कीड़ाजड़ी


nainitalsamachar
October 24, 2018

(चित्र में कीड़े का फफूँद भाग जो भूमि के ऊपर दिखता है; बुग्याली मित्र गोपाल वर्ती जी द्वारा उपलब्ध कराया गया)

लोकेश डसीला

वह वसुधा जन्नत है, स्वर्ग है, बहिश्त है। उस सुरभिसिंचित भूमि से जिसका साक्षात्कार हुआ हो वह विचारशून्यता में नहीं जी सकता, उसके अंतःकरण के भावों में उथल-पुथल सी मचनी लाजमी है। हिमालयी बुग्याल सावन-भादौ में कई रंग और सुगंध के फूलों से लबरेज खिलते हैं। यहाँ नरम घास का कोई मैदान किसी गहरे काव्य की समस्त उपमाओं का आगार क्षेत्र प्रतीत होता है। ऐसा ही एक उच्च हिमालयी परिदृश्य है- छिपला केदार क्षेत्र, जो उत्तराखण्ड और नेपाल सीमा पर कालापानी से निकलने वाली काली नदी और मिलम से निकलने वाली गोरी नदी के दोनों पनढालों के मध्य ऊँचाई पर अवस्थित है। दोनों ढलानों की घाटियों और धूरों में लगभग सौ छोटे-बड़े गाँव बसे हैं। लगभग डेढ़ दशक पहले तक बसासत से ऊपर इन बुग्यालों को अनछुये पर्यावासों के अन्तर्गत माना-समझा जाता था, उस समय तक इन बुग्यालों में जीवट भेड़पालक समूहों के अतिरिक्त यदा-कदा स्थानीय लोगों के साथ शोधार्थी, सैलानी और ट्रैकिंग-हाईकिंग में रुचि रखने वाले लोग ही पहुँचा करते थे। हिमालयी समाज में आज भी अलिखित नियमों के रूप में इसे देवभूमि माना जाता है, जहाँ जोर से बोलना, नाचना-गाना, सीटी बजाना व किसी भी तरह का अन्य अनैतिक आचार-व्यवहार पूर्णतः निषिद्ध माना जाता है। इन निषिद्धताओं और वर्जनाओं को सामजिक रूप से डर और उनसे जुड़े देवदंडों से भी जोड़ा गया है।

छिपला केदार क्षेत्र की दोनों ढलानों के अधिकांश परिवारों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति में पिछले डेढ़ दशक से लगातार एक जबरदस्त मौसमी भूचाल आ रहा है। भूचाल ही कहा जा सकता है क्योंकि बदलाव कहना ठीक न होगा; भूचाल कहना इसलिए भी तर्कसंगत प्रतीत होता है कि आयुर्वेद की प्रयोगशाला का एक निर्धूत ‘कीड़ा’ प्रत्येक ग्रीष्म में दोनों ढलानों की बुग्याली भूमि में चुपके से भीतर ही भीतर हलचल मचाता है और बाहर का परिदृश्य ही बदल देता है। स्थानीय जन इसे जड़ि, क्युर-झार, कीड़ा या कीड़ाघास कहते हैं। कन्फ्यूशियस के समय से ही इसके उपयोग का दावा करने वाले तिब्बती-चीनी इसे यार्सागुम्बा कहते हैं और वैज्ञानिकों ने इसे ‘कॉर्डिसेप्स साइनेंसिस’ नाम दिया है। चीन इसका बड़ा खरीददार है, जो इससे जुड़े विज्ञान का उपभोग करता है, वहीं यूरोप इसके प्रभावी उत्पाद का सबसे बड़ा खरीददार और प्रत्यक्ष उपभोगकर्ता भी। कीड़े के संदर्भ में चीनियों का ज्ञान परम्परागत रूप से पोषित होकर आधुनिक विज्ञान बना है, जिसे वह अपने प्रभावी उत्पादों की भाषा में पूरी दुनियाँ को बता रहे हैं। मगर हमारे क्षेत्र में इस कीड़े के नये अर्थशास्त्र ने स्थानीय समाजशास्त्र की रेल बना रखी है और किसी प्रभावी भाषा के स्थान पर एक नया विषय उग आया है, जिसका विवेचन अभी शेष है। इस विषय के अर्थगौरव को जानने-समझने के लिए एक बार बुग्यालों से घाटियों में उतारना जरूरी है, जहाँ से पुनः कीड़ा जड़ी संग्रहकर्ताओं के साथ चढ़ाई चढ़नी पड़ेगी।

पनढालों में बसे गावों से नीचे, घाटियों में जेठ की एक तपती दोपहर… कुछ ढीट और भदेस सिमार को छोड़कर सूरज के ताप का असर सर्वत्र देखा जा सकता है। आम के पेड़ों पर किसी कुत्ते की जीभ सरीखे नये पत्ते आँगन में छाँव बिखेरे हुये हैं, अमियाँ आकार ले चुकी है, रबी की फसल समेट ली गयी है, नदी किनारे के लम्बे खेत पूरी तरह से खाली हैं। जुताई के बाद धान, मक्का, मडुआ, भट्ट बोने की तैयारी है। निबट घाटियों में मिट्टी उपजाऊ है और गर्मी भी पर्याप्त पड़ती है… सो अनाज साल भर गुजारे लायक हो जाता है, यहाँ सड़क से नजदीकी जीवन की दुर्गमता को भी कुछ हद तक दूर कर देती है। ठीक इसी समय पर कीड़ाघास के अंतराष्ट्रीय बिचौलिए और उनके स्थानीय आढ़तिया एडवांस पैंसा बाँट रहे हैं। स्थानीय जन इन्हें ठेकेदार कहते हैं, ये अच्छा कमा लेते हैं या कहें कि संग्रहकर्ताओं से बेहतर, बस जान-पहचान और सम्बन्धों के भरोसे पर एक तरह का स्थानीय प्रबन्धन है। थोकफरोशों के लिए जेबें ढीली करने का समय है, सो उनके आदमियों ने अपने-अपने प्रभाव क्षेत्र में एक तरह का बिगुल फूंक दिया है जिसकी आवाज निरन्तर ऊँचाइयों पर बसे ग्रामीण संग्रहकर्ताओं तक गाँव दर गाँव पहुँचने लगी है। ठेकेदार के आदमी घाटियों से धूरे तक महज एक या दो दिन में ही जरूरतमंद लोगों को पैंसा बाँट चुके हैं, यह एक तरह का बयाना है जिससे संग्रहकर्ता द्वारा अपनी जरूरतों का सामान खरीदा जायेगा और सीजन के अंत में खोदा गया कीड़ा उसी ठेकेदार को बेचकर बाँकी हिसाब किया जाएगा। यहाँ कीड़ाघास का बाज़ार विभिन्न स्तरों पर तीन देशों के मध्य एक बेहतरीन समन्वयन के तौर पर प्रदर्शित होता है, साथ ही इस बाज़ार ने यहाँ जुर्म, अनैतिकता और भसड़ को भी साल दर साल बराबर पोषित किया है।

