ये जो तुम हवा में उड़ते हो


nainitalsamachar
April 19, 2019

Image result for jet airways last flight

-इस्लाम हुसैन

2012 या 13 की बात रही होगी, ट्यूटर में मेरी मित्र सूची में सम्मलित बंगलौर की एक मश्हूर औद्योगिक हस्ती* (*किरन मजूमदार शा) ने अपने ट्विटर हैंडल से एयर इंडिया की खराब सेवाओं पर व्यंग करत हुए इसे जनता के धन की बर्बादी और उस पर बड़ा बोझ बताया…उन दिनों एयर इंडिया को संकट से उबारने के लिए सरकारी मदद देने की बात चल रही थी।

हालांकि मैं अपने ट्यूटर हैंडल पर कविता और शायरी से इतर पोस्ट डालने से बचता था, फिर भी सार्वजनिक सेवाओं को समर्थन देने की अपनी आदत के चलते मैंने कुछ प्रतिवाद से उनकी बातों का खण्डन करते हुए विजय माल्या की बदहाल निजी एयरलाइंस किंग फिशर द्वारा की गई बैंकों के धन की बर्बादी का उदाहरण दिया।

अपनी पूंजीपति बिरादरभाई की यह आलोचना वह हस्ती नहीं सह सकी और जवाब दिया कि वह तो कर्ज है। तब मैंने उन्हें समझाया कि वह भी पब्लिक मनी है। लम्बी बहस के बाद मेरे जवाब से उन्होंने अल्टीमेटली यह मान तो लिया कि यह भी पब्लिक मनी है पर इस विवाद की परिणिति यही हुई कि मैंने उन्हें या उन्होंने मुझे अपने सानिध्य से हटा दिया क्योंकि उस बीच किंगफिशर के डूबने की खबरे आने लगी थीं। बंगलौर में एक बहुराष्ट्रीय कम्पनी में काम करने वाली मेरी बेटी अपने बाप के साथ उद्योगों के उस बड़े चेहरे से हुए विवाद से चिन्तित हो गई थी।

कल जब जैट एयर के बंद होने की खबरें आई तो मुझे अपने साथ हुआ यह विवाद याद आ गया। जरा देखिए, जैट एयर जैसे सार्वजनिक उपक्रम की बीमारी बढ़ाकर और इस एयरलाइंस को ग्लूकोज की डबल डबल बोतलें चढ़ाकर जो मोटा किया गया था उसी का नतीजा था कि फूल कर कुप्पा हुई जेट एयरलाइंस की दशा हवा निकले गुब्बारे की सी हो गई है। और इसी के साथ 20-30 हजार लोगों का भविष्य अनिश्चित हो गया। गरीब देशों में पल रहे पूंजीवाद की यही अन्तिम नियति है। पूंजीवाद से सम्पन्नता लाने के न जाने कितने सपने उजड़े हुऐ सैकड़ो औद्योगिक में में बिखरे पड़े है।

भारत में सार्वजनिक संस्थानों के धुर आलोचक व स्वतंत्र पूंजीवादी व्यवस्था के पक्षधर उसके इस तरह के पक्षपोक्षण पर और परजीवियों की भांति पलने की उनकी प्रवृत्ति पर कुछ नहीं कह सकते। हवाई जहाज की सस्ती से सस्ती टिकटें खोजने वाले निजी औद्योगिक घरानों के समर्थकों ने कभी यह जानने समझने और तार्किक होने का प्रयास नहीं किया कि रेल से सस्ती हवाई सेवा का नारा उनके आर्थिक भविष्य को समाप्त कर सकता है।

एयर इंडिया के भारी खर्चे और एकाधिकार को तोड़ने के लिए प्रमोट की गईं एयर लाइनों पर स्थापना के समय से ही सस्ती और अच्छी सेवाएं देने का दबाव रहता है और यही दबाव न केवल देश की जनता के साथ आर्थिक ब्लेकमेल है बल्कि सार्वजनिक प्रतिष्ठानों/ सेवाओं की बदहाली का रास्ता भी है।

सस्ती और अच्छी फ्लाइट के टिकट पर झपट्टा मारने के लिए हरसमय चौकन्ने रहने वाले लैपटापिया लोग कभी नहीं जान पाएंगे कि वह दूसरी परिवहन सेवाओं की ऐसी तैसी करके हवाई सेवाओं का लुत्फ़ उठा रहे हैं यदि ऐसा नहीं होता तो एक दशक से विमान कम्पनियों की इतनी दुर्गति नहीं होती।

कमाल की बात यह है कि इस बीच सड़क परिवहन के किराए में कई गुना बढ़ोतरी हो चुकी है। रेल का किराया भी पिछली सरकार तक बढ़ चुका है पर हवाई जहाज का किराया कम होता रहा। पिछले 30-35 सालों में बसों का किराया 20-25 गुना बढ़ चुका है जबकि घरेलू एयरटिकट चार से छ: गुना बढ़े हैं। 30 साल पहले दिल्ली बम्बई का एयर टिकट 1500 था आज 6000 है,  इस अवधि में रेल का किराया भी आठ-दस गुना तक बढ़ा है।

यदि सोने की कीमत और मौजूदा वेतन भत्तों को आधा मानकर उसके 50% का फार्मूला लगाया जाए तो इस समय दिल्ली, बम्बई का एयर टिकट कम से कम 15000 होना चाहिए। हर वस्तु सेवा के दाम बढ़े, लेकिन नहीं बढ़े तो हवाई जहाज के किराए नहीं बढ़े, अब इसका नकारात्मक प्रभाव कहीं तो पड़ना है और वह पड़ रहा है। इस तरह पिछले 25-30 सालों में लाखों करोड़ रुपया भारत जैसा गरीब देश हवाई जहाज की अय्याशी में बर्बाद कर चुका है इसका प्रमाण यह है कि पिछले 20-25 सालों में करीब एक दर्जन से ज्यादा विमानन कम्पनियां खुलकर बंद हो चुकी हैं जिनमें सहारा डेक्कन, मोदीलुफ्त, किंगफिशर जैसी बड़ी तामझाम वाली कम्पनियां शामिल हैं।

