CJI पर यौन उत्पीड़न के आरोप; ये #MeToo से भी बड़ा मामला क्यों है?


nainitalsamachar
April 23, 2019
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भारत के मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई पर एक महिला द्वारा लगाए गए यौन उत्पीड़न के मामले में अब महिला वकीलों के संगठन ‘वुमेन इन क्रिमिनल लॉ एसोसिएशन’ ने एक प्रेस विज्ञप्ति जारी किया है.

उसमें लिखा गया है कि “दर्जे और ताकत में इतना अंतर होने की वजह से हमें लगता है कि आरोप की जांच के दौरान मुख्य न्यायाधीश को अपने पद पर नहीं रहना चाहिए.”

आरोप लगाने वाली महिला मुख्य न्यायधीश के दफ्तर में बतौर जूनियर एसिसटेंट काम कर चुकी हैं.

यौन उत्पीड़न के ऐसे आरोप लगने पर जांच का तरीका और क़ायदा इसी अदालत ने तय किया था. पर फ़िलहाल वो इसे लागू नहीं कर रहा है.

यौन उत्पीड़न की रोकथाम के लिए बनाए गए क़ानून, ‘सेक्सुअल हैरेसमेंट ऑफ़ वुमेन ऐट वर्कप्लेस (प्रिवेन्शन, प्रोहिबिशन एंड रिड्रेसल)’ 2013 का हवाला देकर अब ना सिर्फ़ इस आरोप की निष्पक्ष जांच की मांग की जा रही है बल्कि मुख्य न्यायाधीश के जांच के दौरान पद छोड़ने की मांग भी उठ गई है.

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न्यायपालिका के सामने बड़ा इम्तिहान

सुप्रीम कोर्ट में वरिष्ठ वकील इंदिरा जयसिंह ने बीबीसी से बातचीत में कहा कि ये इसलिए ज़रूरी है क्योंकि संस्थान का प्रमुख रहते हुए व्यक्ति उसके प्रशासनिक कार्य में दख़लअंदाज़ी कर सकता है.

इस मांग पर महिला वकीलों के अलावा एक हज़ार से ज़्यादा लोगों ने हस्ताक्षर किए हैं.

यौन उत्पीड़न की व्यापकता के बारे में जागरूकता फैलाने वाले #MeToo अभियान के दौरान पिछले साल अक्तूबर में सरकार में राज्य मंत्री रहे एमजे अक़बर ने भी अपने पद से इस्तीफ़ा दे दिया था.

20 महिला पत्रकारों ने अकबर पर यौन उत्पीड़न के आरोप लगाए थे. इन महिलाओं का आरोप था कि ‘द एशियन एज’ और अन्य अखबारों के संपादक रहते हुए अकबर ने उनका यौन उत्पीड़न किया था.

भारत के मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई पर लगा आरोप, न्यायपालिका के सामने एक बड़ा इम्तिहान है.

ये गुप्त तौर पर नाम छिपाकर सोशल मीडिया पर की गई शिकायत नहीं, बल्कि क़ानून के तहत एफ़िडेविट के साथ की गई न्याय की सार्वजनिक अपील है. इसकी सुनवाई आनेवाले समय के लिए एक कसौटी बनेगी.

इंदिरा जयसिंह ने कहा, “सुप्रीम कोर्ट की ज़िम्मेदारी है कि वो मामले की जांच के लिए अधिक विश्वसनीयता रखनेवाले लोगों की कमेटी बनाएं, अगर ऐसा नहीं होता तो ये सुप्रीम कोर्ट की विश्वसनीयता को ही कम कर देगा.”

प्रेस विज्ञप्ति में भी कार्रवाई की आलोचना करते हुए कहा गया है कि सुनवाई का मुद्दा इस तरह तय कर के मामले को यौन उत्पीड़न के मुद्दे से मोड़कर दूसरी दिशा में डालने की कोशिश की गई.

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‘न्यायिक शक्ति का दुरुपयोग’

सुप्रीम कोर्ट में की गई अब तक की कार्रवाई सवालों के घेरे में आ गई है.

मुख्य न्यायाधीश के लिए बतौर जूनियर असिस्टेंट काम कर चुकीं एक महिला ने जब उनपर यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया तो जांच के आदेश देने की जगह शनिवार को एक बेंच गठित कर आपात सुनवाई हुई जिसकी अध्यक्षता खुद मुख्य न्यायाधीश ने की.

मुद्दा था, “न्यायपालिका की स्वतंत्रता से जुड़े एक सार्वजनिक हित के मसले” की सुनवाई.

वरिष्ठ पत्रकार और लेखक मनोज मिट्टा सुप्रीम कोर्ट और कानूनी मसलों को अरसे से कवर करते रहे हैं. इस मुद्दे पर बीबीसी से बात करते हुए उन्होंने कहा कि जल्दबाज़ी में सुनवाई के दौरान तय प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया.

“बेंच में अपने को शामिल करके मुख्य न्यायाधीश ने उस सिद्धांत का उल्लंघन किया, जिसमें कहा जाता है कि अपने ही मामले में कोई व्यक्ति जज नहीं हो सकता. अपने न्यायिक अधिकार का दुरुपयोग करते हुए उन्होंने पीड़िता को न सिर्फ़ दोषी ठहराया बल्कि उनकी “आपराधिक पृष्ठभूमि” का हवाला देते हुए पीड़िता को शर्मसार भी किया. न ही शिकायतकर्ता और न ही उनके किसी प्रतिनिधि को अपनी बात रखने का मौक़ा दिया गया.”

उन्होंने आगे कहा कि यौन उत्पीड़न की विस्तृत शिकायत को न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर हमला बताने की कोशिश से मामले को दबाने की बू आती है.

“सुप्रीम कोर्ट के सामने मुख्य न्यायाधीश की अगुआई वाले बेंच के सामने राजनीतिक रूप से संवेदनशील मामलों को देखते हुए ये बड़ी चिंता की बात है कि छुट्टी के दिन स्पेशल सुनवाई सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता के कहने पर हुई. मुख्य न्यायाधीश का इस संकट से अपने को निकालने के लिए मेहता और अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल पर निर्भर होना न्यायपालिका की स्वतंत्रता के लिए शुभ नहीं.”

CJI पर यौन शोषण के आरोप; ये #MeToo से भी बड़ा मामला क्यों है?इमेज कॉपीरइटGETTY IMAGES

गेंद अब जजों के पाले में

पीड़ित महिला ने सुप्रीम कोर्ट के 22 जजों को चिट्ठी लिखकर इन आरोपों की जांच के लिए विशेष कमेटी के गठन की मांग की है.

सुप्रीम कोर्ट में यौन उत्पीड़न के मामलों की सुनवाई के लिए बनी ‘इंटर्नल कम्प्लेंट्स कमिटी’ इस मामले में सुनवाई करने में असमर्थ है.

लेकिन इंदिरा जयसिंह के मुताबिक कमिटी की अध्यक्ष, जज इंदु मल्होत्रा पर ये नैतिक ज़िम्मेदारी है कि वो बाक़ी जजों को मामले की निष्पक्ष सुनवाई करने के लिए राज़ी कराएं.

उन्होंने कहा, “क़ानून भी ये कहता है की इम्प्लॉयर की पीड़िता की तरफ़ ज़िम्मेदारी बनती है कि वो जांच और न्याय प्रक्रिया में उनका साथ दें.”

पीड़िता को न्याय का अवसर मिलेगा या नहीं ये तय करने के लिए गेंद अब सुप्रीम कोर्ट के जजों के पाले में है.

बी.बी.सी. हिन्दी से साभार

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