छोटा मुंह छोटी बात : 5


nainitalsamachar
April 29, 2019

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मैंने टिकट खरीदकर

आपके लोकतंत्र का नाटक देखा है
अब तो मेरा प्रेक्षागृह में बैठकर

हाय हाय करने और चीखें मारने का
हक बनता है

 – पाश

रमदा

मेरे लिए तो यह सचमुच हाहाकार का समय है और हाय हाय करते हुए मैं आपसे पूछना चाहता हूँ कि बतौर मतदाता हम जिसे चुनते हैं…सांसद / विधायक या ऐसा ही कोई…वह संसद / विधानमंडल या जहाँ के लिए भी उसे चुना गया है में किसका प्रतिनिधि है? यानि कि वह जिस संस्था के लिए चुना गया है उसमें वह किसकी नुमाइन्दगी करता है? प्रकटतः जिन्होंने चुना है उनकी, किन्तु वर्तमान में क्या सचमुच ऐसा है? जिन उम्मीदवारों, विशेषतः राजनैतिक दलों के उम्मीदवारों, के बीच हमें चयन करना होता है उनके चयन में उस क्षेत्र के मतदाताओं, लोगों या कम से कम दल विशेष के ज़मीनी कार्यकर्ताओं की क्या कोई भूमिका होती है? अगर हाँ तो मुझे कुछ नहीं कहना, अगर ना तो फिर सचमुच यह लोकतंत्र का नाटक ही तो है.

आप खुद जानते हैं कि व्यवहार में हर राजनैतिक दल में एक हाईकमान जैसा कुछ होता है जो उम्मीदवारी पर फैसले लेता है और, उनकी नज़र में, इस फैसले के लिए सबसे ज़रूरी पैमाना होता है व्यक्ति विशेष का ‘जिताऊ’ होना. लगातार परिपक्व होते जा रहे भारतीय लोकतंत्र में ‘जिताऊ उम्मीदवार’ का मतलब है अनुकूल जातीय या मज़हबी समीकरण…अकूत धन…बाहुबल…लोगों को बरगला / बहका सकने या चमत्कृत कर सकने की योग्यता या फिर पार्टी फण्ड में योगदान कर सकने अर्थात टिकट खरीद सकने की हैसियत. ऐसे में विजेता उम्मीदवार सम्बंधित क्षेत्र या लोगों का प्रतिनिधित्व राजनैतिक दल विशेष में नहीं करता वरन राजनैतिक दल विशेष का प्रतिनिधित्व क्षेत्र या लोगों के बीच करता है. ज़ाहिर है कि ऐसे में लोगों या क्षेत्र का हित पीछे रह जाता है और दल विशेष का आगे, तभी तो लोगों के प्रति निष्ठा की बात की जगह दल के प्रति निष्ठा का ढोल पीटा जाता है. दल की नुमाइन्दगी होती है लोगों की नहीं. दलों की जयजयकार होती रहती है और लोग हाशिये पर डाल दिए जाते हैं. अच्छा ! आप ही बताइए गौतम गंभीर या विजेंदर सिंह या फिर सनी देओल ( आप इसमें ऐसे तमाम कितने ही नाम जोड़ सकते हैं ) अपनी किस योग्यता के बलबूते अपने चुनाव-क्षेत्र या वहाँ के लोगों की नुमाइन्दगी कर पाएंगे? हाँ दल की नुमाइन्दगी आसानी से कर ले जायेंगे क्योंकि उसके लिए किसी भी तरह जीत जाने के अलावा किसी अन्य विशेष योग्यता की ज़रुरत नहीं होती.
अब चूँकि लोक विहीन लोकतंत्र की कोई तकनीक, हमारे दिन प्रतिदिन परिपक्व होते जा रहे लोकतंत्र में, अभी तक विकसित नहीं की जा सकी है इसलिए पांच साल में एक बार अंगुली काली करवाने के लिए लोगों को, लोकतंत्र के हाशिये पर ही सही, अभी हाज़िर तो रहना ही होगा.