और एयर इंडिया की हालत इतनी बुरी है कि इसको खरीदने वाला कोई खरीदार नहीं मिल रहा है। पिछले साल तक इसको 55 हजार करोड़ का घाटा हो चुका था और करीब इतना ही इस पर कर्ज चढ़ चुका है। किंग फिशर बैंकों का 9000 करोड़ डुबा चुकी है। उसकी अपनी पूंजी जो डूबी सो डूबी। जेट एयर पर भी 8000 करोड़ का कर्ज चढ़ गया है और इतना ही घाटा हो चुका है, यह कम्पनी केवल 2016 में अल्पकाल में फायदे में तब तब बताई गई थी जब तेल के दाम निचले स्तर पर थे और इसे विदेशी निवेश मिला था। तब सरकार ने इससे आर्थिक मोर्चे पर अपनी सफलता का प्रचार भी किया था।

दरअसल पूरे विमानन उद्योग में ऊपरी टीम-टाम और दिखावे के अलावा स्थाई खर्चे बहुत हैं। आम उपभोक्ताओं के सापेक्ष सस्ता ईंधन भी विमानन उद्योग का सबसे बड़ा खर्चा है जिनको लगातार झेलना विमानन कम्पंनियों की मजबूरी है। जेट के मामले में भी यही हुआ। याद कीजिए यूपीए शासन के दौरान जेट ने अपने खर्चों को कम करने के लिए बड़ी संख्या में कर्मचारियों की छटनी कर दी थी। बाद में चौतरफा दबाव पड़ने पर नरेश गोयल ने बड़े भावुक होकर कर्मचारियों को वापस लिया था। ऐसा कई बार हो चुका था।

पिछले साल से जेट की सेवाओं को कई बार ब्रेक लग चुका है। कभी लीज पर लिए विमानों का किराया नहीं दे पाए, कभी रनिंग खर्च के लाले पड़े। इस बार जेट के संस्थापक/ अध्यक्ष नरेश गोयल पहले ही इस्तीफा देकर निकल लिए अब वह फिर जेट की नीलामी में बोली लगाने के जुगाड़ में हैं।

विमानन उद्योग में कर्मचारियों का वेतन हमेशा से उच्चतम स्तर पर रहा है। आजकल निचली श्रेणी के कर्मचारियों के कम वेतन/ सुविधाओं की चर्चा होती है पर उच्च स्तर के कर्मचारियों की सुविधाएं अकल्पनीय रही हैं फिर जबसे विदेशी कर्मचारियों को सेवाओं में रखने का चलन बढ़ा यह अन्तर और भी बढ़ गया। इसके साथ ही डालर के मुकाबले रुपये की कमजोरी से विदेशी स्टाफ और सहयोगी विदेशी कम्पनियों पर आने वाला खर्च बढ़ गया।

विमानन कम्पनियों की बाहरी चमक दमक से प्रभावित होकर हमारी युवा पीढ़ी उस तरफ भागती है। इसी अदम्य इच्छा की पूर्ति के लिए पूरे देश में अनेक छोटे बड़े संस्थान खुल गए जिसमें विमानन उद्योग के कर्मचारी तैयार होने लगे।

जरा कल्पना कीजिए इन दैत्य विमानन कम्पंनियों द्वारा किए जा रहे लगातार नुकसान की। यह पैसा कहीं बाहर से नहीं आ रहा है यह सब नुकसान दरअसल हमारी सार्वजनिक परिवहन सेवाओं से लेकर स्वास्थ्य, शिक्षा व अन्य सुविधाओं को बर्बाद कर रहा है। विमानन कम्पंनियों से लाभ लेने वाला वर्ग लगातार अपनी सुविधाओं के लिए ऐसे ही सार्वजनिक धन की बर्बादी करता और कराता रहता है। सड़क परिवहन या रेल सुविधाओं के लिए जब भी बात आती है तब यही वर्ग इसमें लाभ हानि के आंकड़े फिट करता रहता है।

इसके सापेक्ष दिल्ली की मैट्रो का किराया इसलिए बढ़ाया जाता है कि उसमें भीड़ जरा कम हो अर्थात मानसिक रूप से दिवालिया तंत्र यह नहीं सोचता कि अकेली मैट्रो न केवल शहरी परिवहन के बोझ को कम करने के लिए चलाई जानी आवश्यक है बल्कि पर्यावरण संरक्षण के लिए भी आवश्यक है। जलवायु परिवर्तन के लिए एकल आंदोलन चलाकर मशहूर हुई स्वीडन की 15 वर्षीय बालिका ग्रेटा तो ट्रेन में ही यात्रा करने को ही कहती है क्योंकि हर हवाई जहाज की उड़ान धरती का क्षय कर रही है।

उत्तराखंड जैसे राज्य में जब वायु सेवा की बात होती है तो मुझे इसकी आत्मघाती आर्थिकी डराती है और अब तो पिछली घटना से तकनीकी भी डराती है। क्योंकि जिस तरह से पिछले प्रयोग हुए हैं वह न तो राज्य की अर्थव्यवस्था के हित में होगा और न यहां की जनता के लिए। बेहतर यही है कि सरकार तबाह होती जा रही सार्वजनिक परिवहन सेवा को चुस्त दुरुस्त करे।

nainitalsamachar