काका हाथरसी के व्यंग्य आज भी उतने ही प्रासंगिक


nainitalsamachar
June 23, 2018

सन १९०६ में हाथरस में जन्मे काका हाथरसी ( असली नाम: प्रभुनाथ गर्ग ) हिंदी व्यंग्य के मूर्धण्य कवि थे। उनके व्यंग्य का मूल उद्देश्य मनोरंजन नहीं बल्कि समाज में व्याप्त दोषों, कुरीतियों, भ्रष्टाचार और राजनीतिक कुशासन की ओर ध्यान आकृष्ट करना है। ताकि पाठक इनको पढ़कर बौखलाये और आंदोलित होऐं…

 

उन्होंने अपने व्यंग्य लेखन से सामाजिक दोषों के ख़िलाफ़ जनमत तैयार करने में बहुत बड़ा योगदान दिया और समाज सुधार की प्रक्रिया में ताउम्र अमूल्य सहयोग देते रहे। काका हाथरसी का देहान्त 91 वर्ष की आयु में 6 सितम्बर 1995 को हुआ।

 

व्यंग्य लेखन में निपुण थे काका हाथरसी, उनकी पैनी नज़र छोटी से छोटी अव्यवस्थाओं को भी पकड़ लेती और बहुत ही गहरे कटाक्ष के साथ प्रस्तुत करती थी…

 

आज नैनीताल समाचार में काका हाथरसी की एक कविता जो आज के परिप्रेक्ष्य में भी उतनी ही प्रासंगिक है जितनी की उस समय थी…

 

मन, मैला, तन उजरा, भाषण लच्छेदार,
ऊपर सत्याचार है, भीतर भ्रष्टाचार।
झूठों के घर पंडित बाँचें, कथा सत्य भगवान की,
जय बोलो बेईमान की!

प्रजातंत्र के पेड़ पर, कौआ करे किलोल,
टेप-रिकॉर्डर में भरे, चमगादड़ के बोल।
नित्य नई योजना बन रही, जन-जन के कल्याण की,
जय बोल बेईमान की!

महँगाई ने कर दिए, राशन-कारड फेल
पंख लगाकर उड़ गए, चीनी-मिट्टी तेल।
‘क्यू’ में धक्का मार किवाड़ें बंद हुई दुकान की,
जय बोल बेईमान की!

डाक-तार संचार का ‘प्रगति’ कर रहा काम,
कछुआ की गति चल रहे, लैटर-टेलीग्राम।
धीरे काम करो, तब होगी उन्नति हिंदुस्तान की,
जय बोलो बेईमान की!

दिन-दिन बढ़ता जा रहा काले धन का जोर,
डार-डार सरकार है, पात-पात कर चोर।
नहीं सफल होने दें कोई युक्ति चचा ईमान की,
जय बोलो बेईमान की!

चैक कैश कर बैंक से, लाया ठेकेदार,
आज बनाया पुल नया, कल पड़ गई दरार।
बाँकी झाँकी कर लो काकी, फाइव ईयर प्लान की,
जय बोलो बईमान की!

वेतन लेने को खड़े प्रोफेसर जगदीश,
छ: सौ पर दस्तखत किए, मिले चार सौ बीस।
मन ही मन कर रहे कल्पना शेष रकम के दान की,
जय बोलो बईमान की!

खड़े ट्रेन में चल रहे, कक्का धक्का खायँ,
दस रुपए की भेंट में, थ्री टायर मिल जायँ।
हर स्टेशन पर हो पूजा श्री टी.टी. भगवान की,
जय बोलो बईमान की!

बेकारी औ’ भुखमरी, महँगाई घनघोर,
घिसे-पिटे ये शब्द हैं, बंद कीजिए शोर।
अभी जरूरत है जनता के त्याग और बलिदान की,
जय बोलो बईमान की!

मिल-मालिक से मिल गए नेता नमकहलाल,
मंत्र पढ़ दिया कान में, खत्म हुई हड़ताल।
पत्र-पुष्प से पाकिट भर दी, श्रमिकों के शैतान की,
जय बोलो बईमान की!

न्याय और अन्याय का, नोट करो डिफरेंस,
जिसकी लाठी बलवती, हाँक ले गया भैंस।
निर्बल धक्के खाएँ, तूती बोल रही बलवान की,
जय बोलो बईमान की!

पर-उपकारी भावना, पेशकार से सीख,
दस रुपए के नोट में बदल गई तारीख।
खाल खिंच रही न्यायालय में, सत्य-धर्म-ईमान की,
जय बोलो बईमान की!

नेता जी की कार से, कुचल गया मजदूर,
बीच सड़कर पर मर गया, हुई गरीबी दूर।
गाड़ी को ले गए भगाकर, जय हो कृपानिधान की,
जय बोलो बईमान की!

 

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