घाटियों में नदी किनारे बाज़ारों में विशेष तरह की खरीददारी जोरों पर है मसलन टैन्ट बनाने के लिए हल्की प्लास्टिक या सिल्फोलिन की शीट, प्लास्टिक और रबर से बने स्नो-बूट, हल्के, नरम और चमकीले चायनीज मैट्रस के थानों से निकले कटपीस, विंड चीटर जैकेट, कोल्ड क्रीम सरीखा लोशन, छतरी और टायर ट्यूब की रबर भी, जिसके टुकड़ों से कोहनी और घुटनों के पैड बनाये जायेंगे जिससे झुक कर कीड़ा ढूंढने में और चौपाये की तरह चलने में सहजता बनी रहेगी। खरीददारी के पश्चात रात को बच्चे, युवा, महिलाएँ और प्रौढ़ पुरुष अपने-अपने हिसाब से अपना बोझ तैयार कर रहे हैं, कुछ सूखा पकाया हुआ भोजन भी बाँध लिया जाता है। अगली सुबह कुछ गाँवों के लोग मुँह अँधेरे निकल पड़े हैं जबकि घाटी के अधिकांश गाँवों के लोग सुबह कलेवा करने पर ही निकल रहे हैं और अलग-अलग समूहों में चल रहे हैं। खेत, बंजर जमीन, गाँव, जंगल और पथरीले रास्तों पर चलते हुये शाम से पहले ऊँचाई पर बसे आखिरी गाँव की सीमा तक पहुँच चुके हैं। यहाँ गाँव से पहले खेतों के दर्शन होते हैं, जिनमें धान, मक्का, मडुआ, मादिर, राजमा, गुराँश, रियांश, मांस, चिन, कौणि और चुआ बोये जाने का समय है; जबकि जायद की बेल वाली फसलें घरों के आसपास ही बोई जानी है। छोटे सीढ़ीदार खेतों के बीच चलते हुये लोग अपने नजदीकी या जान-पहचान वाले घर का रास्ता पकड़ रहे हैं जहाँ उन्हें रात्रि विश्राम करना है। ऊँचाई पर बसे इस आख़िरी गाँव की दुकान से अभी राशन भी खरीदा जाना है…

घाटी से ऊपर ऊँचाई पर बसे आखिरी धुर्याल गाँव से लोग उसी शाम अपनी जरूरत के अनुसार चावल, आटा, दालें, नमक, तेल और मसाला आदि खरीदकर आटे और चावल के अपेक्षाकृत भारी थैले बकरी वाले को सौंप देते हैं और बाँकी का सामान अपने बोझ में बाँधकर अगली सुबह चलने के लिए तैयार हैं। बकरी वाला उन थैलों का वजन लेकर उनके मालिक के नाम के साथ एक कागज में लिख लेता है, यहाँ से वह राशन को अपने लख्खों के करबच में व्यवस्थित कर उनके डेरे तक पहुंचायेगा। कुछ सक्षम लोग अपना राशन अन्य सामान के साथ अपनी पीठ पर लाद कर भी चलते हैं। इन अधिकांश आख़िरी गाँवों तक खच्चरों की पीठ पर ही राशन ढोया जाता है मगर यहाँ से ऊपर उच्च हिमालय के पथरीले, संकरे और दुरूह रास्तों पर केवल लख्खे ही सामान ढोते हुये चलने में सक्षम हैं। बकरी वालों का काम बड़ी मेहनत का है उन्हें सामान ढोने वाले लख्खों की संख्या, उनके आकार और क्षमता के हिसाब से ही हर खुरजी या करबच का वजन बनाना होता है। एक औसत लख्खा चौदह से सोलह किलो तक वजन उठाकर चलता है। मालिक एक चौदह किलो क्षमता वाले लख्खे के लिए सात-सात किलो अनाज तोलकर दो मारकीन के छोटे थैलों को सुई-धागे से लगभग पूरा सिल देता है ताकि राशन रास्ते की किसी भी परिस्थिति में न गिरे। प्रत्येक थैले में उसका वजन भी लिख दिया जाता है, यह काम बकरी वाला रात को लगभग चालीस से पचास लख्खों के लिये उनकी क्षमता के हिसाब से हर बार पूरी शिद्दत से करता है फिर भरे-सिले मारकीन के थैलों को भार वर्ग के अनुसार अलग-अलग ढेरों में सजा लेता है। अगली सुबह चलने से पहले जोड़े के दोनों तकियानुमा छोटे राशन के थैलों को एक-एक कर लख्खों की पीठ पर बंधे करबच के दोनों ओर फंसा दिया जाता है फिर राशन सहित करबच को कस कर बाँध दिया जाता है। लख्खे तैयार हैं उन्हें थोड़ा सा नमक चखाकर दो या तीन लोगों द्वारा हाँकना शुरू कर दिया है। बकरी वालों की पीठ पर एक खाकी पिट्ठू में थोड़ा सा सामान और एक बण्याठ है जिसका लकड़ी का हत्था उसके सिर की ऊँचाई तक उठा है। उनकी बाँकी जरूरत का सामान या तो उनके उच्च हिमालयी डेरों में पहले से ही रखा हुआ है या फिर कुछ लख्खों की पीठ पर बांध हुआ है, रेवड़ और शिकारी कुत्तों से साथ चलते हुये उनके लिये यह सफर आम दिनचर्या से बहुत अलग नहीं है।

