फूट डालो और राज करो..


केशव भट्ट
December 28, 2018

चारेक साल पहले बागेश्वर के डिगी कॉलेज में एक सम्मेलन हुआ था। देश के जाने-माने विद्धानों ने ’राजनीति’ के विषय पर अपनी बातें कहीं। वे वास्तव में विद्धान ही रहे होंगे, क्योंकि मुझे आज भी उन विद्धनों में से एक की बात हर हमेशा मेरे मन में गूजती रहती है

‘जो नीति हमेशा ही राज बनी रहे उसे ही राजनीति कहते हैं ’ उन विद्धानों शख्स की ये बात, जिसे उन्होंने अपने अनुभवों से महसूस किया होगा आज के परिप्रेक्ष्य में एकदम सही प्रतीत होती हैं। हाल-फिलहाल में ही ’राजनीति’ से देश में जात-पात, धर्म में जो ‘वाद’ का जो कीचड़ फैला हुआ है, उससे अंगेजो की ’फूट डालो और राज करो की नीति’ की बरबस याद आ रही है। ऐसा महसूस हो रहा है कि आज हर वर्ग और जाति में नफरत की राजनीति अपने उफान पर आ गई है। इसके पीछे कौन है, ये कोई समझना नही चाहता। हर कोई नफरत की आग में अपने साथ ही अपनों को जलाने में जुटा पड़ा है।

आजकल के ताजा हालातों को ध्यान में रख मैंने जब इतिहास खंगाला तो तब के जमाने की कई बेसिर पैर की ऐसी बातें पता चलीं, जिन्हें आज के हुक्मरान अपने और अपनों के फायदों के लिए सही समझते हैं। अंगेजों की ’फूट डालो और राज करो’ की नीति’ तो 1774 से ही चल रही थी, जिसके तहत हिंदुओं में ऊँच-नीच और प्रांतवाद की भावनाओं में आई लाई गई। लॉर्ड इर्विन के दौर से ही भारत विभाजन के स्पष्ट बीज बो ?दिए थे और माउंटबेटन तक इस नीति का पालन किया गया। बाद में 1857 की असफल क्रांति के बाद से अंगेजों ने भारत को तोड़ने की प्रक्रिया के तहत हिंदू और मुसलमानों को अलग-अलग दर्जा देना प्रारंभ किया।

हिंदुओ को विभाजित रखने के उद्देश्य से ब्रिटिशराज में हिंदुओं को तकरीबन 2,378 जातियों में विभाजित किया गया। गंथ् खंगाले और हिंदुओं को ब्रिटिशों ने नए-नए नए उपनाम देकर उन्हें स्पष्ट तौर पर जातियों में बांट दिया गया। इतना ही पर्याप्त कम नही था तो 1891 की जनगना में केवल चर्मकारों की ही लगभग 1,156 उपजातियों को रिकॉर्ड किया गया। इसके बाद अब तक न जाने कितनी अनगिनत जातियां-उपजातियां बन गई हैं।और अब स्वतंत्रता के बाद से अब तक यही काम हमारे राजनीतिज्ञ भी करते आ रहे हैं। वे भी अंग्रेजों की नीति का पालन करते रहे और आज हिंदुओं को हजारों जातियों में बांट के रख दिया है। ‘बांटो और राज करो’ की नीति के तहत आरक्षण फिर जातिगत जनगणना हर तरह के फाॅर्म में जाति का उल्लेख करना और फिर चुनावों में इसे मुद्दा बनाकर सत्ता में आना आज भी जारी है। गरीब गरीब होता है। वो ये नही जानता है कि हमारी जनसंख्या का फायदा हमें बांटकर उठाया जा रहा है। मैंने सुना था कि जवाहर लाल नेहरू का कहना था कि हम भारत से जातिवाद और गरीबी को मिटा देंगे। लेकिन हो क्या रहा है आज भी हर पार्टी धर्म, जातिवाद और गरीबी के इन्हीं मुद्दों को लेकर लोगों को लड़ाती रहती है, गरीब मरते-खपते रहते हैं और नेता ,ऐशोआराम की जिंदगी जीते हैं।गरीब गरीब ही है। गरीबी और जात-पात मिटाने के लिए न जाने अभी आदमजात को कितने जन्म लेने होंगे। हिन्दुओं और मुस्लिमों के साथ ही जात-पात के नाम पर राजनीति कर रहीं सियासी जमातों की राजनीति की इस असलियत को जब तक हम नहीं समझेंगे कि इनकी वजह से ही हमारे गांव, शहर, घर-मोहल्ले में अशांति फैल रही है, हमारे दादा-दादी के जमाने के प्यार, मैत्री के रिश्ते तार-तार हो रहे हैं, तब तक हम अमन-चैन नहीं पा सकते।

