मृत्यु को मजाक बना देने में उस्ताद हैं हम


अशोक पांडे
January 19, 2019

मृत्यु को मजाक बना देने में उस्ताद हैं हम

नदी किनारे एक बड़े पत्थर पर थका बैठा मैं इंतज़ार कर रहा था कि चिता किसी तरह आग पकड़ ले, जल जाए और झटपट किसी सही से अड्डे पर जाकर कुछ खा लूं. भूख से पेट ऐंठ रहा था. मैं बिना नाश्ता किये यह सुनते ही घर से निकला पड़ा था कि तड़के मोहन की मदर की डैथ हो गयी. दिन का दो बजा चाहता था.

एक साठेक साल का दिखने वाला बाकायदा टुन्न देहाती श्मशान की तीखी उतराई पर ट्रैक्टर के एक पुराने टायर को धकेलता हुआ घाट पर अभी-अभी लगाई गयी दसवीं चिता की बगल में पहुंचा. उसने इतनी गर्मी में भी मुचा हुआ गाढ़ा भूरा स्वेटर और ऊनी टोपी पहन रखे थे. टायर रख कर उसने एक नज़र आसमान पर डाली जैसे टोह ले रहा हो अभी कितनी देर और घाम रहेगा. जेब से बीड़ी निकाल कर सुलगाई और वापस चला गया.

करीब दस मिनट बाद वह फिर से लौटा उसी उतराई पर एक और वैसा ही टायर धकियाने की मशक्कत करने के बाद. इस दफा वह खासा थका हुआ दिख रहा था और पहले से ज्यादा टाईट. हमारी वाली चिता ने अब जाकर सही से आग पकड़ ली थी और दो घंटे में सब निबट जाने की संभावना थी.

सुबह मौत की खबर सुनते ही मैंने ललित को फोन लगाया था. वह रेलवे बाज़ार में किसी परचूनिए की दूकान पर मौत के अनुष्ठान का सामान बंधवा रहा था. वहीं मिलना तय हुआ. आधे से ज्यादा सामान बांधा जा चुका था. मेरे वहां पहुँचते ही परचूनिये ने हम दोनों पर सवाल दागा –“घी कितना रख दूं.” जैसे कि ललित या मैं जीवन भर चिताओं के लिए घी खरीदते रहे हों. ललित ऐसी हर बात पर अतुल के तजुर्बे पर यकीन करने का हिमायती था. अतुल मोहन के घर पर था सुबह से ही. बीस कामों में लगवाकर पंडित ने उसकी खाल में भूसा भर रखा था. उसे फोन किया गया तो उसकी आवाज़ ऐसे बदली जैसे किसी ने उस से उसकी पसंद का वही गाना सुनवाने की फरमाइश कर दी हो. बोला “इससे कै दो कि टीन बाला डब्बा ना देबे गत्ते वाला देबे और खबरदार जो अनिक का घी दिया. अपने सिंधी ब्रदर्स वाला घी लइयो. अब दो चार पांच छै किलो जित्ता सई समजो लीयाना. मैं जा रा फूल लाने और हाँ बांस लइयो मक्खन के यहाँ से …”

अतुल ने फोन काट दिया तो मैंने परचूनिए से कहा कि चार किलो सिंधी वाला घी दे दे. उसके पास नहीं था. मैंने कहा जो है वो बांध दे. उसके पास सिर्फ अनिक का घी था.

अब फिर लिस्ट बाहर निकाली गयी. परचूनिया बोला “चन्दन की लकड़ी कितनी रख दूं?” ललित फिर घबराया तो मैंने ऐसे ही कह दिया “आधा किलो” इसके बाद सामान खरीदने में आसानी हो गयी. मैं जल्दी से जल्दी मोहन के पास होना चाहता था और खरीदारी ख़त्म होने का नाम नहीं ले रही थी.

मोहन के घर के रास्ते भर ललित भूख-भूख करता रहा. वह कल रात भर अस्पताल में था. तड़के जब मोहन की मदर को वेंटिलेटर से हटाया गया था तो उनकी बॉडी गाड़ी में लेकर वही गया था.