पहली शाम पहुँचे बच्चे, युवा और प्रौढ़ सभी सुबह होते ही निकल पड़े हैं, जिन सम्बन्धियों या पहचान वालों के घर वह रुके थे उनके सदस्य भी उनके साथ दिन और शाम का भोजन बाँधकर इस सफर में चल पड़े हैं। दरअसल घाटी के हर गाँव का संग्रहकर्ता अपनी ही वन पंचायत से कीड़ा निकालता है इसलिये भी उनके रास्ते की ऊँचाई पर बसे ग्रामीण जन उनके अपने सम्बन्धी हैं। आख़िरी गाँव भी पीछे छूटने लगा है खेतों के बाद बंजर भूमि फिर घने जंगल के बीच पहले दिन के समूह, कुछ नये सदस्यों के साथ फिर से बन गये हैं। लोग अपनी-अपनी क्षमतानुसार दस, पन्द्रह या फिर बीस किलो सामान पीठ पर लादे इस वैजन्य क्षेत्र की चढ़ाई को सत्र दर सत्र पार कर रहे हैं। घने जंगल के बीच पानी के कई छोटे-बड़े सोते मिलते रहते हैं। बाँधकर लाया गया कलेवा यहाँ पहला पड़ाव बनता है, जंगल के बीच कुछ मिनटों का आराम, मुलाकातें, हँसी, ठिठोली और नाराजगियाँ भी, सब कुछ…! बीसियों लोग बच्चों सहित कई टोलियों में हैं, वर्षभर लगभग निर्जन रहने वाली यह रखौंत भूमि आज अजीब इन्सानी कोलाहल से गूँज रही है। इन जंगलों की ढलानों में बाँज, रियांज, बुराँश, तिमसा, अङयार जैसी चौड़ी पत्ती वनस्पतियों के बीच अधिक नमी वाले भूभाग में रिंगाल के भी बड़े जंगल हैं जहाँ हिमालयी काले भालू की आहट अक्सर मिल जाया करती है। धूप-छाँव भरे रास्ते पर चढ़ाई चढ़ना जारी है, दोपहर होने तक भी घने जंगल का कोई ओर-छोर नहीं दिखता, थकान बढ़ चली है, बच्चों का चहकना भी कम हो गया है। एक बार फिर बंधा हुआ खाना खाने का समय है, बातें बहुत हैं मगर ठिठोली कम हो गयी है। खाने के बाद अब तुरन्त ही चलना है, क्योंकि आज ही मंजिल तक पहुँचना है इसलिये आराम का समय नहीं है। कई घण्टे लगातार चलने के बाद जंगल धीरे-धीरे छितरे तरुखंडों में सिमटने लगा है, आख़िरी पंक्ति के पेड़ों का पूरा झुकाव ढलानों की ओर बना हुआ है जिनके मजबूत शीर्ष एक विशेष पर्यावरणीय मरोड़ लिए हुये हैं। यह पेड़ों की अंतिम पंक्ति या ‘ट्री लाईन’ है, इसे पर करते हुये यहाँ से ऊपर की ओर कोई ऊँचे पेड़ नहीं हैं बस ‘चिम्मल’ एक प्रकार का झाड़ीनुमा बुराँश ही घने समूह में दिख रहा है और इन्ही झाड़ियों से सभी संग्रहकर्ताओं को प्रवास भर की जलावन भी मिलेगी।

सूरज डूबने को है तिरछी लाल धूप, ऊँची-ऊँची घास और कुसुम्भी शाकों के बीच यह उस देवभूमि का प्रथम दर्शन है जहाँ ज्ञानियों हेतु भैषज्य और भोक्तव्य शाकों की बहुलता है वहीं अल्पज्ञानियों हेतु दिशाभ्रम, भूख और ठण्ड से मरने की पूरी व्यवस्था। वित्रास और कम संसाधनों के मध्य ही समूह में परस्परालंबन पोषित होता है, यह विचार यहाँ महसूस किये जाने के साथ-साथ तुरन्त देखा भी जा सकता है। हर उम्र के प्रवासी को यह बात समझते देर नहीं लगी कि, आसूदगी का जीवन मीलों पीछे छूट चुका है और हर घड़ी चौकन्ना रहकर ही यहाँ वह सब कुछ निभाना है जिसके लिये सिर और घुटने दोनों टेक कर यहाँ पहुंचे हैं। चेहरई लाल रंग के छोटे सरस भूमि फलों से गला तर करते हर कोई आगे बढ़ रहा है, बस आगे… और आगे ही…! यह उस दौड़ की शुरुआत है जो अब महीने दिन से लगभग ढाई महीने तक इस अलग पर्यावास में इसी गति से धड़धड़ायेगी। बुग्याल में जहाँ पहले से आये लोगों ने डेरे डाले हैं वहाँ तक आते-आते शाम पूरी घिर आयी है, सभी अपनी-अपनी टोली में गोलबंदी करते हुऐ सही जगह ढूंढकर बैठने लगे हैं। पुरुष और युवा अपने प्लास्टिक शीट से अस्थाई टैन्ट तैयार कर रहे हैं। कुछ संग्रहकर्ता पार्ट टाइम व्यापारी भी हैं जिन्होंने यहाँ कई रोज पहले से टैन्ट के भीतर अपने होटल लगाये हैं, पेट्रोमेक्स और नेपाली-चायनीज सोलर लाइट की रोशनी से जगमग इन दुकानों में शुरूआती जरूरत का सामान मसलन चाय, बिस्किट, आलू, रात का भोजन, बीड़ी, सिगरेट, गुटखा लगभग चार से पांच गुना रेट पर मिल रहा है। शान्त बैठे बच्चों और महिलाओं के चेहरे थके होने के बावजूद दुकानों से बिखरती रोशनी से चमक रहे हैं, दिन भर के थके-मांदे लोग रात को चिम्मल की लकड़ी ढूँढकर खाना बनाने की जहमत नहीं उठाते। कई परिवारों के पास बाँधा हुआ भोजन बचा है या फिर सूखा भुना सत्तू जैसा खाद्य जिसे वह पानी के साथ फाँककर अपने अस्थाई टैन्ट में पसर गये हैं। कुछ लोग एक रात ही सही, इस मेले में पके-अधपके का सेवन करने की स्थिति अपना लेते हैं इनकी संख्या बहुत कम है, दरअसल यहाँ दो लोगों की खिचड़ी पर लगभग पाँच सौ से सात सौ रूपये तक ढीले करने पड़ रहे हैं और अधिकांश लोग इतना व्यय करने में असमर्थ हैं वह भी प्रवास के पहले या दूसरे ही दिन…