मुझे याद आता है, जब वर्ष 1995 के सितंबर के महीने में मैं हिमालय की पहली यात्रा पर था। इस अभियान में दस लोग शामिल थे। तब बागेश्वर से शामा होते हुए लीती तक सड़क थी। अब तो गोगिना तक आधी-अधूरी सड़क बन ही गई है। तब लीती से पैदल मार्ग शुरू होता था। अपने सामान के साथ पैदल गोगिना गांव पहुंचने में दो दिन लग गए। आगे रामगंगा में बना पुल बरसातों में बाढ़ की भेंट चढ़ चुका था। एक दिन वहीं रुके और दूसरे दिन नदी को रस्सी के सहारे पार कर नामिक पहुंचे।

इस साहसिक यात्रा में मेरे एक मित्र बने जो कि अनुसूचित जाति से थे। उस वक्त से लेकर मुझे और मेरे मित्र को आज तक भी इसका भान नहीं होता है कि अनुसूचित जाति है क्या ? बहरहाल! तब भी हम मित्र थे और आज भी हैं और ताउम्र रहेंगे। नामिक गांव इस यात्रा मार्ग का अंतिम गांव है। आगे खूबसूरत बुग्याल थाला होते हु, चफुवा, रनथन, कुंड, नामिक, हीरामणी, सलग्वार, नंदा नियार रेंज से होते हुए हम कफनी ग्लेशियर के नीचे हरे-भरे बुग्याल में पहुंचे। यहां भी कफनी नदी को रस्सियों की मदद से पार किया।

यहां बुग्याल में भेड़-बकरी वाले चरवाहे अनवालों ने भी अपनी हजारों भेड़ों के साथ डेरा डाला हुआ था। उन्हीं के बगल में हमने भी अपने तंबू तान दिए। हिमालयी क्षेत्र में ठंड बढ़ने के साथ ही अनवाल भी धीरे-धीरे निचले इलाकों को उतरते चले जाते हैं। आज अनवालों का मन शिकार का हुआ तो उन्होंने एक भेड़ शहीद कर दी। उन्होंने हमसे भी पूछा तो हमारे लीडर दो एक किलो मीट ले आए। हमारे इस गुप में चार लड़कियां भी थीं। खाना बनना शुरू हुआ तो लड़कियों में खुसर-पुसर होने लगी। पता चला कि वे शुक्रवार को ’संतोषी माता’ का व्रत रखती हैं और क्योंकि आज शुक्रवार है, तो उन्होंने एलान कर दिया कि, वो आज मांसाहारी भोजन से दूर रहेंगी और उनके हिस्से का बचा दिया जाए। वे अगले दिन इसकी पार्टी करेंगी। इस पर उनके लिए आलू-न्यूट्रीला बना दिया गया। हम सबने मजे से चटखारे लेकर खाने का लुत्फ लिया। सोने से पहले सुबह हमने कफनी ग्लेशियर को पास से देखने का प्लान बनाया तो लीडर ने दो घंटे हमें दिए।