छात्र संघ के चुनाव का दिन होने की वजह से परांठे और छोले भटूरे जैसी लज्ज़तदार चीज़ें खिलानेवाले ज़्यादातर ठेलेवाले अपने घरों से बाहर नहीं आये थे. तिकोनिया के पास एक मैकेनिक की दूकान की तरफ इशारा करते हुए ललित ने कहा “आज साला ये परांठे वाला भी नहीं आया. क्या अचार बनाता है साला …” अचार और गर्मागर्म परांठों की याद से उसकी भूख और भी भड़क गयी. मोहन, जो बांस खरीदकर हमारे साथ आ जुड़ा था बता रहा था कि इस दफा छात्र संघ के लिए एबीवीपी वालों ने बड़ी पार्टी का लौंडा फांसा है और उसके सपोर्ट में अकेले सितारगंज से सौ बोलेरो और स्कार्पियो आई हैं.

“इनकी माँ का” कहकर ललित ने कॉलेज के रास्ते से बचने के चक्कर में ज्यों ही गाड़ी टैक्सी स्टैंड वाले चौराहे से मोड़ी, दो मोटरसाइकिलों पर सवार सिर पर गेरुवा पट्टे बांधे छः छोकरे “टैम्पो हाई है” कहते हुए करीब करीब गाड़ी के नीचे आने आने को हो गए. उनके दफा होने के बाद ललित बेकरी के आगे एक पल को इस हसरत से रुका कि वहां जल्दी जल्दी एक सैंडविच पिरो लेगा पर आज वह भी बंद थी. इस बार उसने “इनकी भैन का” कहा और गाड़ी सीधा मोहन के घर पहुंचा कर ही रोकी.

मोहन के घर ज़ाहिर है भीड़ थी. परिचित-अपरिचित कई तरह के चेहरे. अतुल अपनी विशाल काया के साथ भरसक इंचार्ज दिखने की कोशिश कर रहा था. मैं मोहन और उसके डैडी में से किसी एक को देख लेना चाहता था. ऐसे मौकों पर मैं ज़रा भावुक हो जाता हूँ और गमी से रू-ब-रू लोगों से सीधे बात करने से कतराता हूँ. बस उन्हें देख लेना मेरे लिए काफी होता है.

बाहर रेलिंग से दो बछड़े बंधे हुए बां-बां कर रहे थे. एक आवारा मरियल कुत्ते ने जैसे ही उन पर भूंकना शुरू किया अचानक बहुत से लोग एक साथ “हट हट” कहते हुए ढेले खोजने में सन्नद्ध हो गए.

निचली मंजिल के अहाते में कई सारी औरतें बैठी हुई थीं. वहां कोई गतिविधि होती नज़र नहीं आती थी. जब कोई नयी औरत उनसे जुड़ने को आती तो सुबकने की आवाजें कुछ सेकेंडों के लिए ऊंची हो जाया करतीं. सारा कामधाम ऊपर की मंजिल से उतरते चढ़ते मसरूफ लोग करते लग रहे थे. मैं सोच रहा था अभी मोहन क्या कर रहा होगा, अभी पंडित उस से क्या क्या करवा रहा होगा.

अचानक पता चला अतुल तो फूल लेने गया ही नहीं था. इस सूचना को ललित और मोहन ने बहुत गंभीरता से लिया और गाड़ी बैक करने की जगह नहीं थी सो एक दोस्त की स्कूटी मांग कर दोनों तुरंत फूल लेने निकल पड़े.

धीरे धीरे जमावड़ा बनना शुरू हुआ. मोहन के छुटभैये नेता मित्रों की इस नवागंतुक भीड़ में बहुतायत थी. ये लोग अमूमन हर ऐसे मौके पर सबसे पहले पहुँचते और सबसे पहले नड़ी हो जाने में विश्वास रखते थे. हमारे शहर की रामलीला कमेटी का चुनाव अभी अभी निबटा ही था और पहली बार पहाड़ी बहुल इस नगर की इस कमेटी में बनियों की नाक काट कर पहाड़ी कार्यकारिणी चुनी गयी थी. जितनी मेहनत इन चालीस-पैतालीस साल के छात्र नेताओं ने इस चुनाव में की थी किसी राज्य में सरकार बनाने में क्या बीजेपी वालों ने की होगी – यह इन नवागंतुकों की चर्चा का विषय था. वे चर्चा करते हुए हुए आए थे, चर्चा करते रहे, श्मशान में भी चर्चा करते रहे और चरचते हुए अपने अपने प्लाट काटने निकल गए. प्लाट का ज़िक्र मैंने इस लिए किया कि इन दिनों हल्द्वानी में हर कोई प्लाटिंग कर रहा है. फड़ ठेला एसोसोयेशन का एक भूतपूर्व अध्यक्ष बताता है कि इन दिनों गौलापार में पैसा लगाना सबसे समझदारी का काम है और यह कि उसने अभी अभी एक हफ्ते में बारह लाख एक प्लाट से बनाए हैं.

