अतिक्रमण हटाओ : भ्रम और सच्चाई


nainitalsamachar
July 21, 2018

 

शंकर गोपालकृष्णन 

उत्तराखंड हाई कोर्ट के आदेश के बाद देहरादून शहर में बस्तियों को हटाने का अभियान चल  है. अनेक सारे लोगों को यह कार्यवाही सही लगती है। जो सचमुच सरकारी जमीन पर बसे हैं, वे बोल भी कैसे सकते हैं की हमें मत हटाओ.

लेकिन यह पूरा सच नहीं है. गरीबों के घरों को तोड़ना सिर्फ अतिक्रमण हटाने की बात नहीं है. नीचे लिखे बिंदुओं पर ध्यान दीजिये :

लोग सरकारी ज़मीन पर आखिर बसते क्यों हैं ?

देश का कोई भी शहर दिहाड़ी मजदूर, ड्राईवर,  ठेली वालों, रेहड़ी वालों, घरेलू मजदूरों और अन्य छोटे-मोटे काम करने वाले गरीब लोगों के बिना चल नहीं सकता है. सरकार की नीतियों से गांवों में खेती और कुटीर उद्योग नष्ट हो रहे हैं और वहाँ से लोग लगातार शहरों को पलायन करते हैं. लेकिन अधिकृत कालोनियों में किराया और ज़मीन की कीमतें इतनी ज्यादा हैं कि वहां पर रहना इन लोगों के लिए संभव नहीं है. इसलिये नगरपालिकाओं की नीतियों और उनके मास्टर प्लान के अनुसार यह अनिवार्य है कि वे पर्याप्त संख्या में एल.आइ.जी. हाउसिंग भी बनायें. लेकिन ऐसे घर बहुत कम बनाये जाते हैं. तो फिर लोग रहेंगे कहाँ ? नेताओं और माफियों के कब्ज़े में सरकारी ज़मीन रहती है, जिस पर प्रशासन की मिलीभगत से वे गरीब लोगों को बिठा देते हैं. प्रशासन अवैध काम होते देख कर भी उस वक़्त आँख मूंदे रहता है. माफिया इस धंधे से करोड़ों रुपये कमाते हैं. गरीब लोग अपनी ज़िन्दगी की पूरी की पूरी बचत लगा कर जमीन उनसे जमीनें खरीदते हैं और उस पर घर बनाते हैं. कुछ समय बाद ‘अतिक्रमण हटाओ अभियान’ चला कर सरकार इन घरों को तोड़ देती है’ जिसकी वजह से ये लोग बेघर हो कर और ज्यादा गरीब हो जाते हैं और एक बार फिर से नेताओं और माफियों के पास जाने को मजबूर होते हैं. शोषण का यह चक्र लगातार चलता रहता है। इससे शहर को भी नुक्सान होता है और गरीबी भी बढ़ती रहती है।

 

उत्तराखंड में मई 2018 तक प्रधानमंत्री आवास योजना के अंतर्गत एक भी घर नहीं बनाया गया है. पट्टा देने का अधिनियम 2016 में बन जाने के बावजूद आज तक किसी परिवार को जमीन का पट्टा नहीं मिला है. अगर सरकार अपनी ज़िम्मेदारी से भागेगी तो लोग कहाँ जायेंगे ? सरकार की नीति शायद यही है कि लोग नेताओं और माफियों पर ही निर्भर रहें।

अगर यह हाई कोर्ट का आदेश है तो सरकार क्या कर सकती है ?

कानून बनाने का अधिकार हमेशा सरकार के हाथों में रहता है. कोर्ट तो सिर्फ यह देखता है कि कानून का ठीक से अमल हो रहा है या नहीं. वर्ष 2006 में जब ऐसी ही स्थिति दिल्ली में बनी थी,  तब सरकार ने ‘दिल्ली लॉ स्पेशल प्रोविजन्स एक्ट 2006’ बनाया था. अगर इच्छा शक्ति हो और सरकार सचमुच लोगों के घरों की सुरक्षा को ले कर चिन्तित है तो ऐसी ही व्यवस्था उत्तराखंड में भी हो सकती है, पहले अध्यादेश के रूप में फिर पूर्ण कानून बना कर.

लोगों को बेघर न किया जाय, इसके लिए सरकार क्यों कानून लाये ?

किसी भी परिवार को बेघर करने का मतलब होता है कि बच्चे और बुज़ुर्ग भूखे रह कर बीमार हो रहे हैं, उनकी मृत्यु भी हो सकती है. दुनिया के शायद किसी भी कानून में यह नहीं लिखा है कि सरकारी जमीन पर रहने का मतलब बेकसूर लोगों के लिए ‘मृत्युदंड’ होगा.

इसलिए ‘चेतना आन्दोलन’ चाहता है कि उत्तराखंड सरकार जल्द से जल्द एक कानून या अध्यादेश लाये जिसमें यह प्रावधान हो कि अतिक्रमण हटाने के नाम पर किसी परिवार को बेघर नहीं किया जायेगा. सरकार अपनी ज़िम्मेदारी निभाए और गरीब लोगों के लिये सस्ते घर बनाने की नीतियां बनाये। अतिक्रमण हटाने के नाम पर बार-बार लोगों के ऊपर अत्याचार करना और माफियों और नेताओं को और मुनाफा कमाने के लिए मौका देना, इससे गरीबों का विकास कैसे हो सकता है ?

 

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