कैलाश पपनै को याद करते हुए


nainitalsamachar
February 11, 2019

उर्मिलेश

मुझे समझ में नहीं आया, दिल्ली में इतने सारे उत्तराखंड-मूल के पत्रकार रहते हैं, फिर राजीव लोचन जी ने वरिष्ठ पत्रकार कैलाश पपनै पर श्रद्धांजलि लेख के लिए मुझसे क्यों संपर्क किया ? शायद, इसलिए कि कैलाश जी और हम काफी समय तक दिल्ली स्थित ‘हिन्दुस्तान’ अखबार के एक ही विभाग में एक साथ काम करते थे। उनकी बहुत सारी स्मृतियां हैं। वह मुझसे सीनियर थे, उम्र में भी और तजुर्बे में भी। पर वह भी हमारी तरह ही हाड़-मांस के जीव थे। अगर हमारे अंदर बहुत सारी कमियां और कुछ खूबियां होंगी तो उनके अंदर भी यह थीं। सबसे बड़ी एक खूबी थी कि वह बहुत सज्जन और संजीदा इंसान थे। दिल्ली के महानगरीय-जंजाल में ऐसी सज्जनता को उन्होंने कैसे बचाए रखा, यह सोचकर अचरज होता है। तमाम जगहों की तरह उनके अपने प्रदेश से आए बहुतेरे पत्रकारों और अन्य प्रोफेशनल्स को मैंने देखा है कि दिल्ली आकर कैसे वे ‘तेजी से आगे बढ़ने’ के सारे दांव-पेंच और दंद-फंद फौरन सीख लेते हैं। पर कैलाश जी नैनीताल से जिस तरह का व्यक्तित्व, विचार और संवेदन लेकर दिल्ली आए, उन्हें राजधानी में व्याप्त तमाम तरह के प्रदूषण का जहर भी दागदार नहीं कर सका। भौतिक प्रदूषण का असर शरीर पर पड़ना तो लाजिमी है और उसका असर कैलाश जी पर भी पड़ा। बाद के दिनों में बीमारियों ने घेरा। पर विचार के प्रदूषण से वह निरंतर जूझते रहे और उसे कभी जीतने नहीं दिया।

कैलाश जी से मेरी पहली मुलाकात सन् 1997 में हुई। ‘नवभारत टाइम्स’ में अपनी लगभग साढ़े आठ साल की सेवा के बाद मैंने सन् 1995 में ‘हिन्दुस्तान’ ज्वाइन किया। लेकिन मेरी पहली पदस्थापना पंजाब ब्यूरो में चंडीगढ़ थी। सन् 1997 के फरवरी में दिल्ली तबादला हुआ। उन दिनों अखबार के दिल्ली राजनीतिक ब्यूरो में कुल सात या आठ लोग थे। सत्यवीर त्यागी ब्यूरो चीफ थे। उन दिनों हिन्दुस्तान टाइम्स ग्रुप मे ब्यूरो चीफ बड़ा पद माना जाता था। जहां तक मुझे य़ाद आ रहा है, कैलाश जी और मैं, दोनों ही प्रमुख संवाददाता थे। बाद में दोनों विशेष संवाददाता बने, कैलाश जी पहले और मैं बाद में। कुछ समय बाद शैलेंद्र जी के अवकाशग्रहण के बाद कैलाश जी को ब्यूरोचीफ बनाया गया। उन दिनों हमारी प्रधान संपादक मृणाल पांडे थीं। मृणाल जी के बाद दूसरे नंबर पर प्रमोद जोशी पदासीन थे। जोशी जी आलोक मेहता के संपादकत्व काल में ‘आए थे। तब तक उन्हें कोई खास महत्व या जिम्मेदारी का पद नहीं मिला। बस दफ्तर में जगह मिल गई थी। उऩकी नियुक्ति को लेकर संपादकीय विभाग में विवाद था। कुछ ही दिनों बाद मृणाल पांडे के प्रधान संपादक निय़ुक्त होने के साथ ही प्रमोद जोशी की चांदी हो गई। वह संपादकीय विभाग में चमकने-चहकने लगे। एक दिन पता चला कि कइयों को लांघते हुए वह संपादकीय विभाग में ‘नंबर-दो’ बना दिये गये। सच पूछिये तो ‘नंबर-वन’ हो गये। मृणाल जी तो नाम की संपादक थीं, संपादक का असल काम प्रमोद ही करने लगे। मृणाल जी सिर्फ वरिष्ठ सहयोगियों के साथ एकाध बैठकें करती थीं और रविवार को संस्कृतनिष्ठ क्लिष्ट हिन्दी में अपना एक कॉलम लिखती थीं। उन दिनों दिल्ली से लेकर पटना तक शोर था कि बिड़ला जी के ‘हिन्दुस्तान’ में आजकल दो ही तरह के लोगों की चलती है-‘उत्तराखंड पृष्ठभूमि के कुछ खास पत्रकारों’ की या फिर उनके लिए ‘पहेलवानी करने वाले अन्य लोगों की।’ अखबार के क्षेत्रीय संस्करणों में स्थानीय संपादक या समाचार संपादक के पद पर उत्तराखंडी पृष्ठभूमि के एक खास वर्ण के पत्रकारों की धड़ाधड़ नियुक्तियां हुईं। यहां तक कि बिहार संस्करण में भी सीनियर पद पर एक ‘ऐसे ही पत्रकार’ को भेज दिया गया। हम सबने देखा, उस दौर में भी कैलाश पपनै क्षेत्र, वर्ण या जाति की संकीर्णताओं से बहुत दूर खड़े रहे। अनेक मसलों पर वह अखबार के कार्यकारी संपादकीय नेतृत्व की आलोचना से भी नहीं चूकते। प्रमोद जोशी के रवैये की तो औपचारिक-अनौपचारिक बैठकों में भी कई बार आलोचना की।