कल रात किसने कितनी दारू पी और किस अफसर की माँ-भैन की, यह सब भी कभी कभी उल्लासातिरेक में बताया जाता था. फिर नई पीढी और मोबाइल फोन को लानतें भेजी गईं. आईफोन के सस्ते रेटों के बाबत पूछा गया. एक सज्जन का मोबाइल सिर्फ अश्लील वीडियोज़ से ठुंसा हुआ था जिन्हें देख रहे उनके पीछे खड़े दो चार लफाड़ी “देख साली को पैन्चो …” कहते हुए अपने गुप्त हिस्सों को खुजाते जाते थे.

ऐसा विद्रूप मैं पहली बार नहीं देख रहा था.

यह वास्तव में उस विद्रूप ड्रामे की शुरुआत थी जिस से अब मेरा सामना होने जा रहा था. वही विद्रूप जिसे मनोहर श्याम जोशी अपनी एक किताब में भदेस बतलाते हैं और जिसका नाम मौत होता है – एक मनुष्य की मौत. इस बार मेरे दोस्त मोहन की माँ इस ड्रामे की अनुपस्थित नायिका बनी थीं, जो मर जाने के बाद अचानक इतनी ज्यादा मर गयी थीं कि वे किसी बातचीत, किसी विचार या सहानुभूति तक में उपस्थित नहीं थीं.

ललित और मोहन को निकले आधे घंटे से ज्यादा हो गया था. भीतर शव को नहला धुला कर टिकटी पर तैयार कर रख दिया गया था. बस फूल आने में देरी हो रही थी. मुझसे कहा गया दोनों को फोन लगाकर पूछूं कितना समय लगेगा. मैंने फोन लगाया, अतुल ने लगाया, राजेश ने लगाया – घंटी बजती रही, जवाब नहीं आया. मेरे भीतर एक चोर कह रहा था कि भुखाना ललित कहीं कुछ ठूंस रहा होगा पर ऐसी इमरजेंसी में … नहीं नहीं . कोई और बात होगी. क्या पता सारे फूल एबीवीपी वालों ने खरीद लिए हों. या कांग्रेसियों ने. पता नहीं. एक घंटे बाद जब फोन उठा तो खीझता हुआ ललित चिल्लाया “बस मोड़ पर हैं … ऐसा जाम लगा रखा है साले लौंडों ने.”

वे फूल लेकर पहुंचे तो दोनों के चेहरों पर खीमा गुरु की दूकान पर सूते गए छोले भटूरों की आभा छाई हुई थी. “आंतें चिपक गयी थीं पैन्चो …” कहता हुआ ललित फूल लेकर घर की तरफ लगा. पांच मिनट में अर्थी निकल चली. अब मैंने पहली बार मोहन को देखा. घुटे हुए सर वाला मेरा दोस्त जाने रो रहा था या पंडित की फरमाइशों से चटा हुआ था या जो भी था, बहुत कमज़ोर और थका हुआ लग रहा था.

