खगोल विज्ञान के क्षेत्र में भारत—बैल्जियम अन्तर्राष्ट्रीय कार्यशाला


nainitalsamachar
November 12, 2018

खगोलिय घटनाओं पर हाल ही में हुए प्रेषणों से प्राप्त परिणामों पर विचार विमर्श हेतु बेल्जियम की राजधानी ब्रुसेत्स में स्थित शाही वेधशाला में 9 से 12 अक्टूबर अक्टूबर 2018 एक अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित किया गया, जिसमें भारत, बेल्जियम, रूस, फ्रांस, थाईलैण्ड, स्पेन, एवं जर्मनी समेत तकरीबन 50 खगोलविद भाग ले रहे हैं। यह कार्यक्रम भारत एवं बेल्जियम के वैज्ञानिकों के नेटवर्क (बीना) के तहत आयोजित किया जा रहा है जो कि विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (डीएसटी) भारत सरकार एवं बेल्जियम विज्ञान नीति कार्यालय (बेलस्पो) बेल्जियम सरकार द्वारा वित्तिय रूप से सन 2014 से 2022 तक समर्थित है।

आर्यभट्ट विज्ञान प्रेक्षण शोध संस्थान (एरीज) के वैज्ञानिक डा सन्तोष जोशी एवं रायल वेधशाला बेल्जियम के डॉ पीटर डी कैट के संयुक्त नेतृत्व में दोनों देशों के 18 संस्थानों के 27 वैज्ञानिक बीना नेटवर्क में विगत कई सालों से ब्रह्माण्ड से संबधित रोचक घटनाओं को समझने हेतु इन देशों में उपलब्द्ध दूरबीनों द्वारा प्राप्त प्रेक्षणों का प्रयोग कर रहे हैं। बीना नेटवर्क का मुख्य उद्देश्य भारत और बेल्जियम में खगोल भौतिकी के क्षेत्र में हुए नए शोधों एवं नई प्रौद्योगिकी का उपयोग कर अंतरिक्ष के क्षेत्र में अनुसंधान को बढ़ावा देना हैं। भारत से डा0 सन्तोष जोशी की अगुवाई वाले दल में प्रो0 ए0 एन0 रामाप्रकाश एवं प्रो0 रंजन गुप्ता (आयुका पुणे), प्रो0 अरूणा गोस्वामी एवं प्रो0 गजेन्द्र पाण्डे (भारतीय तारा भौतकी संस्थान बैगलौर) प्रो0 देवेन्द्र कुमार ओझा, प्रो0 अन्वेश मौजूमदार एवं प्रो0 ईश्वर चन्द्रा (टाटा मूल भूत संस्थान मुम्बई एवं पुणे), डा0 वी0 गिरीश (भारतीय अंतरिक्ष शोध संगठन (इसरो) बैंगलौर, शशि किरन गणेश एवं डा0 सचिन्द्र नायक (भौतिकी अनुसंधान प्रयोगशाला अहमदाबाद) डा0 जीवन चन्द्र पाण्डे एवं डा0 योगेश चन्द्र जोशी (एरीज नैनीताल) डा0 एल0 रेश्मी (भारतीय अंतरिक्ष विज्ञान एवं प्रोद्योगिकी संस्थान त्रिवेन्द्रम), प्रो0 हरिन्दर पाल सिंह (दिल्ली विश्वविद्यालय दिल्ली), प्रो0 आलोक कुमार दुर्गापाल (कुमाऊँ विश्वविद्यालय नैनीताल), डा0 नन्द कुमार चक्रधारी (प0 रवि शंकर विश्व विद्यालय रायपुर) बीना नेटवर्क परियोजना में शामिल हैं।
इसी तरह बेल्जियम से डा0 पीटर डी0 कैट के नेतृत्व वाले दल में प्रो0 प्रैट्रिसिया लेम्पम्स, डा0 वाई फेरमेट (शाही वेद्यशाला वेल्जियम), प्रो0 जीन सुरदेज, प्रो0 अन्ना सुरदेज, प्रो0 माइकल डी बेकर (लीज विश्वविद्यालय), प्रो0 एलिएन जोरिसन (बुसेल्स विश्वविद्यालय), प्रो0 केटरीन कोलनबर्ग (कैथोलिक विश्वविद्यालय ल्यूवेन) प्रो0 मार्टिन बेस (घेन्ट विश्वविद्यालय) बीना नेटवर्क में सक्रिय रूप से शामिल है। ब्रहमाण्ड के अनसुलझे रहस्यों में चर्चा के लिये सन् 2016 में प्रथम बीना कार्यशाला का आयोजन नैनीताल शहर में किया गया था जिसमें देश-विदेश के 100 से ज्यादा प्रतिभागियो ने भाग लिया था। इसी क्रम में पिछले दो सालों में भारत एवं बेल्जियम के दूरबीनों द्वारा किये गए परीक्षणों का अधिकतम उपयोग कर ब्रहमाण्ड में होने वाली विभिन्न खगोलिय घटनाओं जैसे आकाशगंगा की उत्पत्ति एवं आकार, तारों का जन्म, विकास एवं मृत्यु, तारों की आंतरिक संरचना का अध्ययन, पृथ्वी के समान अन्य क्षुद्र ग्रहों की खोज एवं उनका विस्तार से अध्ययन एवं अन्य विषयो पर चर्चा के लिए द्वितीय बीना कार्यशाला का आयोजन किया जा रहा है। इस कार्यशाला में देश विदेश के वैज्ञानिक अपने देश में हाल ही हुए शोधों की जानकारी देने एवं अन्य प्रतिभागियो से उनके विचारो का आदान प्रदान करेगें।