पहली शाम पहुँचे लोग सुबह उठते ही अपने चारों ओर नज़र फेरते हैं तो पाते हैं, लगभग साठ से सत्तर टैन्ट पहले से लगे हुये हैं। एक पूरे गाँव सा माहौल है कुछ लोग ईंधन के लिये चिम्मल की झाड़ी खींचने जा रहे हैं, कुछ खाना बना रहे हैं, कुछ पानी भरकर ला रहे हैं और कुछ निकल पड़े हैं कीड़ा ढूँढने। नये लोगों के लिये पहली जरूरत अपने टैन्ट को मजबूती से खड़ा करने की है जिसे उन्होंने बीती शाम आनन-फानन में लगाया था। चट्टानों के बिल्कुल करीब ओड्यारों में रह रहे लोग सबसे अच्छी और सुरक्षित स्थिति में हैं मगर ओड्यार सभी को नसीब नहीं हो पाते उन पर या तो बकरी वालों का कब्ज़ा होता है या फिर पहले आओ- पहले पाओ वाले काबिज हो जाते हैं। कुछ ओड्यार तो पूरे घर जैसे होते हैं, जाओ और सामान बिखराओ और कुछ उभरी या धंसी हुई चट्टानों में दो तरफ से ढाँप लगाकर भी डेरे तैयार किये जाते हैं। मगर जहाँ अधिकांश लोग बसते हैं वह खुला आसमान होता है और मौसम की मार इन्ही पर सबसे पहले पड़ती है। टैन्ट, ईंधन, पानी, भोजन जैसी आम जरूरतों के अनुकूलन में बुग्याल पर पहले दिन की दोपहर हो गयी है, सम्भवतः आने वाले दिनों में इतना समय नहीं लगेगा। नये आये लोग भी आधे दिन के बाद बुग्याल में अपनी सहज दिशाओं की ओर फ़ैल गये हैं, यहाँ होड़ लगी हुई है बस एक-दूसरे से आगे निकलने की; घुटनों के बल हथेलियों को जमीन पर टिकाये सभी बच्चे, जवान और प्रौढ़ अपनी आँखें चुपचाप नम घास के बीच जमाये हुये हैं। लोग आपस में दूरी बनाये रखना पसन्द कर रहे हैं जिससे वह कीड़े की बहुलता वाले स्थान पर प्रतिस्पर्धा से बचे रहें, खड़ी ढलानों और चट्टानों पर जान की परवाह किये बगैर सभी अपने काम में मशगूल हैं। कीड़े का भूरा-काला शीर्ष दिखते ही संग्रहकर्ता की आँखों में चमक आ जाती है, वह सधे हाथों से उसे खोदना शुरू करता है लगभग पाँच से दस सेन्टीमीटर सीधा खोदने पर कीड़ा साबूत निकल आता है, खोदते समय बड़ी सावधानी से इस स्वर्णिम जड़ी के फफूंद भाग और कीट भाग दोनों को ही एक साथ सुरक्षित बनाये रखना जरूरी है। खोदे गये कीड़े को बड़ी जतन से सूती कपड़े के थैले में रख दिया जाता है इस पर अभी नमी के साथ बुग्याल की काली मिट्टी की परत चिपकी हुई है जिसे सूखने पर हटाया जायेगा। इसी जगह पर एक स्वस्थ औसत कीड़े की कीमत चार सौ से छः सौ तक मिल रही है मगर समय, परिस्थिति, आवश्यकता और सम्बन्धों की आड़ में यह कीमत अक्सर घट-बड़ जाया करती है। कीड़े के मिलने और न मिल पाने की स्थिति को यहाँ लोग बड़ी आसानी से किस्मत से जोड़ देते हैं… “किस्मत होगी तो मिलेगा वरना नहीं मिलेगा…!” यह बात जेठ के आसमान की तरह ही साफ़ है मगर किस्मत से लुका-छुपी चलती रहती है, किस्मत के इस कीड़े को लोग एक ही जगह पर इत्मीनान से रेंकते हुये ढूंढ रहे हैं… लोग तेजी से हड़बड़ी में आगे गिरते-बढ़ते ढूंढ रहे हैं… लोग रास्ते पर बने जानलेवा अस्थाई ग्लेशियर को हाथ में पकड़े कुदाल की मदद से पार करते हुये ढूँढ रहे हैं… लोग एकतार होकर अकेले बढ़ते हुये खुद के भटक जाने तक ढूँढ रहे हैं। यह नशा है, एक अजीब तरह का नशा जिसकी तलब का न कोई चरम है न खुमारी की कोई थकान, बस यह छोटा प्रवास पूरा होने तक यही एकमात्र रिवाज है जिसे निभाया जाना है। पीठ पर बंधे छोटे पिट्ठू में अपने-अपने हिसाब से अक्सर बिस्किट, पानी, टॉफी, बीड़ी, सुपारी, सुर्ती, गुटखा सब होता है मगर फुरसत कम ही होती है। कई संग्रहकर्ताओं की पीठ पर ही दुकान भी होती हैं प्याज के खाली और जालीदार थैलों में डोरी बाँधकर पिट्ठू बनाया जाता है जिससे अंदर रखा सामान दिखता रहता है, दिखेगा तो बिकेगा… और बिकता भी है, पैंसे न हों कोई फर्क नहीं पड़ता यहाँ कीड़ा ही करेंसी है वो भी बेहतरीन फ्लो के साथ…।

