े लाड़—प्यार से पाला. उनका एक सपना था उसको एक बड़ा आदमी बनाने का.
साठ के दशक में जब BA को भी एक बड़ी डिग्री माना जाता था, तब उसने M.Com, LLB की शिक्षा पूरी की और कोलकाता के एक प्रतिष्ठित कॉलेज में उसकी अच्छी—खासी नौकरी लग गई और वो बिज़नेस मैनेजमेंट पढ़ाने लग गया. उसके बारे कहा जाने लगा कि वो जज बन बनने वाला है. एक लड़की उसे पसंद करने लगी. घर में ब्याह—शादी के लिए एक से बढ़कर एक रिश्ते आने लगे, पर श्याम वेपा राव के मन में कुछ और ही चल रहा था. उसने पूरी दुनिया के साहित्य, दर्शन, राजनीतिक और धार्मिक ग्रंथों को पढ़ने के बाद एकाएक संन्यास की घोषणा कर दी.
उसने कहा अन्याय, गरीबी, असमानता, छुआछूत, धर्म में पाखंड और महिला विरोधी दकियानूसी सोच के खिलाफ सोच लड़ना ही मेरा धर्म है. संन्यास के दौरान वो जात—पात, छुआछूत मिटाने, गरीब मजदूर के अधिकार, महिला और पुरुष अधिकारों की बात करता और घर घर भिक्षा मांग कर अपना अपना गुजारा करता.
उसने धर्म के नाम पर चले आ रहे पाखंड, कठमुल्लावाद, महिला विरोधी, अवैज्ञानिकता को बढ़ावा देने वाली पौराणिक मूर्खताओं को जनता के सामने नंगा कर दिया. उसने कुम्भ के मेले में हरिद्वार में जाकर पाखंडखंडिनी पताका गाड़ दी और कहा गंगा या किसी नदी में डुबकी लगा लेने से कोई पापी पवित्र नहीं हो सकता. जिस धर्म में मात्र नदी में डुबकी लगा लेने से सारे पाप माफ़ हो जायें वो धर्म गलत है. जो समाज ऐसी मान्यताओं को मानेगा उस समाज में पाप घटने की बजाए बढ़ेगा. उसने सभी पोंगा पंडितों को कहा कि वो अपनी दुकानदारी के लिए कुम्भ के दौरान करोड़ों लोगों का मल-मूत्र और दूसरी गंदगी गंगा में प्रवाहित कर गंगा को मैला न करें.
उसने हिन्दू व अन्य धर्मों में चली आ रही कुरीतियों का जमकर विरोध किया. 1987 में हिन्दू धर्म में सती प्रथा को जीवित करने की पुरजोर कोशिश हुई। 1987 में राजस्थान के देवराला में 18 साल की रूपकंवर जिसके पति की शादी के एक साल बाद मृत्यु हो गई थी और कोई संतान नहीं थी, उसके ससुराल वालों ने संपत्ति का बंटवारा न हो, इसलिए उसे सती के नाम पर जलती चिता में डालकर ऊपर से लाठियों से दबा दिया. जलते हुए वो पूरी जोर से चीखी बचाओ-बचाओ।
उसकी चीख सुनकर चिता के चारों ओर खड़ी भीड़ एक पल को चौंकी, फिर सती मैया की जय के नारों के बीच उसने तड़प-तड़प कर दम तोड़ दिया. पूरे देश के मंदिरों में सती मैया की जय जयकार होने लगी, उसके नाम पर मंदिर बनाने के लिए पंडो ने चंदा माँगना शुरू कर दिया. पूरे हिन्दू समाज में सिर्फ एक साधु इसके खिलाफ खड़ा हुआ और वो था श्याम वेपा राव. उसने इसे हत्या और अपराध कहा और इसका भंडाफोड़ करने वह पैदल सती विरोधी यात्रा लेकर देवराला की तरफ चल पड़ा.