द्वितीय बीना कार्यशाला के प्रमुख वक्ता एरीज के पूर्व निदेशक प्रो0 रामसागर, एन0सी0आर0ए0 के पूर्व अधिष्ठाता एवं शांति स्वरूप पुरस्कार से सम्मानित प्रो0 गोपाल कृष्णा, स्पेन के अंतरिक्ष विज्ञान संस्थान के निदेशक प्रो0 इग्नासी रिवास, जर्मनी के अन्ना पासक्वाली, लिओन वेधशाला फ्रांस के प्रो0 फिलिप प्रुगनिल राष्ट्रीय खगोल अनुसंधान संस्थान थाईलैण्ड के डा0 डेविड, विशिष्ट खगोल वेधशाला रूस के डा0 इवगेनी समैन्को हैं। इस अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलन के सफल आयोजन के लिए प्रो0 पेट्रिसिया लैंपस की अध्यक्षता में एक वैज्ञानिक आयोजक समिति का गठन किया गया जिसमें भारत एवं बल्जियम के 3-3 वैज्ञानिक शामिल हैं। इसी तरह प्रतिभागियों के रहन सहन हेतु डा0 पीटर डी0कैट की अध्यक्षता में शाही वैधशाला के वैज्ञानिकों की एक समिति गठित की गई है।

बीना नेटवर्क की लोकप्रियता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि भारत एवं बल्जियम के वैज्ञानिक ही नहीं परंतु अन्य देशों के वैज्ञानिक भी इसमें बढ़-चढकर हिस्सा ले रहे हैं। द्धितीय बीना कार्यशाला में भारत में खगोल विज्ञान के क्षेत्र में प्रमुख प्रेक्षण सुविधाएॅं जैसे देवस्थल स्थित 3.6 मी0 दूरबीन, लेह स्थित 2.0 मी0 हिमालय चन्द्रा दूरबीन, रेडियो तरंगदैघ्र्य में पुणे स्थित जी0एम0आर0टी0, भारत की प्रथम अंतरिक्ष वेधशाला ‘एस्ट्रोसेट’, माउंट आबू स्थित 1.2 मीटर दूरबीन एवं अन्य दूरबीनों द्वारा हाल ही में लिए गये सर्वेक्षणों एवं परिणामों को प्रस्तुत किया जायेगा । इसी तरह बल्जियम स्थित आधुनिक दूरबीनों एवं संबन्धित उपकरणों के माध्ययम से लिए जाने वाले प्रेक्षणों एवं उनसे प्राप्त परिणामों की कार्यशाला में विस्तार से चर्चा की जायेगी ।

9-10-2018

द्धितीय बीना कार्यशाला का उदघाटन समारोह में शाही वेघशाला के निदेशक डा0 रोनाल्ड बान लिडेन बेलेस्पो के प्रतिनिधि डा0 मार्गरिडा फ्रिरेरी एवं 3.6 मीटर दूरबीन निर्माता कंपनी एमोस के डा0 जेवियर वेरियन्स ने सम्बन्धित कार्यकलापों के बारे में अपने विचार व्यक्त किये।

भारतीय दल का नेतृत्व कर रहे डा0 सन्तोष जोशी एवं बल्जियम में द्धितीय बीना कार्यशाला के मुख्य संयोजक एवं डा0 पीटर दी कैट ने बीना नेटवर्क के बारे में प्रतिभागियों को विस्तृत रूप से जानकारी दी। अंत में सभी प्रतिभागियों का धन्यवाद प्रेषित किया।