गुरुद्वारे के अत्याधुनिक मॉडल वाले स्वर्ग वाहन को देख कर एकाध भौंडे कमेन्ट किये गए. एक बार फिर हम तीन थे – श्मशान की राह. पहले पानी की बोतलें खरीदी गईं. और सिगरेट और रजनीगंधा-तुलसी. मोहन और ललित ने अचानक खीमा गुरु के छोले भटूरों की क्वालिटी इधर के दिनों में गिर जाने के विषय पर अधिवेशन चालू कर दिया. जब वे वहां पहुंचे थे तो माल करीब करीब ख़त्म हो चुका था और भटूरा उस्ताद कारीगर अपने घर जा चुका था. पुराने और रईस गाहकों के आने पर खुद खीमा गुरु ने अपने हाथों से नया आटा तैयार किया और जब दसेक साल का वह नया बच्चा इत्ते बड़े बड़े फूले हुए भटूरे लेकर आया तो बिचारे का चेहरा तक उनके पीछे छुपा हुआ था. “दही बहुत खट्टा था साले का” ललित ने बयान दिया तो मोहन ने कहा “चोर है साला खीमा. इस से अच्छा था तो डेरी का दही अपने साथ ले जाते यार.” यह तीन-तीन भटूरे भकोसे हुए मेरे दोस्त थे जिनके साथ मैं अपने एक और दोस्त की माँ के अंतिम संस्कार के लिए श्मशान जा रहा था.

हम से पहले पहुंचे हुए लोग हमेशा की तरह विभिन्न मुद्राओं में पसरे-बैठे-खड़े थे जैसे किसी डायरेक्टर के “लाईट, कैमरा, एक्शन” कहने का इंतज़ार कर रहे हों. मोहन, उसके जीजा और तीन-चार बुज़ुर्ग पंडित के साथ घाट पर पहुँच चुके थे जहां लाल कपडे से ढंके शव को पैरों की तरफ से नदी के बहते पानी में गीला करने को धर दिया गया था. वे वहां लकड़ियों का इंतज़ार कर रहे थे. ऊपर वन विभाग के टाल में लकडियाँ थीं ही नहीं. सिर्फ जड़ें थीं और थोड़े बहुत फट्टे. इंचार्ज अतुल फोन पर किसी से दो किलो बर्फी लाने का आदेश दे रहा था. हम सब इधर उधर फ़ैली मोटी भारी जड़ों को देख रहे थे. लकड़ी की पर्ची काटी जा चुकी थी और हमीं ने लकडियाँ छांट कर उन्हें सौएक मीटर नीचे घाट तक पहुंचाना था. टाल की बगल में शनि देव के मंदिर का निर्माण ख़त्म होने को था, जिस के लिए मटर गली के एक लालाजी ने ढाई लाख रूपये का दान दिया था और यह सूचना देता हुआ घटिया संगमरमर का पत्थर मंदिर के प्रवेश द्वार पर चस्पां किया जा चुका था. बाहर बरामदे में तीन नालायक बाबा टाइप के प्रौढ़ फल्लास खेलने में व्यस्त थे. एक सिख सज्जन एक पुरानी सीटनुमा समाधि पर बैठे अपने मोबाइल में व्यस्त थे. “ऐसा काम भी साले सरदार ही कर सकते हैं!” कहते हुए किसी ने भद्दी सी गाली थूकी.

टाल की बगल में टीन की चद्दर वगैरह लगाकर एक जुगाड़ बनाया गया है जहाँ से लकडियाँ नीचे घाट के एक वीरान टुकड़े पर सीधे गिराई जाती हैं. फिर वहां से लोग उन्हें पचासेक मीटर दूर कन्धों पर लाद कर चिता बनाने ले जाते हैं. जुगाड़ की चादरें पुरानी पड़ गयी हैं और उनमें बीच बीच में गड्ढे जैसे हो गए हैं. हमने बीस बीस किलो की जड़ें वहां से गिराना शुरू किया तो पहली तीन जड़ें उन गड्ढों में अटक गईं. कोई कहीं से एक बांस लाया, कोई लम्बी लकड़ी और किसी तरह जुगाड़ से काम निकालने के लिए एक दूसरा जुगाड़ बनाया गया. यह बेहद जोखिमभरा काम था और दीवारों से सटे ज़्यादातर तंदुरुस्त लग रहे लोग दूर खड़े होकर धुंआ उड़ाते, गुटखा खाते, थूकते, जुगाड़ में लगे चार पांच लोगों को ऐसी निगाहों से देख रहे थे जैसे ये चार पांच लोग यह काम करने की ट्रेनिंग लेकर आए हों.

