लोक परंपरा का जीवंत उत्सव – घी त्यार


nainitalsamachar
August 17, 2018

 

सुन्दर सिंह बिष्ट

दून पुस्तकालय एवं शोध केन्द्र, 21, परेड ग्राउण्ड, देहरादून में शोध सहायक के पद पर कार्यरत

मूलरूप से उत्तराखण्ड एक कृषि प्रधान राज्य है, यहां की सभ्यता प्राचीनकाल से जल, जंगल और जमीन से प्राप्त संसाधनों पर आधारित रही है। जिसकी पुष्टि यहां के तमाम लोक त्यौहार करते हैं, प्रकृति और कृषि का यहां के लोक जीवन में बहुत महत्व है। यहां का समाज अपनी संस्कृति व परम्परा के माध्यम से इन लोक पर्वो को बखूबी प्रदर्शित करता है। उत्तराखण्ड के पर्वतीय इलाको में घी-त्यार एक त्यौहार है जो ‘घी संक्रान्ति’ ‘घ्यू सग्यान’, ‘घिया संग्यान’ और ओलगिया के नाम से भी जाना जाता है। प्रो.डी.डी.शर्मा के अनुसार कुमाऊ मंडल में इस ऋतुत्सव को अधिकाशतः ‘ओलगिया’ नाम से भी जाना जाता है। इस नाम के पीछे मुख्य कारण यह है कि यहां की पुरातन पारिभाषिक शब्दावली में दी जाने वाली विशेष भेंट (उपहार) को ‘ओलग’ कहा जाता था। इस प्रथा के तहत चन्द शासनकाल में पहाड़ के कृषकों तथा भूमिहीन कृषकों (खैकर, सिरतान आदि) द्वारा अपने भूस्वामियों तथा शासनाधिकारियों को दी जाती थी। अंग्रेजी शासनकाल में बड़े दिन की ‘डाली’ के रूप में दी जाने वाली भेंट के समान इस भेंट में विशेष रूप से एक ठेकी (काठ के बरतन) में दही, मक्खन तथा एक मुट्ठी गाबा (अरबी की कोमल कोपलें), भुट्टा, खीरे, दाडिम, अखरोट आदि दिये जाते थे। इसके लिए ‘बड़े दिन’ के समान ही भाद्रपद मास की संक्रान्ति का दिन नियत किया गया था। यह पर्व भादों माह की प्रथम तिथि को मनाया जाता है। मूलतः इसे एक ऋतु उत्सव ही कहा जाता है, जिसे खेतीबाड़ी से जुड़े किसान व पशुपालक उत्साहपूर्वक मनाते हैं।

घी-त्यार भी हरेले की भांति ऋतु आधारित त्यौहार है, हरेला जहां बीजों को बोने और वर्षा ऋतु के आगमन का प्रतीक है, वहीं घी-त्यार अंकुरित हो चुकी फसलों में बालियों के पनप जाने पर मनाया जाने वाला त्यौहार है। इस त्यौहार के समय पूर्व में बोई गई फसलों पर बालियां लहलहाना शुरू कर देती हैं, और स्थानीय फलों यथा दाड़िम, अखरोट आदि के फल भी तैयार होने शुरू हो जाते हैं। लोगों में यह मान्यता है कि अखरोट का फल घी-त्यार के बाद ही खाया जाता है। इसके अतिरिक्त माल्टा, नारंगी आदि फलों के भी फूल अब फलों का आकार लेने लगते हैं। अपनी ऋतु आधारित फसलों में आई बालियों और फलों को देखकर आनन्दित होते हुए, उनके मूर्त रूप लेने की कामना हेतु ही यह त्यौहार मनाया जाता है। यह त्यौहार मात्र कृषि से ही नहीं जुड़ा है, बल्कि पशुधन से भी जुड़ा है। कठिन परिस्थितियों में जिस प्रकार से पहाड़वासी अपने पशुओं को पाल-पोस कर उनकी सेवा करते हैं। वह वास्तव में मानव और पशुओं के बीच बने पारस्परिक संबंधों को विशालता प्रदान करता है। पहाड़ों में बरसात के मौसम में पर्याप्त मात्रा में हरी घास और चारा पशुओं को दिया जाता है।

हरे घास के फलस्वरूप पर्याप्त मात्रा में पशुधन (दू-दही-घी) भी प्राप्त होता है, इस त्यौहार में उनसे प्राप्त पशुधन को भी पर्याप्त इस्तेमाल किया जाता है। इस दिन बेडू रोटी (दाल की भरवां रोटियां) विशेष रूप से तैयार की जाती है और कटोरे में शुद्ध घी के साथ डुबोकर खाई जाती हैं, पिनालू (अरबी) की कोमल और बंद पत्तियों की सब्जी (गाबा) भी इस दिन विशेष रूप से बनाई जाती है, गाबे का साग (सब्जी) बड़ी स्वादिष्ट एवं पौष्टिकता युक्त होता है। गाबे की सब्जी बडे़ चाव के साथ खायी जाती है। घर में घी से विभिन्न पारम्परिक पकवान बनाये जाते हैं। इस दिन किसी न किसी रूप में घी खाना अनिवार्य माना जाता है ऐसी मान्यता है कि जो इस दिन घी नहीं खाता, वह अगले जन्म में गनेल (घोंघा) बनता है। गाय के घी को प्रसाद स्वरूप सिर पर रखा जाता है और छोटे बच्चों की तालू (सिर के मध्य) पर मला जाता है।

आज भी मुझे गांव में बिताये बचपन के दिन याद हैं जब में परिवार के साथ गांव में रहता था और आमा (दादी) जो सुबह ही हमें उठा देती और खेतों से गाबा, अखरोट, भुट्टा, दाड़ीम और अन्य सब्जी लेने के लिए खेतों में भेज देती थी और हम बड़े उत्साह के साथ इन सभी चीजों को ले आते थे। नहा-धो कर और अच्छे कपड़े पहन कर तैयार हो जाने के बाद आमा हमारे तालू (सिर के मध्य) पर ‘घी’ को मलती थी। उसके बाद हम घर पर बने पकवान को सबसे पहले भूमि देवता को चढ़ाने जाते फिर जाकर घर में बने पकवानों का आनंद लेते। शिक्षा व आजीविका के लिए गांव से दूर हो जाने के कारण यह त्यौहार हम से दूर होता गया है परन्तु ईजा (मां) के शहर साथ आने पर अब यह त्यौहार हमारे घर में आज भी बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता है पर कुछ चीजें जो हमें नही मिल पाती हैं वह है गांव का घ्यू, गाबा, दाड़िम व अन्य पकवान जिसका आनंद हम बचपन में लेते थे।

इस दिन घर के मुख्य दरवाजे पर अनाज की एक बाली को गोबर से थापने की भी परम्परा है। बाली इस बात का द्योतक है कि यह त्यौहार प्रकृति, कृषि, पशु और मानव सभ्यता के बीच स्थाई संबंध की तरह बना रहे मजबूत निसंदेह अपनी संस्कृति को समृद्व करने वाला ‘घी त्यार’ एक लोक त्यौहार है।

 

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