कई मर्तबा तेज हवाओं के बीच पिघलती बर्फ हटाकर ठण्ड से जली घास में कीड़ा खोजना पड़ता है ऐसे में कीड़े का अपेक्षाकृत अधिक नम शीर्ष भाग आसानी से दिख जाता है मगर हाथ ठण्ड से जल-अकड़ जाते हैं, जैसे-जैसे धूप बढ़ती है जमीन के साथ फफूंद वाला शीर्ष भाग सूखकर पतला हो जाता है और रंग भी सूखी घास की तरह ओड़ लेता है, ऐसे में उसे पहचान पाना आसान नहीं होता। भ्रान्तियां यह भी हैं कि बच्चे आसानी से इसे ढूँढ लेते हैं इस भ्रम में लोग छोटे बच्चों को भी साथ ले आते हैं और कई बार वह ठण्ड से बीमार पड़ जाते हैं। महिलाएँ बड़ी शिद्दत के साथ यह काम कर रही हैं वो लगे हाथों धुरि लाषण (हिमालयी लहसुन) की पत्तियों को जड़ सहित और रुकि (एक बैगनी-हरी कोपल) को रात की सब्जी हेतु भी बाँध रही हैं।

शाम हो चुकी है आधे से अधिक लोग धूप रहते डेरों पर लौट चुके हैं मगर कुछ लोग नज़र बनी रहने तक झुके रहेंगे, कई परिवार पहले ही दिन पन्द्रह से बीस या फिर ज्यादा कीड़े बटोर चुके हैं मगर कई अभागों के हाथ कुछ भी न लगा। आखिरी समूहों का भी डेरे पर लौटने का समय है वापसी में कुछ लोग चिम्मल की झाड़ियों की ओर तेज कदमों से जा रहे हैं कि, जितनी जल्दी हो सके कुछ आड़ी-टेड़ी लकड़ियों के साथ धुप्प अँधेरे से पहले डेरे तक पहुँच जायें। कुछ नये आये लोग नियत स्थान पर पहुँचकर पिछले वर्ष का बचा राशन निकाल रहे हैं जो उन्होंने लौटने से पहले प्लास्टिक के जारों में भरकर जमीन के अंदर छुपा दिया था, ठण्डी भूमि में यह जस का तस बना हुआ है। कीड़ा, राशन, ईंधन, पानी, हौंसला और निराशा साथ लेकर अँधेरा घिरने तक सभी लोग अपने-अपने डेरे पर पहुँच चुके हैं।

हल्के और सस्ते चायनीज सोलर लालटेन डेरों में झक्क उजाला किये हुये हैं सभी ने लगभग खुले में चूल्हा सुलगा रखा है, अधिकांश चूल्हों में खिचड़ी या दाल-भात पक रहा है जबकि तवा कम ही लोग चढ़ा रहे हैं। धुएँ के साथ घी और मसालों की खुशबू बस फैले जा रही है। कई नई टोलियाँ आज फिर पहुँची हैं, इसी तरह और एक सप्ताह तक लोग आते रहेंगे फिर इक्का-दुक्का ही पहुँचेंगे, अभी पहुँचे लोगों में जल्दी कुछ खाकर अस्थाई टैन्ट में पसर जाने की हड़बड़ी साफ़ दिखती है और दुकानों में रोज की तरह ऊँचे रेट का छौंका बदस्तूर जारी है। डेरों के भीतर लोग अपने संग्रह के कीड़ों पर चिपकी मिट्टी को किसी पुराने टूथब्रश द्वारा बड़े ही हल्के हाथों से हटा रहे हैं, इस दिनभर की ध्याड़ी को सहेज कर रखना भी एक बड़ी चुनौती है इन्हें एक साफ़ सूती थैले में बाँधकर अन्य कीटों की पहुँच से दूर लटका दिया जाता है। महिलाओं ने समय निकालकर चौपालें लगानी शुरू कर दी हैं बच्चे पास ही अंदर-बाहर किये जा रहे हैं, कई मोबाइल आस-पास ही अलग-अलग तरीके का संगीत फेंक रहे हैं, ऐसा संगीत जो घच्च-पच्च से अधिक कुछ नहीं है मगर न जाने क्यों सभी के लिए जरूरी बना हुआ है, यह बात समझ से परे है। उच्च हिमालय में सामान्य दिनचर्या भी बहुत थका देती है और उस पर चौपाये की तरह बढ़ते हुये कीड़ा ढूंढना जैविक प्रक्रम में काया से अतिरिक्त स्वत्व का दहन है। जल्द ही सभी रूखा-सूखा खाकर सोने की तैयारी में हैं, लालटेन बुझने लगी हैं कुछ-एक जगह पर केवल संगीत है मगर दुकानों के आसपास एक-दो टैन्ट अभी भी जगमगा रहे हैं जिनसे हँसने, गपियाने की आवाजें लगातार आ रही हैं; दरअसल यहाँ जुआ चल रहा है जो लालटेन के पूरी तरह डिस्चार्ज होने तक चलेगा या फिर सुबह तक भी…