लकडियाँ जस तस नीचे पहुंचाई गईं. पांच-छः चिताएं जल रही थीं. कोई धधकी हुई, कोई धुआँती हुई, कोई ख़त्म होने को तैयार. बहुत सलीके से लगाई गयी एक चिता से लपटें उठना शुरू हो गयी थीं. बगल में एसएसबी के कई जवान और अफसर जैसा दिखने का जतन कर रहे कुछ मनहूस प्राणी – जैसे दफ्तर से छुट्टी होने का आजिजी से इंतज़ार कर रहे हों.

मैं पहली बार मोहन के पास पहुंचा, उसके कंधे पर हाथ रखा और चिता बनाने वालों के साथ व्यस्त हो गया. बहुत मुश्किल से चिता लग रही थी. तरीके की न तो लकडियाँ थीं न वैसा काम करने का किसी को अनुभव था. शुरू में तो मुझे यह भी लगा कैसे होगा. सिर्फ जड़ों की मदद से तो काम बनने से रहा. किसी समझदार को यह आइडिया पहले आ गया और वह शहर जा कर टाल से बाकायदा लकड़ियाँ ले आया था. किसी तरह चिता ठीकठाक लग सकी. धूप बहुत तेज़ थी और वहां खड़े-खड़े ज़्यादातर लोगों के चेहरे पसीने से भीग चुके थे. पंडित भी शायद थक गया था सो उसने बिना ज्यादा नखरे किये मुखाग्नि का अनुष्ठान जल्दी शुरू करा दिया.

अब हर कोई छाया और बैठने को पत्थर तलाश रहा था. अपनी अपनी चर्चाएँ चलाते अलग अलग समूह अलग अलग ठीहों पर अट गए. सिर्फ मोहन और उसके एकाध नज़दीकी परिजन वहीं पानी के किनारे खड़े रहे. मेरे साथ मोहन और ललित के अलावे दो चार और यार लोग जुड़ गए थे. एक ने इन्ही दिनों स्पोर्ट्स साइकिल खरीदी थी और वह अपने पैंतालीस पार के फिटनेस कार्यक्रम को लेकर बहुत उत्तेजित होकर साइकिल के गीयरों की खूबी बयान कर रहा था. ललित ने मुझसे सिगरेट माँगी तो मुझे अचानक भान हुआ कि पिछले पांच-दस मिनट से मैं निपट अकेला हो कर मोहन की माता की देह को जलाता हुआ देख रहा था.

अब मेरी निगाह अगल बगल की चिताओं पर अटकना शुरू हुई. ऐसा श्मशान में हमेशा हो जाता है. इसी दौरान लाल कपड़ों से ढंके तीन नए शरीर अपनी चिताएं बनाए जाने की राह देख रहे थे. इन देहों को लाए हुए लोग हकबकाए से उन बचीखुची जड़ों के जैसे तैसे लादकर ला रहे थे और वही सोचते नज़र आ रहे थे जो मैं कुछ देर पहले सोच रहा था. जितने भी बीसेक साल के नौजवान थे वे किसी न किसी मजबूरी में आए थे और इस तथ्य को ज़ाहिर करते हुए हरेक चीज़ से बेहद दूर खड़े होकर अपने मोबाइल फ़ोनों में व्यस्त थे. हमारी पार्टी में सबसे जवान हम ही थे. मुझे इस बात को नोटिस करने के बाद कुछ देर हैरत सी हुई लेकिन बस कुछ देर. सरकारी चिता अब लपक कर धधक रही थी और उसकी राख उड़ कर हर किसी पर पड़ने लगी थी.

