‘चोर’ और ‘चौकीदार’ निगल गए ‘असल मुद्दे’ !


योगेश भट्ट
April 10, 2019

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कौन कहता है कि चुनाव मुद्दों पर होता है, मुद्दों पर चुनाव होता तो देश की सियासत में ‘हिमालय’ बड़ा मुद्दा होता । जाहिर है हिमालय की चिंता होती तो बहुत हद तक उत्तराखंड के मुद्दे भी उसमें शामिल होते । दुर्भाग्य है कि पूरे देश के लिए ‘लाइफ लाइन’ होने के बावजूद सियासी दलों के एजेंडे से हिमालय गायब रहा । राजनीति का प्रदूषित पर्यावरण हिमालय को लेकर कतई संजीदा नहीं हो पाया है । उत्तराखंड सरीखे संवेदनशील हिमालयी राज्य में भी पूरा चुनाव ‘चौकीदार’ और ‘चोर’ के शोर में ही सिमटा रहा ।

पूरे चुनाव प्रचार के दौरान किसी ने नहीं कहा कि उनके पुरखों के लगाए जंगलों पर जनता को अधिकार दिया जाएगा । कोई नहीं बोला कि पंचेश्वर बांध जैसी योजनाओं को नहीं थोपा जाएगा । किसी ने वायदा नहीं किया कि प्रदेश के हिमालयी राज्यों के लिए विकास का एक अलग माडल तैयार किया जाएगा । राज्य के सूखते प्राकृतिक जल स्रोतों और बुनयादी ढ़ाचे पर किसी ने अपने चुनावी एजेंडे में चिंता जाहिर नहीं की । वन कानून में प्रस्तावित संशोधनों पर भी सवाल किसी ने नहीं उठाया । किसी ने नहीं कहा कि पर्यावरण संरक्षण में अहम योगदान के एवज में उत्तराखंड को विशेष अनुदान दिया जाएगा ।

चुनाव हो तो रहा है मगर जमीनी मुद्दों से अलग सिर्फ हवाई मुद्दों पर । राष्ट्रीय दलों के स्टार प्रचारक और बड़े नेता प्रचार के दौरान मतदाताओं को लुभाने के लिए जुमलों, नारों का सहारा लिया । आत्मीयता दिखाने के लिए स्थानीय बोली भाषा के शब्दों का प्रयोग किया, लेकिन जमीनी मुद्दों की बात नहीं की । राष्ट्रवाद, सर्जिकल स्ट्राइक, कर्ज माफी आदि उत्तराखंड के लिए कोई मुद्दा नहीं है फिर भी जितने वक्त भी चुनाव प्रचार हुआ इन्हीं का शोर रहा ।

बात पहले उत्तराखंड की जिसके लिए मुद्दा हैं उजड़ते गांव, बदलता मौसम चक्र, छूटती खेती किसानी, सूखते जल स्रोत, जल जंगल पर अधिकार, स्थायी राजधानी, रोजगार नीति, महिलाओं पर काम का बोझ, सीमांत गांवों से होता पलायन, संचार और परिवहन की सुविधाएं आदि । उत्तराखंड का मुद्दा है उसकी पर्वतीय पहचान, उसका पर्यावरण, पारिस्थतिकी और संवेदनशीलता । हर बार की तरह इन सब मुद्दों की बात कम से चुनाव के दौर में करना तो बेमानी सरीखा रहा है, जो धुंआधार चुनाव लड़ रहे हैं उन्होंने इनका जिक्र तक नहीं किया ।

यदि राष्ट्रीय परिदृश्य में भी देखा जाए तो सियासी दलों के चुनावी एजेंडे में ‘हिमालय’ की बात प्रमुखता से होनी चाहिए थी । क्योंकि हिमालय की समस्याएं सिर्फ यहां रहने वाले लोगों की समस्या नहीं है, वह पूरे देश की समस्या है । हिमालय के लोग तो अपने संसाधनों का सही से सात फीसदी भी इस्तेमाल नहीं कर पाते, जबकि पूरा देश भरपूर इस्तेमाल करता है । इससे कैसे इंकार किया जा सकता है कि देश में 60 फीसदी पानी की आपूर्ति अकेले हिमालय करता है, फिर भी यहां का जनमानस बूंद बूंद पानी के लिए तरसता है । जो गंगा आज देश की सियासत में बड़ा मुद्दा है, उसकी कल्पना भी बिना हिमालय के नहीं की जा सकती है ।