बुग्यालों की बूगी और फिंची घास के बीच समय बीतता जा रहा है, हर नये दिन के साथ चटख सीधी पड़ती धूप चेहरों को मेहनत का ताम्बई रंग दे रही है और लगातार चलती तेज ठंडी हवाएँ खुले अंगों को पपड़ा रही हैं। कई लोग प्रतिकूल मौसमी प्रभावों को न झेल पाने की स्थिति से दो-चार होकर लौट चुके हैं, कुछ बीमार हैं यदि जल्द स्वस्थ न हुये तो उन्हें भी घर पहुँचाया जाएगा; जैसा कि कई परिजन या निकट सम्बन्धी बीमार लोगों के साथ उतर भी रहे हैं, इस स्थिति में स्वस्थ संग्रहकर्ताओं की कमाई और ऊर्जा दोनों ही जाया होती हैं। इस भूमि पर साधारण मनुष्यों का हफ्तों तक उमत्त जीवन जी पाना बहुत कठिन है, मौसम की मार जोड़ों, घुटनों व कमर पर सबसे पहले पड़ती है, फौलादी जज्बे वाले भेड़पालक ‘अनवाल’ ही यहाँ लम्बे समय तक सामान्य जीवन जीने वाले प्रवासी हैं; उन्होंने पीढ़ियों से इस भूमि के प्रति दो प्रभावी कारक उपभोग और समर्पण में संतुलन बनाते हुये, सम्मान स्वरूप अपना दायरा तय किया हुआ है। जो भूमि इस कीड़े की खोज से पहले कभी महिलाओं हेतु निषिद्ध मानी जाती थी आज यहाँ पुरुषों के लगभग बराबर ही महिलाएँ स्वच्छन्द तरीके से आ-जा रही हैं। एक समय तक यहाँ महिलाओं का प्रवेश अशेषतः प्रतिबन्धित था, रमणियाँ तो डर से यहाँ आने को सोच भी नहीं सकती थी क्योंकि वो विशेष अलौकिक पकड़-धकड़ की पात्र हुआ करती थीं। एक अधेड़ संग्रहकर्ता बता रहे हैं कि “पूर्व में एक बार किसी महिला ने यहाँ बच्चे को जन्म दे दिया था और तब से आज तक फलाँ-फलाँ जगह पर घास भी नहीं उगी, वहाँ तुरन्त ही पैर-पंखाण आ गये।” हद है…! ऐसी अभियोगी और अस्पृश्य कथा पर स्वयं उस अधेड़ के मन में कई प्रश्न हो सकते हैं और उनकी बातें बता रही हैं कि इन प्रश्नों पर जबाबदेही पूर्णतः सामजिक है जो प्रतीकात्मक विश्वासों में गले तक धंसी हुई है। प्रश्न किसी के भी मन में उठ सकते हैं, पता नहीं वह महिला ऐसी स्थिति में उस निषिद्ध क्षेत्र में क्या कर रही होगी… और प्रकृति में जनन की एक देवी के जैविक धर्म की साक्षी बनकर वह धरती स्वयं इतना रुष्ट और कुपित क्यों हो गयी कि दुर्भिक्ष उत्पन्न कर दिये और खुद ही बंजर हो जाने का कठिन निर्णय ले लिया! शायद जीवन ही अभिशप्त रहा होगा, किसी एक का…। हितेच्छु जानकार आपको सुई-तागा अपने साथ रखने की भी सलाह देते हैं, वो बताते हैं कि सुई-तागा आपको उच्च-हिमालयी आँचरियों के देश में उनकी आहटों से होने वाली उद्विग्नता से बचाता है। मगर जो भी हो यहाँ सुई-तागा बहुत काम आता है वह संग्रहकर्ताओं हेतु एक विश्वास का प्रतीक तो है ही और साथ ही कम संसाधनों के मध्य आवश्यक युक्तियों के अनुकूल भी है।

लोग कीड़े की तलाश में डेरे से दस-दस किलोमीटर दूर तक भी पहुँच रहे हैं, कभी आगे की टोली जमीन पर समय बिताकर खाली हाथ निकल जाती है मगर पीछे चल रहे लोग उसी स्थान से वारा-न्यारा कर लेते हैं; फिर भी लोग ऐसे स्थान पर जाना पसन्द नहीं करते जहाँ उनके हिसाब से एक बार मैदान छान लिया हो। जिन्हें महीना बीत जाने पर भी बहुत कम जड़ी मिल पाई है उन्होंने हार कर घर लौटना या वहीं रहकर लहसुन खोदना शुरू कर दिया है, इस औषधीय लहसुन के खरीददार भी गाँव तक आते हैं जिसे पन्द्रह से बीस हजार रूपये प्रति किलो के भाव पर उठाते हैं; मगर कीड़ा तो यहाँ साक्षात मुद्रा बन चुका है उसका मोह भी कैसे छोड़ा जाय। बुग्याल भरे-पूरे बाज़ार बन चुके हैं यहाँ शिकारियों का एक समूह आमिष भोज का मौका भी उपलब्ध कराता है, वैसे इस समूह की कर्मभूमि साल भर यहीं होती है तथा वो इन निर्जन मैदानों, घांघल और चट्टानों को भली-भाँति जानते समझते भी हैं। कीड़े के इस समर में शिकारी भी अधिक सक्रिय रहते हैं क्योंकि यह उनकी अतिरिक्त कमाई का समय है, इनके निशाने पर घुरड़, काँकड़, कस्तूरी, शूकर, झालर, जड्यो, शशक से लेकर मोनाल तक हो सकते हैं; पाँच से सात कीड़े देने पर शिकारी एक किलो शिकार देता है। बुग्यालों में ऐसी इन्सानी घुसपैठ से वन्य जीवन ही सबसे अधिक प्रभावित हो रहा है, जब सामर्थ्यवान इन्सान स्वयं दैत्य बना हो तो निरीह जानवर कहाँ जाएँ… बर्फ तो खा नहीं सकते, छुपें भी तो कहाँ और कब तक; जहाँ अब लोकदेवता तक सुरक्षित नहीं हैं वहाँ जानवरों की क्या बिसात। कीड़े की कम होती उपलब्धता और साल दर साल बढ़ती कीमतें यहाँ अनैतिक से अनैतिक कार्य करा रही हैं, अन्जान चेहरे सैटेलाइट फोन से बातें करते हैं, शान्त वादियों में असलहों से फायर झोंके जाते हैं, ताज़ा और त्वरित झगड़ों में लाशें तक दबा दी जाती हैं। ऐसा भी नहीं कि सब कुछ खुल्ला खेल फर्रूखाबादी हो, पटवारी और वन विभाग की टीमें भी दबिश देती रहती हैं, मगर गंदले पानी में तो एक कम शातिर मगरमच्छ भी बड़े शेर को खींच ले जाता है। मामले चौकियों से लेकर कचहरियों तक चलते रहते हैं, इस बीच कई किलो कीड़ा थानों और वन विभाग में सड़ जाता है, दुर्भाग्यवश एक प्रभावशाली और महंगे वन्य उत्पाद की ऐसी बर्बादी की जिम्मेदारी कोई नहीं लेता।