सुबह खुशनुमा थी। हमने चाय पी और कफनी की ओर चल पड़े। समय का भी ध्यान रखना था। कफनी ग्लेशियर की ओर जाते हुए महसूस हो रहा था कि ये तो रेगिस्तान की मृग मरीचिका की तरह था। हम जितना उसके पास जाते, वह हमसे उतना ही दूर होता चला जाता। चलते-चलते एक घंटा हो गया था और ग्लेशियर पास नहीं आ रहा था। लीडर के भय से वापस लौटने को मजबूर हो गये। लौटे तो लीडर खाना बनाने की जुगत में लौटे थे। इस बीच लड़कियों ने अनवालों से पूछा कि, ‘‘आज कौन सा दिन है ?’’ अनवालों ने जब उन्हें बताया कि आज शुक्रवार है तो उनके चेहरों पर हवाइयाँ उड़ने लगी। उनके चेहरों के उतरते-चढ़ते भावों को देख हमें हंसी आ ही गई। रात के उनके हिस्से का बचा मीट हम सबमें बंट गया। लड़कियों को खिचड़ी में ही ’संतोष’ करना पड़ा। न जाने क्यों उस वक्त वह खाना बहुत ही स्वादिष्ट लगा था। मैं जल्द ही अपने खाने से निपट गया, लेकिन भूख अभी भी थी। मेरा मित्र अपनी प्लेट में बचे आखिरी टुकड़े को नोच रहा था। मेरी नीयत उस टुकड़े में थी तो मैंने उसे इशारा कर कहा कि, ‘‘अहा! देखो क्या नजारा है सामने !’’ उसका ध्यान उस ओर गया तो मैंने उसके हाथ से झूठे टुकड़े को छीन पल भर में ही साफ कर लिया। वह भुनभुनाया भी, लेकिन फिर हंसने लगा। वह अब पुलिस में नौकरी करता है। लेकिन बावजूद उसके, उसकी तब की वह मासूम हंसी आज तक भी बरकरार है।

एक किस्सा और याद आया। जोहार घाटी में हम पांच जने ऊँटा धूरा पास के अभियान पर निकले तो मुनस्यारी से लीलम, रड़गाड़ी होते हुए स्यूनी पहुंचे। स्यूनी में देव सिंह सुमतियाल की झोपड़ी में हल्का नाश्ता लिया। पंचपाल उडियार से स्यूनी लगभग चार किमी पर एक सुंदर सा पड़ाव लगा। बोगड्यार में दिन का खाना ले आये की राह पकड़ी। बोगड्यार की ऊंचाई लगभग 2600 मी0 है। पोटिंग ग्लेशियर से आने वाली पोटिग नदी का यहां बोगड्यार में गोरी से मिलना होता है। बोगड्यार से चलने के बाद रास्ते में ‘नहर पानी’ में एक बार रुकने का इरादा किया। लेकिन फिर आये ‘लास्पा गाडी तक जाने का विचार कर चल पड़े। ?गुप्प अंधेरे में लास्पा गाड़ी में फिसलन भरी चढ़ाई को पार कर कौशल्या आमा की ढलान में बनी झोपड़ी में पहुंचे।

कुछ पल में ही बाहर से आवाजें आई और उनमें से कुछेक लोग अंदर आए। वे लोग नेपाली मजदूर थे। आज वे मिलम से आ रहे थे और रात्रि विश्राम के लिए यहां पर रुकना चाहते थे। रिंगाल की झोपड़ी वाली मालकिन ने उन्हें, ‘‘आज मेहमान आए हैं। आगे रुक जाओ’ कह कर विदा कर दिया। हालांकि झोपड़ी में जगह थी। वेे आये स्यूनी पड़ाव को चल दिए। आमा ने बताया कि, ‘ये आईटीबीपी का सामान ढोते हैं। इन्हें आदत है दिन-रात चलने की। अक्सर तो ये मजदूर तो मिलम से एक ही दिन में मुनस्यारी पहुंच जाते हैं।’’

कुटिया छोटी व लंबी थी, जिसके दो हिस्से कर रखे थे। एक में मुसाफिर दूसरे में दोनों बूढ़े-बाड़े। कुटिया के अंदर पत्थरों के बने चूल्हे में जलती लकड़ियों की आग से कुटिया खासी धर्म हो उठी बातों-बातों में हमने उन्हें बताया कि हम सभी बागेश्वर से हैं। कुछ देर बाद दोनों वृद्ध पत्नी-पत्नी का अपनी भाषा में वार्तालाप हुआ। अन्दाजे से हम यह समझ पाए कि ‘’ये तो सब सर्वण हैं। हम इन्हें कैसे खाना खिलाये ? क्या होगा जब इन्हें पता लगेगा कि हम जनजाति वाले हैं ? हमारे हाथ का खाना ये कैसे खायेगे ? क्या करें ?’’

