सी.बी.आई. की छवि


राजीव लोचन साह
November 2, 2018

सी.बी.आई. की छवि तो न जाने कितने समय से विवादास्पद रही है। भारत की इस सबसे प्रमुख जाँच एजेंसी का दुरुपयोग केन्द्र की सरकारें कम से कम पिछले तीस साल से कर रही हैं। जिस तरह से आकाशवाणी और दूरदर्शन निष्पक्ष सूचना माध्यम नहीं रहे, सरकार के भोंपू बन गये, ठीक उसी तरह से सी.बी.आई. पर भी यह आरोप लगता रहा है कि वह सत्ताधारी दल के लोगों के अपराधों को छिपाने की कोशिश करता है और सरकार के विरोधियों को प्रताड़ित करता है। कांग्रेस के नेतृत्व वाली पिछली मनमोहन सरकार के दौरान भाजपा ने इस संस्था को ‘पिंजरे में बन्द तोता’ तक कह डाला था। मगर सत्ता में आने के बाद नरेन्द्र मोदी की भाजपा सरकार ने सी.बी.आई. का और अधिक बेशर्मी से दुरुपयोग करना शुरू कर दिया। इसकी इन्तिहा तो तब हुई, जब पिछले दिनों आधी रात के बाद सी.बी.आई. के निदेशक आलोक वर्मा और उनके जूनियर राकेश अस्थाना को जबरिया छुट्टी पर भेज दिया गया और उनके स्थान पर नागेश्वर राव को इस एजेंसी की कमान सौंप दी गई। यह अजीबोगरीब घटना इन्दिरा गांधी द्वारा लगाई गई इमर्जेंसी के दिनों की याद दिलाती है। आखिर ऐसी क्या वजह थी कि यह कार्रवाही रात के दो बजे करनी पड़ी ? क्या कुछ घंटे रुक जाने से आसमान टूट पड़ने वाला था ? यह ठीक है कि हालिया कुछ दिनों से वर्मा और अस्थाना के बीच कुछ तनातनी चल रही थी। यहाँ तक कि वर्मा द्वारा भ्रष्टाचार के एक मामले में अस्थाना के खिलाफ एफ.आई.आर. तक दर्ज कर दी गई थी। मगर यदि यह मामला सिर्फ दो शीर्षस्थ अधिकारियों के बीच विवाद का था तो इसे किसी और तरीके से सुलझा लिया जा सकता था। ऐसे में भले ही यह दूर की कौड़ी लगे, मगर विपक्षी कांग्रेस और कतिपय अन्य लोगों के इन आरोपों पर विश्वास होने लगता है कि आलोक वर्मा किसी भी समय राफेल विमानों की खरीद के मामले में जाँच शुरू करवा सकते थे, अतः उन्हें निकाल बाहर करना घबराई हुइ मोदी सरकार के लिये जरूरी हो गया।

राजीव लोचन साह