वैज्ञानिक सत्र के प्रथम दिन में स्पेन के डा0 इग्नासी रिवास ने 4 मीटर दूरबीन द्वारा खगोल भौतिकी विशेष रूप से क्षूत्र ग्रहों के क्षेत्र में हाल ही में हुए खोजों एवं शोघों के बारे में जानकारी दी। जर्मनी के डा0 अन्ना पोस्कोली ने 4 मीटर श्रेणी के दूरबीनों द्वारा वर्तमान में चल रहे सर्वेक्षणों के बारे में प्रकाश डाला। एरीज के डा0 अमितेश ओमर ने 3.6 मीटर दूरबीन में आधुनिक उपकरणों द्वारा लिये गये प्रेक्षणों एवं परिणामों के बारे में बताया।

इसी क्रम में आयुका के प्रो0 ए0एन0 रामाप्रकाश द्वारा वर्तमान एवं भविष्य में 3.6 मीटर दूरबीन से सम्बन्धित उपकरणों के बारे में जानकारी दी। इसी तरह बेल्जियम की तरफ से प्रो0 रास्किन गर्ट एवं प्रो0 हेन्स वान्स ने बेल्जियम के वैज्ञानिकों एवं अभियन्ताओं द्वारा बनाये गए स्पेक्ट्रोग्राफ से प्राप्त किये परिणामों को विस्तार से समझाया। एरीज के डा0 जीवन पाण्डे ने देवस्थल स्थित 3.6 मीटर दूरबीन हेतु उच्च श्रेणी के स्पेक्ट्रोग्राफ के मूलभूत मापदण्डों के बारे में प्रतिभागियों को जानकारी दी जिससे वैज्ञानिक अपने प्रस्तावों को इस उपकरण के हिसाब से तैयार करेंगे। अंत में सभी वैज्ञानिकों ने बेल्जियम एवं भारत में स्थित प्रेक्षण सुविधाओं के अधिकतम उपयोग के बारे में गहन विचार विमर्श किया।

10-10-2018

सम्मेलन के दूसरे दिन बेल्जियम के वैज्ञानिक डा0 गिलसे ओरवान ने देवस्थल स्थित 3.6 मीटर दूरबीन से भविष्य में होने वाले प्रेक्षणों के महत्व के बारे में अपने विचार साझा किये। भौतिकी अनुसंधान प्रयोगशाला के डा0 शशि किरण गणेश एवं लीज विश्वविद्यालय बेल्जियम के डा0 विक्रम प्रघान ने भारतीय एवं बेल्जियम स्थित दूरबीनों द्वारा सौर मण्डल में पाये जाने वाले पिण्डों में किये गये प्रेक्षणों एवं शोघ के बारे में बताया।

एरीज के पूर्व निदेशक प्रो0 रामसागर ने 3.6 मीटर एवं निकट भविष्य में लगने वाली मरकारी युक्त 4 मीटर दूरबीन द्वारा आकाश गंगाओं में पाये जाने वाले तारों पर होने वाले शोधों की संभावनाओं पर विस्तार से प्रकाश डाला। बल्जियम के प्रो0 पेट्रिसिया लपंस, एरीज के डा0 योगेश जोशी, दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रो0 एच0पी0 सिंह एवं कलकत्ता स्थित एस0एन0 बोस संस्थान के डा0 सोमेन मण्डल ने तारों के गुणों को समझाया।

टी0आई0एफ0आर0 के प्रो0 अंवेश मौजूमदार एवं भारत के जबलपुर क्षेत्र के डा0 अभय प्रताप यादव ने भारी तारों के आंतरिक संरचना एवं उनके गठन के बारे में अपने विचार व्यक्त किये। इसी क्रम में शांति स्वरूप भटनागर सम्मान से सम्मानित प्रो0 गोपाल कृष्णा ने सक्रिय आकाश गंगाओं के नाभिक में प्रकाश परिवर्ततन के कारणों का विस्तृत ब्यौरा दिया। आयुका पुणे के डा0 प्रतीक दभादे, भौतिक नुसंधान प्रयोगशाला के डा0 सचिन्द्र नायक, क्राईस्ट विश्वविद्याालय के डा0 अमित कुमार मण्डल एवं उननत भौतिकी संस्थान यमुनानगर दिल्ली के प्रो0 राजीव दुबे एवं लीज विश्वविद्यालय के डा0 डोमिनिक स्लूस ने प्रतिभागियों को अपने शोघ कार्यों के बारे में विस्तृत से जानकारी दी।