रामलीला कमेटी वाली पार्टी जोर जोर से किसी बात पर हंसती हुई पुराने कमेटी अध्यक्ष की किसी बात पर मुदित थी. वहीं खड़े तेजा ने और मैंने एक दूसरे को एक साथ देखा. वह तकरीबन भागता हुआ मेरे पास आया. तेजा यानी तेजिंदर मुझे बहुत पहले से अच्छा लगता रहा है. घर में जब तब पड़ने वाली आपात ज़रूरतों के लिए उसके पास हमेशा एक जुगत रहती थी और सादगीभरी तत्परता. जाने कितनी बार वह अपनी जर्जर मोपेड पर मेरे घर गैस के सिलिंडर ले कर आया होगा. उसके परिवार की एक बच्ची के साथ शहर के एक बड़े गुंडे ने बदतमीजी की थी और जब गुंडा पुलिस की पकड़ में आने के बाद अपनी पहुँच और रसूख के बल पर नकली बीमारी का बहाना बना कर शहर के एक अस्पताल में भरती था, तेजा ने कहीं से एक कट्टा खरीदा और गुंडे को मारने अस्पताल पहुंच गया. उसे यह नहीं पता था कि वहां पुलिस का पहरा भी होगा. उसे पुलिस वालों पर गोलियां दागनी पडीं और वे दोनों वहीं ढेर हो गए. जब तक वह गुंडे तक पहुँचता उसके कट्टे ने काम करना बंद कर दिया. तेजा पकड़ा गया और पुलिस ने उसे ऐसे ऐसे मामलों में फंसाया कि उसे आखिरकार दिल्ली पुलिस ने आतंकवादी कह कर तिहाड़ पहुंचा दिया. जेल में उसने तेरह साल काटे. और उसके बाद से वह मुझे तीसरी या चौथी बार यहीं श्मशान में मिल रहा था. तेजा का हमेशा हंसने वाला चेहरा अब उम्र और पुलिस की मार से पीला हो गया है. लेकिन उसके अनंत चुटकुले अब भी ख़त्म नहीं हुए. उसने मुझे दस-बारह ताज़े लतीफे सुनाए और उसके बाद हम शवों के लिए लकड़ी की अनुपलब्धता पर बात करने लगे.

तेजा कालाढूंगी के जंगलों की बात करने लगा. फिर पहाड़ में काटे जा रहे जंगलों की और आखीर में बोला “हल्द्वानी में एक बिजली वाला मसान होना चाहिए यार. हम सरदार लोग तो मान जाएंगे तुम्हारे पहाडी लोग नहीं मानेंगे.”

इसके बाद मुझे वही भूरी स्वेटर वाला बूढा इस दफा स्कूटर के दो टायर अपने मरियल कन्धों पर पंखों जैसे टाँगे नज़र आया. उसने इतनी पी ली थी कि वह सिर्फ गालियाँ दे रहा था और लड़खड़ा रहा था. अब उसके साथ वाली पार्टी भी शव ले कर आ पहुँची थी. ये बेहद गरीब लोग थे जो पर्याप्त लकड़ी नहीं खरीद सकते थे और जैसे तैसे टायरों और डीज़ल की मदद से लाश फूँक फांक कर घर वापस जाना चाहते थे. कल सुबह उन्हें फिर से रोज की तरह खटना था.

गरीब पार्टी का पंडित भी गरीब था और अंतिम अनुष्ठान के लिए लाया गया सामान भी. अपनी निर्धनता से झेंपे हुए ये बहुत बहुत थोड़े से लोग एक नज़दीकी झुण्ड सरीखा बना कर अपने काम में लगे हुए थे. नाम मात्र की लकड़ी जिस कुशलता के साथ टायरों के साथ जमाई गयी उसे देखकर साफ़ लगता था कि ये लोग ऐसा करने में पारंगत हैं. मुखाग्नि देने के साथ ही एक सज्जन ने जैरीकेन भर डीजल इस तथाकथित चिता पर उड़ेल दिया और सारा माहौल काले धुंए से भर गया. धुंए के गुबार के पसमंजर में उठ रही ऊंची ऊंची लपटों को देख कर दंगे की खबरों के साथ छपने वाली तस्वीरों की याद आती थी.

एक बार को सब की निगाहें उस तरफ उठीं. तटस्थ, बेज़ार निगाहें. गौला नदी के मौसमी चढ़ाव और ऐन श्मशान के ऊपर बन रहे झूला पुल पर जब सीमेंट और लोहे के कॉलमों में मशीनों की मदद से गडगडाहट के साथ माल भरा जाने लगा तो कुछेक धर्मपारायण आत्माएं झूलापुल को बना रहे ठेकेदार की खुशकिस्मती पर रश्क करने लगीं कि अगले को फ़ोकट का रेता मिल जा रहा है. “आधे पैसे तो साला रेता ही खा जाता है ऐसे काम में!” एक ठेकेदारनुमा आदमी विशेषज्ञ बन जाने का कोई मौका नहीं चूकना चाहता और शहर में चारों तरफ हो रहा निर्माण कार्य बहस का नया मुद्दा बन जाता है.