उसे सभी पंडों, पुजारियों, हिन्दू धर्म के ठेकेदारों द्वारा हिन्दू धर्म का दुश्मन कहा. उसे धमकी दी गई, पीटने और जान से मारने की बात कही गई. तरह तरह की अफवाहें फैलाई गई.
सती प्रथा के खिलाफ हिन्दूवादी ठेकेदारों से श्याम वेपा राव ने अकेले टक्कर ली. कोई भी उनकी इस मुहिम में उनके साथ नहीं आया. मगर अग्निवेश का संघर्ष और मेहनत रंग लाई. भारत सरकार ने पहली बार सती प्रथा के महिमामंडण को भी अपराध की श्रेणी में डाला. सती मैया के नाम पर दुकान बढ़ाने की तैयारी में हिन्दू धर्म के ठेकेदार और पोंगे पंडित हाथ मलते रह गए.
इसी श्याम वेपा राव को आज आप अग्निवेश के नाम से जानते हैं। अग्निवेश ने जीवन भर हिन्दुओं में मूर्ति पूजा, अंधविश्वास, छुआछूत, इस्लाम में बुर्का और अन्य पिछड़ी मान्यताओं और चर्च के पाखंडों की जमकर बखिया उधेड़ी है.
हिन्दू धर्म को कबीर की परम्परा जैसा एक आधुनिक सुधारक मिला, जिसने अपनी वैज्ञानिक सोच और धर्म में अंधविश्वास और दकियानूसी कट्टरवाद की पुरजोर खिलाफत की, जिसके कारण वे हमेशा से हिन्दू धर्म के खलनायक के रूप मे मशहूर हो गए. यही नहीं, जब उन्होंने आर्य समाज में धर्मगुरुओं से रोज के धार्मिक कर्म यज्ञ, उपदेश के अलावा दलितों, आदिवासियों, गरीब मजदूरों के बीच जाकर उनके अधिकारों की लड़ाई लड़ने की बात कही, तो आर्य समाज में उनके खिलाफ बगावत हो गई. उनके खिलाफ कई गुट बन गए.
अग्निवेश ने आर्य सभा नाम की राजनीतिक पार्टी बनाई और चुनाव लड़ा. विधायक चुने गए और बाद में हरियाणा के शिक्षा मंत्री बने. उनके मंत्री रहने के दौरान उन्हें किसी ने फरीदाबाद की पत्थर खदानों में बंधुआ मजदूरी होने की जानकारी दी. उन्होंने जब यह जानकारी मुख्यमंत्री से साझा की तो तो मुख्यमंत्री ने उनको चुप रहने की सलाह दी. साथ में यह संकेत भी दिया कि चुप न रहने की स्थिति में अंजाम भुगतने को तैयार रहना होगा.
अग्निवेश ने खदान मालिकों के पक्ष में सत्ता के इस रवैए के खिलाफ मंत्री पद और विधायकी से इस्तीफ़ा दिया और फरीदाबाद की पत्थर खदानों में बंधुआ मुक्ति मोर्चा की स्थापना की. फरीदाबाद की पत्थर खदानों से उन्होंने बंधुआ मजदूरों को छुड़ाना शुरू किया और अब तक वे भारत के अलग अलग राज्यों से फैक्ट्रियों, ईंट—भट्टों, खेतों से 1,76,000 बंधुआ मजदूरों को छुड़ा चुके हैं.
ऐसे समाज सुधारक स्वामी अग्निवेश के साथ भाजपा के संगठनों विद्यार्थी परिषद व भारतीय जनता युवा मोर्चा के लोगों ने जो व्यवहार किया, वह वाकई निंदनीय है।
(स्वामी अग्निवेश के साथ काम करने का दावा करने वाले तैश पोठवारी की यह पोस्ट सोशल मीडिया पर वायरल हो रही है. हमने इसे वहीं से लिया है.)
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