पति-पत्नी के इस वार्तालाप के बाद हम सभी बोल बैठे कि कोई दिक्कत है तो बताओ। वे सिर्फ मुस्करा दिए। इस पर हमने उन्हें बताया कि हम माउंटेनियरों का न तो कोई धर्म होता है और न ही कोई जाति। हम सिर्फ इंसानियत को ही धर्म को मानते हैं। इस पर वे इतने आत्मीय हो गये मानो उनके अपने बच्चे ही आज ?घर आये हों। आमा ने चूल्हें पर हरी सब्जी चढ़ाई और भोजन की बनाने की जुगत में लग गई। आमा से बातें भी होने लगी। नीचे, लास्पा बाढ़ का सुसाट-फुर्राट आमा की बातों में दब गया।

‘‘लास्पा गांव कितनी दूर है यहां से ?’’ पूछने पर आमा बोली, ‘‘दो किमी ही होगा, हमें आधा-एक घंटा लगता है वहां पहुंचने में।’’ आटा गुधने से लेकर रोटी बनाने तक फिर आमा कई बातें बताती चली गई। ‘गांव में 30 के आसपास मवासे हैं। दसवीं तक जनजाति स्कूल के साथ ही गांव में प्राइमरी स्कूल भी है। स्कूल में पढ़ने के नाम पर 15-16 बच्चे होंगे। वे भी स्कूल जाते हैं नहीं। घर वाले ही नहीं भेजने वाले हुए! अब ऐसे में मास्टर ही क्या करेगा ? मास्टर लवराज लसपाल तो पढ़ाने वाला हुआ ही।’’

परिवार में कितने जन हैं, पूछने पर उन्होंने बताया, ‘’बेटा! हमारा परिवार छोटा ही है। दो लड़के हैं। लड़की का धारचूला में ससुराल है। बड़ा लड़का, बहू व नाती ऊपर लास्पा गांव में ही हैं। गांव में बन रहे चैक डैमों में लड़का मजदूरी कर रहा है। छोटा लड़का प्रकाश गाने के साथ ही ढोलक, हारमोनियम, बांसुरी में माहिर है। धरती को देख कर तो उसकी बांसुरी के बोल फूट जाते हैं। बेटा….. ऐसे-ऐसे गाने गाता है कि हर कोई मगन हो जाता है। गांव की पढ़ाई पूरी करने के बाद आगे पढ़ने के लिए मुनस्यारी जाने को तैयार ही नहीं है। वहां जनजाति स्कूल में सब सुविधाएं हैं। हम गरीब लोगों के लिए ये जनजाति वाले स्कूल ही हुए…… अब ये बात प्रकाश को कैसे समझाएं ?’’
खाना तैयार हो गया था। भात, दाल, रोटी व जोहार के खेतों के पालक की टपकी। हम सबको उन्होंने इतने प्यार से खिलाया कि पेट भर जाने के बाद भी वो, ‘’अरे! इतना तो हमारा नाती ही खा जाता है। थोड़ा सा और..।’’ कह खिलाकर ही माने। खाना खा चुकने के बाद नींद में लास्पा गाड़ का शोर लोरी की तरह लगा।

सुबह आमा-बुबू से विदा ली तो आमा को कुछ याद आया और वह अंदर को भागी। थोड़ी देर में जब लौटी तो उसके हाथ में ’ब्रहम कमल’ का फूल था। ब्रहम कमल पकड़ाते हुए वो गले मिलते बोली कि तुम्हारे आने से बहुत अच्छा लगा. आते रहना बेटा..!’’
हमने महसूस किया कि आमा की उस आत्मीयता में कुछ था तो सिर्फ निश्छल प्रेम, जिसमें समाज को नष्ट करने पर तुले, धर्म और जाति नाम के ’नासूर’ कुछ भी नहीं थे। इस तरह के पल मेरी जिंदगी में बचपन से ही आते रहे हैं, जिनकी याद आज के दमघोंटू दौर में वक्त-वक्त याद आती रहती है।