गरीब चिता में आग कम है और काला धुआं ज्यादा. एक बोतल भर डीजल फिर से उडेला जाता है. इस बार डीजल उड़ेलने वाले से थोड़ी सी चूक हुई है. और जलता हुआ डीजल गरीब चिता से बाहर गिरकर नदी पर बहता हुआ दूर तक चला जाता है. यह विजुअल कुछ देर तक किसी रूपक की तरह दर्शकों की आँखों में ठहरा रहता है. यह सारा कुछ तनिक विचलित करने वाला है पर ललित कहता है “अब तो तीन बड़े वाले चाहिए शाम को. तभी थकान उतरेगी.”

हमारी वाली चिता करीब करीब निबट चुकी है. पंडित अचानक एक नया शगूफा हवा में तैराता है. वह मोहन से सीधे नहीं पूछता – मोहन के जीजा को माध्यम बनाकर पंडित पुछवाता है कि अंतिम संस्कार के लिए हरिद्वार जाने की तो कोई योजना नहीं. यानी अगर ऐसी कोई योजना है तो अस्थियाँ समेटी जानी होंगी और वगैरह वगैरह. इस बार बड़ी बड़ी दोस्ताना और धवल मूंछों वाले सत्तर पार के एक बुजुर्ग कमान सम्हालकर पंडित के धंधे को टोटा पहुंचाते हैं – “हमारे इस चित्रशिला घाट का महात्म्य भी कोई कम नहीं है पंडिज्जी. आप अपना काम चालू रखिये.” शव पूरी तरह जल चुका है और अब अधजली भारी भरकम जड़ों-लकड़ियों को नदी में प्रवाहित किया जाना है.

कोई दसेक लोग लकड़ियों को धकियाते हुए नदी में बहाने में व्यस्त हैं. इनमें से कुछ आदतन हरेक बात में बात निकाल लाने में उस्ताद की हैसियत रखते हैं.

“आप समझ लें इन्हीं में शाम को कबाब भूनते हैं मुसलिये साले. ये लकडियाँ यहाँ से गईं और नीचे कब्रिस्तान के नज़दीक इन्हें इकठ्ठा कर के तंदूर जलाते हैं. रामपुर बरेली तक जाती है ये लकड़ी. फ़ोकट में तो कटुवे अपने बाप की हड्डियां भी चबा जाएं …”

इस के बाद किसी भी तरह की बात सुनने का बूता मेरे भीतर नहीं बचा था और भूख से बेहाल हम अब सीढियां चढ़ रहे थे. ऊपर लकड़ी के टाल की बगल में शवयात्राओं के साथ आए हुओं के लिए मिर्च-मसाले से भरपूर आलू और चाय का “चूक” था. अपना तीसरा कटोरा सूतते हुए ललित ने एक संतुष्ट कराह सी निकली – “कितने दिन बाद असली पहाड़ी आलू मिला. महीनों से कोल्ड स्टोरेज का खा खा कर पक गए यार.”

आलू-चूक का हिसाब करने का काम इंचार्ज अतुल का था. बचे पैसे बटुवे के में ठूंसता हुआ वह कह रहा था “धंधा वैसे ये भी सई है यार! बीस रुपये के एक कटोरी आलू. मल्लब दिन में पांच सौ आदमी भी आया तो लगा लो …”

हिन्दी वैब पत्रिका ‘काफल ट्री’ से साभार

अशोक पांडे

एक कवि और सोशल मीडिया पर गुदगुदाने वाले गद्य लेखक के रूप में स्थापित अशोक पांडे हल्द्वानी में रहते हैं. kabaadkhaana.blogspot.in उनका बेहद मशहूर ब्लॉग है और अब 'काफल ट्री' नाम की हिन्दी वैब पत्रिका के मुख्य सम्पादक हैं।