बुग्यालों में एक वन पंचायत क्षेत्र के भीतर साढ़े तीन सौ से अधिक टैन्ट हैं और प्रति टैन्ट औसतन तीन लोग, ऐसी ही दर्जन भर वन पंचायतें दोनों ओर की पनढालों पर अत्यधिक पर्यावरणीय दबाव झेल रही हैं। डेरों के आसपास गन्दगी का आलम यह है कि एक बारगी तो कंजड़-बंजारे भी नाक-भौं सिकोड़ लें, कभी अनछुये कहे जाने वाले बुग्यालों में आज कोमल और अनमोल पादप इन्सानी पैरों तले लगातार दबे ही जा रहे हैं, उनके मिट्टी से सने अवशेष धूप में सूखकर नष्ट हो रहे हैं। जिस भूमि में प्रकृति स्वयं पोषक बनकर जैव समष्टि का चक्र चलाती है उसमें आज जैविक प्याज, अण्डे और सब्जियों के छिलके, बचा हुआ भोजन, फलों के छिलके, कोयला, राख और खुले में त्यजित इंसानी मल के साथ-साथ अजैविक कचरे का बड़ा भण्डार है, इनमें सिगरेट, गुटखा, तम्बाकू, खैनी, बिस्किट, टॉफी, मसालों के पैकेट, पॉलिथीन, तेल की बोतलें, शीतल पेय और बियर के केन, शराब की बोतलें, फटे पुराने कपड़ों के चीथड़े और दवाओं के आवरण जहाँ-तहाँ फैले हुये हैं, ये वास्तव में कुचील है… जिसके एवज में प्रकृति का कोप अभी शेष है। बुग्याली भूमि पर दो से ढाई माह का यह अत्यधिक दबाव का समय प्रतिवर्ष कई अन्य स्थानिक पादपों एवम अनमोल कीट प्रजातियों के संकटापन्न जीवन को जाने-अन्जाने प्रभावित करता आ रहा है, जिन्हें कीड़ा नहीं मिलता वो लहसुन, कुटकी, हत्थाजड़ी, धूप, छिपी और डोलू जैसी औषधीय शाकों को समय से पहले ही खोदकर उनके जीवनचक्र को प्रभावित कर रहे हैं। इस बीच बारिश, ओले, बर्फ, बीमारियों, झगड़ों, चोटों और मौतों के बीच दो-ढाई महीने का कीड़ा सीजन खत्म होने को है और लोग अपनी जमा की गयी जड़ी को लेकर पनढालों तथा निचली घाटियों पर बसे अपने गाँवों की ओर लौटने लगे हैं…।

मध्य असौज में दिन की चटख धूप और सुबह-शाम की हल्की ठण्ड आने वाले शीत की दस्तक होती है। ढलानों पर सीढ़ीनुमा खेतों में मक्के के केवल ठूंठ ही बचे हैं जो जलाए जाने हैं, जायद का प्रतानी मौसम बीतने को है, यदा-कदा पीली ककड़ी, परिपक्व कद्दू देखे जा सकते हैं जबकि लौकी की बेलों में चमक बची हुई है। सीमित खेती-किसानी बटोर कर भण्डार तक पहुंचा दी गयी है, मडुआ उमस में पकाकर मांड़ा जा चुका है जिसे धोकर सुखाया जा रहा है, अखरोट सुखा कर रख लिये हैं, बंजर जमीन से घास काटी जानी है जिसे सुखाकर पूरे शीतकाल भर मवेशियों को दिया जाएगा। खेत की मेढ़ों पर या मिश्रित रूप से बोई जाने वाली दलहन भट्ट, राजमा, मास, गहत के ढेर भी आँगन में लग चुके हैं जबकि मेढ़ों के विपरीत भीड़े के सहारे उगी चुआ और भंगीरे की फसल अभी समय लेगी। पांगर के अखाद्य फल भी अब अपने आवरण में खाकी रंग भरने लगे हैं और दूर से ही दिखने लगे हैं, इस मौसम में कभी ओले गिर जाएँ तो वातावरण में तिमूर की खुशबू हवा के साथ-साथ उड़ती है। यह वो समय है जब चौमास की हरियाली धीरे-धीरे सुनहरेपन में बदल रही होती है और चारे की घास कट जाने पर इसे पूरी तरह से सुनहरा असौज हो जाना है। ढलानों से लेकर घाटियों तक यह समय सुनहरा होने के साथ ही उस सोने मैं भी खनक ले आता है जो उन कठिन दिनों के दौरान बुग्याली भूमि से खोदकर संभाला गया है।

ऊँचाई पर बसे गाँव में एक व्यस्त दोपहर का समय है, कीड़े का ठेकेदार तीन अन्य लोगों के साथ पहुँचा है जिसमें एक व्यक्ति गाँव का ही है। जल्द ही गाँव में इस तोक के सभी परिवारों को खबर पहुँचा दी गयी है, काम में व्यस्त लगभग सभी लोग कुछ समय के लिए एक आँगन में इकठ्ठा होने लगे हैं। उड़ती-उड़ती खबरों से कीड़ा खरीदे जाने का रेट सभी को पता है फिर भी लोगों के भीतर यह जिज्ञासा बनी हुई है कि ठेकेदार क्या भाव ले-दे रहा है। एक युवा संग्रहकर्ता ने पूछा “सर, क्या रेट चल रहा है…?”