इस ’नासूर’ को अब बहुत तेजी से दोनों वर्गों में अपने को समाज और वर्ग विशेष के खेवनहार कहने वाले कोट-पेंटधारी तथाकथित सफेदपोश फैलाने में लगे हैं। उन्हें इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि नफरत की ये राजनीति समाज को मुख्यधारा से भटकाकर पतन की ओर ले जा रही है। इंसानों के दिमाग में नफरत का बीज बोने वाले दोहरे चरित्र वाले इन चालाक भेड़ियों से हम सभी को सावधान रहना होगा। अपना काम निकालने के वक्त ये पल-पल गिरगिट की तरह रंग बदलने में माहिर होते हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम (एससी/एसटी एक्ट 1989) के तहत दर्ज मामलों में तत्काल गिरफ्तारी पर रोक लगा दी थी। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ भारत बंद करने को होड़ मच गई। केंद्र सरकार को विरोध की आंच में झुलसना पड़ा। देश भर में हुए दलित आंदोलन में कई इलाकों में हिंसा हुई। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के लिए मोदी सरकार को जिम्मेदार मानते हुए दलित समाज ने केंद्र सरकार से अपनी नाराजगी जताई तो मोदी सरकार दलितों की नाराजगी को देखते हुए उक्त एक्ट को उसके मूल स्वरूप में ले आई।

नवभारत टाइम्स में बड़े पदों में काम कर चुके स्वर्गीय जयदत पंतजी से मेरी मुलाकात 1998 में हुई थी। बागेश्वर जिला बनने के बाद वेे बागेश्वर जिले की खबरें भेजा करते थे। ‘उत्तरायणी’ में वे दसेक दिनों के लिए बागेश्वर आए और घर पर ही ठहरे। दिन में, मैं उनके साथं ही रह उनसे पत्रकारिता सीखने की जुगत में लगा रहता था। एक बार वे तत्कालीन मंत्री नारायण राम दासजी के घर मुझे भी ले गए। औपचारिकता के बाद उन्होंने ने दासजी की पत्नी से चाय की फरमाईश कर दी। चाय के साथं बिस्कुट भी आए। चाय की चुस्कियों में हम सभी गपशप मारते रहे और कुछ देर बाद उनसे विदा ली। बाद में पंतजी ने मुझसे पूछा कि, ‘’क्या सीखा ?’’.

मुझे कुछ भी समझ में नहीं आया तो मैं चुप ही रहा। बुजुर्ग पंतजी गंभीरता से बोले, ‘’पत्रकारिता में किसी भी तरह का धर्म, जात-पात नहीं होता…. और हां..!’’ पत्रकारिता में किसी का विश्वास नहीं तोड़ना चाहिए। किसी ने अगर किसी बात को बताते हुए, ’आफ द रिकार्ड’ कही तो उस बात को कभी भी कहीं उजागर नहीं करना चाहिए।’’ पंतजी की वे बातें आज तक भी मेरे जेहन में रहती हैं कि अनजाने में ही सही वो मुझे एक राह तो दिखा गए।

वैसे एक बड़ा सवाल है कि, हम लोग फौज और अर्द्धसैनिक बलों से क्यों नहीं कुछ सीखते हैं, जहां न कोई धर्म होता है न जात-पाँत……
कहीं पढ़ा था कि….
दौर-ए-इलेक्शन मे कहाँ कोई इंसान नजर आता है ?
कोई हिन्दू कोई दलित तो कोई मुसलमान नजर आता है।
बीत जाता है जब इलाकों मे इलेक्शन का दौर
तब हर शख्स रोटी के लिये परेशान नजर आता है।

केशव भट्ट

बागेश्वर निवासी केशव भट्ट पत्रकार होने के साथ-साथ घुमक्कड़ और पर्वतारोही हैं.