छोटा मुंह छोटी बात


nainitalsamachar
March 27, 2019

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रमदा

गतिशील संसार परिवर्तनशील है. समय के साथ सभी कुछ बदलता है. बदलावों के साथ खुद को बदलने की सलाह ज्ञानवान लोग अज्ञानियों को दिया भी करते हैं. चेताते रहते हैं कि अगर वक़्त के साथ बदलोगे नहीं तो पीछे रह जाओगे….अप्रासंगिक हो जाओगे. कहा भी गया है कि वक़्त के साथ बहुत कुछ बदल जाता है….लोग भी ….रास्ते भी…अहसास भी और कभी कभी हम खुद भी. तय है कि वक़्त हमें बदले या हम वक़्त के साथ खुद को बदलें ज़माने के साथ बदलना लाजमी है.

पर सवाल यह है कि यह सब मैं आपको क्यों परोस रहा हूँ या आपका दिमाग क्यों खा रहा हूँ ? दरअसल आने वाले चुनावों की ख़बरों में कार्यकर्ता, राजनैतिक दलों के कार्यकर्ताओं, का उल्लेख आजकल मेरा दिमाग खा रहा है. राजनैतिक-दल का कार्यकर्ता , विशुद्ध कार्यकर्ता , मेरे हिसाब से अतीत की चीज़ है और आज से तीन-चार दशक पहले से ही राजनैतिक परिदृश्य से यह जीव विलुप्त होना शुरू हो गया था. एक बात में पहले ही साफ़ कर दूँ , समर्थक और कार्यकर्ता को मैं अलग-अलग प्रजाति मानता हूँ. मैं दल विशेष का समर्थक अगर हूँ तो उसके पक्ष में मतदान और थोड़े से भक्तिभाव से मेरा दायित्व पूरा हो जाता है किन्तु यदि कार्यकर्ता हूँ तो तन-मन से उसका हो जाना मेरी नियति है. वह मेरा ओढना-बिछौना सभी कुछ है. दल विशेष के प्रति समर्पित यह प्रजाति बदले में, मान्यता के अतिरिक्त, विशेष कुछ नहीं मांगती थी. दल विशेष या व्यक्ति विशेष के प्रति समर्पित यह प्रजाति उनकी तरफ फेंकी गयी नेता जी की एक मुस्कान या पीठ पर दी गयी एक थपकी मात्र से धन्य हो जाती थी. ये दीवाने लोग, शहर या क़स्बे विशेष में आयोजित होने वाले कार्यक्रमों में, भाषणों के लिए मंच बनाने, कुर्सियां लगाने , दरियां बिछाने और नेता-गणों के लिए चाय–पानी जुटाने आदि में शिद्दत से संलग्न, तीस-चालीस साल पहले तक दिखाई देते थे. यह उन दिनों के लोग थे जब बैलों की जोड़ी या गाय-बछड़ा, दीपक, झोपड़ी, हलधर जैसे चुनाव-निशान होते थे. चुनावों के दौरान उम्मीदवारों के प्रचार में इन्हें दीवानावार गली-गली, गाँव-गाँव भटकते, धूल फांकते देखा जा सकता था. मतदान के दौरान ज्यादातर अपने ही खर्चे पर मतदान स्थल पर इनकी सक्रियता रहती थी. ये दीवाने जिन कामों को अंजाम दिया करते थे उन्हें तो अब मजदूरों से करवाया जाता है, बाकायदा ठेके दिए जाते हैं, पैसा बहाया जाता है. यहां तक कि भीड़, श्रोता तक पैसे देकर जुटाए जाते हैं. बूथ-मैनेजमेंट को तो जल्दी ही मैनेजमेंट-संस्थानों के पाठ्यक्रम में शामिल किये जाने की संभावनाएं हैं.

ऐसे में मेरी स्वाभाविक जिज्ञासा है कि आजकल जिन्हें कार्यकर्ता कहा जाता है वे कौन हैं और करते क्या हैं ? जितना मैं देख पाता हूँ इनमें से दोयम दर्जे के तथाकथित कार्यकर्ता तो वे लोग हैं जिनके लिए भारतीय लोकतंत्र के उत्तरोत्तर परिपक्व होते जाने के साथ विधायक-निधि / सांसद निधि की व्यवस्था की गयी. इन निधियों से कराए जाने वाले कामों के मूल में ये ही होते हैं. अब्बल श्रेणी के कार्यकर्ता वे लोग हैं जो तमाम तरह की ठेकेदारियों, धंधों में लगे हैं या जिनके खुले,छिपे निजी स्वार्थ हैं या उनकी नेता विशेष तक इतनी पहुँच है कि वे उनके कमीशन एजेंट की तरह सक्रिय हो पाते हैं . तीस-चालीस साल पहले के कार्यकर्ताओं में से बिरले ही खुद नेता बन पाते थे किन्तु नए ज़माने के कार्यकर्ता नेता बनने और बनाने की हैसियत रखते हैं. नेता और इन कार्यकर्ताओं दोनों की गहरी सांठ-गांठ के साथ ही हमारा लोकतंत्र लगातार नई उपलब्धियों की ओर अग्रसर है .

सचमुच ज़माना तेज़ी से बदला है और जो वक़्त के हिसाब से अपने आप को नहीं ढाल पा रहे हैं कष्ट में हैं. सदी के महानायक से ही सीखिए, गौर कीजिए होली गाते-गाते उन्होंने इधर रैप गाना भी शुरू कर दिया है.

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