सच्चाई यह है कि उत्तराखंड सहित देश के तमाम हिमालयी राज्य जो पर्यावारणीय सेवा दे रहे हैं उसकी बहुत बड़ी कीमत है । आंकलन यह है कि अकेले उत्तराखंड ही सालाना 31 हजार 293 करोड़ रुपए की ‘इको सेवाएं’ दे रहा है, जो राज्य के सालाना बजट के तकरीबन 75 फीसदी के बराबर है । स्पष्ट है कि उत्तराखंड को अगर सिर्फ उसकी ‘इको सर्विस’ की कीमत ही मिल जाए तो उत्तराखंड को किसी ‘बैसाखी’ की जरूरत ही नहीं होगी । लेकिन उत्तराखंड का यह दुर्भाग्य है कि हर माह 700 करोड़ का कर्ज सिर्फ
राज्य की व्यवस्थाओं को चलाने के लिए उठाना पड़ता है। अपनी ऊर्जा जरूरत को पूरा करने के लिए पर्याप्त संसाधन होने के बावजूद उत्तराखंड हर साल पांच हजार करोड़ से अधिक की बिजली सालाना खरीद रहा है ।

सिर्फ उत्तराखंड का ही नहीं पूरे हिमालय का यह दुर्भाग्य है कि इसके ‘ठेकेदारों’ ने इसकी चिंता तो की, लेकिन समस्या से निपटने के लिए किया कुछ नहीं । देश के योजना आयोग ने 1992 में डा जे. एस. कासिम की अध्यक्षता में गठित विशेषज्ञों के दल ने जो सिफारिशें की उनका जिक्र आज तक सिर्फ सेमिनारों और बैठकों में ही होता है । इस दल ने व्यापक अध्ययन कर हिमालय विकास प्राधिकरण बनाने ओर अलग से एक मंत्रालय गठित करने की सिफारिश की थी, जिस पर पच्चीस सालों में भी अमल नहीं हुआ ।

वापस मुद्दे पर लौटते हैं, मुद्दा यह है कि मौसम में बदलाव और जलवायु परिवर्तन के दौर में राज्य लगातार दैवीय आपदा जैसी स्थिति का सामना कर रहा है । बाँध परियोजनाओं के चलते लोगों के सामने विस्थापन के कारण आजीविका का संकट मुंह बाए खड़ा है ।

हालात बीते सालों में ज्यादा गंभीर हुए हैं, 1991 के भूकम्प के बाद से उत्तराखंड नाजुक स्थिति में है । इसके बाद से हर साल भू स्खलन और बादल फटने की घटनाएं बढ़ी हैं । भूस्खलन से प्रभावित इलाकों में पेड़ों की कटाई और उनके ढहने से मिट्टी के कटाव की समस्या विकराल बनी हुई है। जैव विविधता के लिये बड़ा खतरा पैदा हो गया है। लेकिन सरकारें न अतीत से सबक ले रही है और न भविष्य की चेतावनी को लेकर संजीदा है । जनू 2013 की केदार जल प्रलय का उदाहरण सामने है । इस प्रलय के लिए जिम्मेदार जलवायु परिवर्तन को माना जा रहा है। इसके बाद से जल संसाधन, वानिकी, आपदा प्रबंधन, ऊर्जा, कृषि,स्वास्थ्य, सड़क परिवहन और पशुपालन के तौर तरीकों में बदलाव किये जाने की बातें उठ रही है । आपदा प्रतिरोधी क्षमता बढ़ाने की जरूरत महसूस की जा रही है । लेकिन केंद्र हो या राज्य की सरकार दोनो का ध्यान केदार आपदा के बाद मूल विषय पर होने के बजाय अपनी ब्रांडिंग पर रहा है ।