मेरे जैसे व्यक्ति के सामने अजीब स्थिति पैदा हुई। अपने छात्रजीवन से ही मैं दिल्ली में उत्तराखंड के आंदोलन और आंदोलनकारियों का सक्रिय समर्थक माना जाता था। गिरदा, शमशेर सिंह बिष्ट, पीसी तिवाड़ी और प्रदीप टम्टा सरीखे ढेर सारे लोगों से छात्रजीवन में ही रिश्ते बने। दिल्ली या इलाहाबाद प्रवास के दौरान मंगलेश डबराल और वीरेन डंगवाल जैसे वरिष्ठ मित्रों का हमेशा साथ मिला। जेएनयू के पुराने साथिय़ों मोहन थपलियाल, प्रभारी नौटियाल और त्रिनेत्र जोशी जैसे लोगों का भी स्नेह रहा। उत्तराखंड के साथ एक गहरा अपनापन सा था जो आज तक है। लेकिन अखबार के दफ्तर में अजीब अनपेक्षित माहौल बन गया। उसी उत्तराखंड के ‘कुछ लोग’ हमारे जैसे अनेक पत्रकारों के ‘उत्पीड़क’ बन गये। और हमें मालूम भी नहीं कि वे हमे क्यों सता रहे हैं ? हम जैसों से इस कदर क्यों कुपित हैं ? कैलाश पपनै का बड़प्पन और वस्तुनिष्ठता देखिये कि दफ्तर के उस बेहद विभाजनकारी और दमघोंटू माहौल में भी उन्होंने अपना नाम किसी खेमे से नहीं जुड़ने दिया। उत्तराखंड और वहां की विरासत से अपने जुड़ाव को जीवंत रखने के बावजूद उन्होंने पैदाइश के अपने क्षेत्र या बिरादरी को अपनी पहचान पर कभी हावी नहीं होने दिया। वह पत्रकार पपनै ही बने रहे!

कैलाश जी के बारे में एक बात और! वह अच्छी तरह जानते थे कि मृणाल-प्रमोद की टीम जब तक ‘हिन्दुस्तान’ अखबार चला रही है, तब तक मेरे जैसे आदमी के लिए अखबार में लिखने या प्रमोशन पाने की संभावना बिल्कुल ही नहीं है। ‘शंटिंग’ के दिन जारी रहेंगे। एक दिन उन्होंने सुझाव दिया, ‘‘उर्मिलेश जी, आप क्यों नहीं ब्रॉडकासिं्टग मीडिया में चले जाते! आपके पास हुनर है, पढ़ाई-लिखाई है, आवाज और बोलने का अच्छा अंदाज है। आप देखिय़े, रेडियो पर आप कितना जमते हैं! इस बारे में गंभीरता से सोचिए। यहां क्या बचा है आपके लिए कि इंतजार कर रहे हैं?’’ टीवी पत्रकारिता में मेरी खास रुचि नहीं थी। लेकिन पपनै जी पता नहीं क्यों मुझे अक्सर रेडियो-टीवी पत्रकारिता के लिए प्रेरित करते रहे। तत्काल तो मौका नहीं मिला। मृणाल जी के कार्यकाल में ही ‘हिन्दुस्तान’ से इस्तीफा देकर मैं ‘भास्कर ग्रुप’ के नये आर्थिक अखबार में राजनीतिक संपादक बनकर चला गया। फिर पौने दो साल बाद मुझे राज्यसभा टीवी (आरएसटीवी) का प्रथम कार्यकारी संपादक बनने का मौका मिला। फोन पर कैलाश जी ने बधाई दी। बाद में कहीं कैलाश जी से मुलाकात हुई। वह आरएसटीवी के प्रदर्शन से बहुत खुश लगे। चैनल के कई कार्यक्रमों की तारीफ की। उन्होंने मुस्कराते हुए कहा: ‘‘उर्मिलेश जी, अब आप सही जगह पहुंचे हैं!’’ बहरहाल, आरएसटीवी से भी मुझे जल्दी ही अलग होना पड़ा। बाद के दिनो में भी कैलाश जी जब कभी मिलते, वही चिरपरिचित मुस्कान लिये।

कैलाश जी की धर्मपत्नी उनकी तरह ही बेहद विनम्र और संजीदा हैं, बच्चे बेहद गुणी हैं और बहुत कामयाब भी। कैलाश जी को सादर श्रद्धांजलि और परिवार के प्रति हमारी गहरी संवेदना।

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