11-10-2018

सम्मेलन के तीसरे दिन बेल्जियम के डा0 इमेन्मूल जेहिन ने मध्यम एवं बड़ी दूरबीनों द्वारा सौर मण्डल में उपस्थित छोटे पिण्डों के प्रेक्षण एवं उनसे प्राप्त परिणामों को अन्य वैज्ञानिकों से साझा किया। भारतीय तारा भौतिकी संस्थान के अरिता चक्रवर्ती ने क्षूद्र ग्रहों पर बीना नेटवर्क के अंतर्गत प्रयुक्त होने वाले दूरबीनों द्वारा संभावित प्रेक्षणों एवं सहयोग पर चर्चा की। आयुका के कौशल शर्मा एवं भौतिकी अनुसंधान प्रयोगशाला के शुभाजित कर्मकार ने तारों के मूल गुणों एवं उनके सतह पर पाये जाने वाले धब्बों के कारणों एवं शोधों पर हाल में हुए शोधों के बारे में जानकारी दी। इसरो के डा0 बी0 गिरीश एवं भारतीय तारा विज्ञान संस्थान के डा0 सी0एस0 स्टालिन ने भारत के प्रथम अंतरिक्ष उपग्रह एस्ट्रोसेट द्वारा विगत वर्षों में प्राप्त प्रेक्षणों एवं उनके अध्ययन के बारे में अपने विचार साझा किये। सम्मेलन के तीसरे दिन के अंत में रूस के डा0 इवगेनी सेमन्को ने स्प्रेक्ट्रोस्कोपी के माध्ययम से तारों में प्रकाश परिवर्तनशीलता को खोजने की विधि के बारे में उदाहरण सहित समझाया।

अंत में सभी प्रतिभागियों ने वेधशाला का भ्रमण कर वेधशाला में उपलब्ध दूरबीनों एवं उपकरणों का निरिक्षण किया।

12-10-2018

बीना कार्यशाला के अंतिम दिन भारतीय अंतरिक्ष विज्ञान एवं तकनिकी संस्थान की प्रो0 आनन्दमईतेज नेभारी तारों के बनने की प्रक्रिया को विस्तृत रूप में समझाया। भारतीय तारा व भौतिकी संस्थान की प्रो0 अरूणा गोस्वामी ने 2.0 मीटर दूरबीन द्वारा विगत वर्षों में लिए गए प्रेक्षणों एवं उनके विश्लेषण के बारे में जानकारी दी। इसी संस्थान की शोध छात्रा कु0 मीनाक्षी ने कार्बन युक्त तारों की स्पेक्ट्रोस्कोपी अध्ययन के बारे में अपने विचार व्यक्त किये। एरीज की शोधार्थी डा0 आरती जोशी ने आप्टिकल एवं एक्सरे तरंगदैध्र्य में पोलार्स प्रकार के तारों के गुणों के बारे में समझाया। एरीज के ही डा0 संतोष जोशी जो कि भारत के बीना नेटवर्क के समन्वयक भी हैं, ने रासायनिक रूप से भिन्न व अजीव किस्म के तरों पर हाल ही में लिए गये प्रेक्षणों एवं परिणामों को प्रतिभागियों से साझा किया। थाईलैण्ड के राष्ट्रीय खगोल संस्थान के डा0 डेविड ने दक्षिण अफ्रीका स्थित विश्व की सबसे बड़ी दूरबीन द्वारा बाइनरी तारों के क्षेत्र में हुए शोधों एवं भविष्य में उनकी महत्ता पर प्रकाश डाला। लीज विश्वविद्यालय के डा0 मिशेल बेकर ने पुणे भारत में स्थित विशाल मीटर रेडियो दूरबीन द्वारा टकाराऐ बाईनरी तारों के प्रेक्षणों के गुणों को रेखांकित किया।

इसी क्रम में कलकत्ता के एस0एन0 बोस संस्थान के प्रो0 सोमेन मण्डल ने बौने तारों की अवरक्त तरंगदैघ्र्य में प्राप्त भौतिक गुणों को समझाया। तदुपरान्त घैन्ट विश्वविद्यालय बैल्जियम के प्रो0 मार्टिन बेस ने बहुतरंगदैघ्र्य क्षेत्र में हमारी आकाश गंगा के बाहर की आकाशगंगाओं के विषय में हुए शोधों की जानकारी दी। इसी विश्वविद्यालय की कु0 मार्जोरी डीक्लेअर ने धूल कणों द्वारा आकाशगंगाओं से आने वाला प्रकाश को रोकने की प्रक्रिया समझाई। अंत में एरीज के डा0 आलोक चन्द्र गुप्ता ने ब्लाजार में प्रकाश परिवर्तन की घटना को बहुतरंगदैघ्र्य के माघ्ययम से खोजने की विधि बताई। सम्मेलन के अंतिम दिन लिओन वेधशाला फ्रांस के प्रो0 फिलिप प्रुग्निलने द्​​वितीय बीना कार्यशाला का सारांश एवं भविष्य की संभावनाओं पर प्रकाश डाला। समापन समारोह के अंत में देश विदेश के वैज्ञानिकों ने बीना नेटवर्क को और अधिक फैलाने एवं विकसित करने के संबध में अपने विचार व्यक्त किये।

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