सरकार और सिस्टम यह भूल रहा है कि एक और बड़ा संभावित खतरा सामने है, अलग अलग अध्ययनों में वैज्ञानिकों ने निकट भविष्य में हिमालय क्षेत्र में उच्च तीव्रता वाले वाले भूकंप के बारे में चेतावनी दी है । एक अध्ययन के मुताबिक बड़ा भूकंप उत्तर पश्चिम हिमालय के गढ़वाल कुमाऊं क्षेत्र में आने की संभावना है । जिसमें बड़े पैमाने पर जन धन हानि होने की संभावना व्यक्त की गयी है । अमेरिकी भूगर्भ विज्ञानी का भी दावा है कि इस क्षेत्र में भूकंप की तीव्रता 8.7 तक हो सकती है । संभावित खतरे या चुनौती से निपटने की अपनी कोई तैयारी नहीं है, सरकार इस चेतावनी पर गंभीर भी नजर नहीं आती । सरकारों के स्तर पर बातें तो पर्यावरण रक्षा की जाती हैं लेकिन काम ठीक इसके उलट होते हैं।

विडम्बना देखिए कि यह सब जानते-समझते हुए भी भूकम्प और भूस्खलन की दृष्टि से संवेदनशील हिमालय के इस ऊपरी इलाके में ‘आल वेदर रोड’ जैसी योजनाओं पर पर्यावरणीय मानकों की जमकर धज्जियां उड़ायी जाती है । हजारों की तादाद में देवदार सहित दूसरी प्रजातियों के हरे-भरे पेड़ों को काट दिया जाता है । आश्चर्य तो तब होता है जब ‘आल वेदर रोड़’ के लिए कहीं कोई कानून आड़े नहीं आता, और प्रदेश के दो हिस्सों गढवाल कुमाऊं को जोड़ने वाली कंडी रोड पर पर्यावरणीय मानक और वन कानून के चलते काम भी शुरू नहीं हो पाता । आज जरूरत सिर्फ उत्तराखंड के लिए ही नहीं बल्कि पूरे हिमालय के लिए ऐसी नीतियां हैं, जो वैज्ञानिक नजरिये से प्रकृति और विकास के बीच संतुलन बनाती हों।

सच यह है कि ऐसी नीतियां राजनैतिक इच्छाशक्ति के बिना संभव नहीं है । जहां तक उत्तराखंड के हितों का सवाल है तो बेराजगारी और बुनियादी ढांचागत व्यवस्था के लिए जूझते उत्तराखंड के लिए संविधान प्रदत्त विशेष राज्य का दर्जा चुनावी मुद्दा होना चाहिए। ऐसे विशेष राज्य का दर्जा जिसमें प्रदेश की राज्य सेवा में स्थानीय लोगों को ही लिये जाने संबंधी विशेष अधिकार हो । ऐसा विशेष दर्जा जिसमें सामारिक दृष्टि से बेहद संवदेनशील इस राज्य के लिए विशेष भू कानून हो । यही नहीं उत्तराखंड पूरे देश को जो हर साल जो इको सर्विस देश को दे रहा है, उसके एवज में विशेष आर्थिक पैकेज भी चुनाव का मुद्दा होना चाहिए थे ।

सवाल यह है कि यह मुद्दे उठाता कौन ? भाजपा कांग्रेस को इससे कोई सरोकार नहीं इसलिए उनके एजेंडे में यह है नहीं । जो क्षेत्रीय ताकतें राज्य की इन जरूरतों को राजनैतिक मुद्दा बना सकती थीं, उनका कोई सियासी वजूद है ही नहीं । बहरहाल, अब से चंद घंटो बाद प्रदेश के 77 लाख मतदाता देश की पांच लोकसभा सीटों का भविष्य तय करेंगे । निरीह जनता के पास भाजपा और कांग्रेस के अलावा कोई विकल्प नहीं है, अब देखना यह है कि मुद्दों की अनदेखी और विकल्पहीनता के बीच इस बार ‘ ऊंठ’ किस करवट बैठता है ?

योगेश भट्ट

योगेश भट्ट न्यूज़ पोर्टल 'Dainik uttarakhand दैनिक उत्तराखंड' के सम्पादक और डायरेक्टर हैं.