मुझे एक और बात कहनी है. सब जानते हैं कि शुरुआत पगडंडी से ही हुई होगी किन्तु समय के बदलने के साथ पगडंडी , कच्ची सड़क से लेकर हाई-वे तक सड़क के अनेक रूप सामने आये हैं. यहाँ तक कि इधर सड़क विशेष की निर्माण-गुणवत्ता का दावा उस पर लड़ाकू ज़हाज़ उतार कर किया जाने लगा है. सड़क है तो मूलतः आवाजाही या यातायात का साधन किन्तु कालांतर में उसका एक अनूठा उपयोग भी विकसित हुआ और यह उपयोग है विरोध की अभिव्यक्ति में “सड़क पर उतरना”. इसकी शुरूआत कहाँ/कैसे/किसके द्वारा की गयी यह तो शोध का विषय हो सकता है किन्तु इसकी लोकप्रियता पर कोई संदेह नहीं है. जब भी किसी समुदाय के हितों की अनदेखी होती है समुदाय इसका सहारा लेता देखा जा सकता है. विद्यार्थी, शिक्षक, कर्मचारी, अधिकारी, दलित, गैरदलित, किसान, दूध-सब्जी का कारोबार करने वाले आदि-आदि सभी उपर तक अपनी आवाज़ पहुंचाने के लिए सड़क पर उतरते हैं. इस 22 अप्रैल को पृथ्वी-दिवस पर तो वाशिंगटन डी.सी. समेत दुनिया के 600 शहरों में विज्ञान को बचाने की गुहार लगाते हुए वैज्ञानिक तक सड़क पर उतर आये थे. “जब तोप मुक़ाबिल हो तो अखबार निकालो” की तर्ज़ पर जब ज़ुल्म मुक़ाबिल हो तो सड़क पर उतरो की स्थिति है. अपने देश का कोई अखबार उठा कर देख लीजिये कोई न कोई समूह सड़क पर उतरा दिखेगा ही दिखेगा. अपने प्राकृतिक रहवास और आवा-जाही के रास्तों पर आदमी की घुसपैठ के खिलाफ़ नेशनल-पार्कों के गजराज भी आजकल सड़क पर उतरने लगे हैं. हमारी शादियों का आधा समारोह भी सड़क पर ही संपन्न होता है, शादी के लिए भी हम सड़क पर ही उतरते हैं. भद्र से भद्र आदमी और परिवार तक इस अभद्रता में शान से शामिल होता है.

आप खूब जानते हैं, नमक-कर पर एतराज़ जताने 1930 में गांधी भी “दांडीमार्च” के लिए सड़क पर ही उतरे थे. समूचा स्वाधीनता आन्दोलन सड़क पर ही आंदोलित हुआ था. धीरे-धीरे गांधी के बाद के भारत में गांधी के उत्तराधिकारियों के चुनाव के दौरान सड़क पर उतरने की शुरूआत हुई और मौजूदा चुनाव में तो विचारधारा / मुद्दे / नीतियाँ / समस्याएं-समाधान सारा कुछ “रोड-शो” के भरोसे है. दो बैलों की जोड़ी से लेकर भाई-बहन, बुआ-भतीजे की जोड़ी, गठबंधन सभी “रोड शो” में हैं.

यह चुनाव हमारे “परिपक्व हो चले प्रजातांत्रिक शब्दकोष” (सौज़न्यःवीरेन डंगवाल) में एक नया शब्द “रोड-शो” तो निस्संदेह जोड़ जायेगा किन्तु मुझे चिंता है कि जिनके विरोध में लोग सड़क पर उतरते हैं उनके खुद सड़क पर उतर आने के मौजूदा धुआंधार सिलसिले के बाद जन-विरोध की अभिव्यक्ति के तरीके के तौर पर “सड़क पर उतरने” की धार तो कुंद नहीं पड़ जायेगी ?

 

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