“साढ़े नौ खरीद रहे है…” समीचीन आचरण के साथ भद्र वाणी वाले एक सज्जन ने हाथों से डायरी और डिजिटल बैलेंस अपने सहायक को थमाते हुए कहा, लगभग सभी की ओर मुस्कुराते हुये देखकर उसने फिर से कहा “साढ़े नौ का हमारा रेट सबसे बेहतर है… और आप सभी जानते भी हैं।” वह पहाड़ों पर असौज की आपाधापी से धूसर-फूसर, मिट्टी सने ग्रामीणों से मुखातिब था जिन्हें इन दिनों समय पर पका खाने तक की फुर्सत नहीं है। दरअसल, यह साढ़े नौ लाख रुपया प्रति किलो मूल्य देने की बात है। अधिकांश लोग बेचने को पहले से ही तैयार हैं मगर कुछ सोचते हैं कि अभी रेट और ऊपर जायेगा और वह ये भी जानते हैं कि यहाँ से देरी होने पर रेट का घटना और बढ़ना दोनों ही स्थितियां सम्भव हैं। लोग घरों से कीड़ा ले आये हैं, ठेकेदार के सहायक अपने डिजिटल बैलेंस को समतल आधार देकर कीड़ा तौलने में व्यस्त हैं। पूरे इत्मीनान और बहुत बारीकी से सही तौल लेकर व्यक्ति के नाम के साथ उसे ठेकेदार को बताया जा रहा है, और वह सज्जन उस व्यक्ति का बहीखाता सदृश्य डायरी का पन्ना खोलकर उसके कीड़े का वजन नोट कर लेता है। यह वो व्यक्ति हैं जिन्होंने सीजन से पहले ऐडवान्स पैंसा लिया हुआ है, ठेकेदार लिखत-पढ़त के बाद कीड़े की पूरी कीमत से अग्रिम दी गयी रकम घटाकर अंतिम देयक राशि तुरन्त ही संग्रहकर्ता को थमा देता है। पूरी तरह से पद्धतिबद्ध और अधिक्रमिक बाज़ार प्रकिया का यह अनूठा उदाहरण है, सहायकों द्वारा बताई गयी तौल बीस ग्राम, पचास ग्राम, सौ ग्राम, दो सौ ग्राम, आधा किलो से एक किलो तक पहुँच रही हैं, हाँलाकि आधा किलो से एक किलो के बीच के परिवार इक्का-दुक्का ही हैं। ठेकेदार के आदमी स्वस्थ कीड़े के साथ ही खराब माल भी उठा रहे हैं जिसकी कम कीमत दी जाती है, इसे ट्रीटमेंट देकर आगे बेचा जाता है। जिन संग्रहकर्ताओं को आधे किलो से एक किलो तक का भुगतान किया जाना है, ठेकेदार उन्हें इस समय अपनी सामर्थ्य के अनुसार पैंसा दे रहा है और बाँकी बची राशि को एक स्वहस्ताक्षरित कागज पर लिखकर उन्हें पकड़ा रहा है; यह पैंसा एक सप्ताह के भीतर मिल जाएगा और यही वृत्तिक सम्बंध और विश्वास इस व्यापार को साल दर साल पोषित भी करते है। ग्रामीण स्वयं को इस बड़ी जिम्मेदारी से मुक्त मानकर पुनः अपनी दिनचर्या में एकतार हो जाते हैं और ठेकेदार अपने लोगों के साथ माल को लेकर अपने ठिकाने की ओर चल पड़ा है। ठेकेदार तथा उसके आदमियों के लिये माल को अपने ठिकाने तक पहुंचाना बड़ी जिम्मेदारी है, चूंकि मामला भारतीय क्षेत्र में प्रथम दृष्टितया ही अवैध है और उसे नेपाल, तकलाकोट या अन्यत्र पहुँचाया जाना है। कीड़ा लेकर जाने वाले किटकनदारों ने लगातार सालों में जानें गवाईं हैं, अक्सर सुनने में आता है कि ये लोग असलहों और औजारों से लैस रहते हैं मगर उस भद्र पुरुष को देखकर आज ऐसा सोचना भी पाप प्रतीत हो रहा था।

बहरहाल कीड़ा बिक चुका है और स्थानीय अर्थशास्त्र में उत्प्लवन बड़ी आसानी से देखा जा सकता है, कुछ परिवारों के नाबालिग भी लाखों का वारा न्यारा कर चुके हैं। कमाया गया यह धन समाज के एक बड़े हिस्से में अभिमाद और खुमारी का ही कारण मात्र सिद्ध होता है, घाटियों के बाजारों में अचानक रौनक बढ़ गयी है, बिकवाली तेज हो गयी है, कई निम्न और निम्न मध्यमवर्गीय कुनबे मय-बच्चे आकर हफ्तों होटल के कमरे में ऐश से खाते-पीते पड़े हुये हैं। नाबालिक किशोर मोबाईक खरीद रहे हैं जिंदगी के एक्सीलेरेटर को पूरा मरोड़ देने की लालसा उनकी आँखों से बस अब टपकी तब टपकी की स्थिति में है। नो नेटवर्क जोन में रहने वाले युवा, अधेड़ सभी महंगे स्मार्ट फोन खरीदते देखे जा सकते हैं। जिन परिवारों ने लगातार बीते सालों में बैंक बैलेंस का इज़ाफ़ा किया वो बच्चों को लेकर तहसील से जिला मुख्यालय तक पलायन कर चुके हैं मगर कीड़े के सीजन में वो हर साल गाँव लौट आते हैं, सेना के सिपाही तक अपनी सालाना छुट्टियों को इस सीजन हेतु बचाये रखते हैं; कई संग्रहकर्ताओं और स्थानीय बिचौलियों ने तो एक मौसम की विशेष मेहनत को ही धर्म मान लिया है। उच्च हिमालय से लगी पनढालों पर बसे इन गाँवों की स्थिति भौगोलिक रूप से अत्यधिक संवेदनशील है भूकम्प और लगातार होते भूस्खलनों ने इन गाँवों को कई बार उजाड़ा है मगर यहाँ बाशिंदों ने भी अपनी मिट्टी से जोंक की तरह चिपके रहने का संघर्ष बरकरार रखा है। बड़े से बड़े प्रलय के बाद भी इस भूमि ने यूँ ही अपना उपजाऊपन बरकरार रखा है और आगे भी इस भूमि में पोषित होने वाला जीवन अपने भौतिक अस्तित्व पर बर्फ की जलन और गुनगुनी धूप की तपन को महसूस करता ही रहेगा। हिमालय की इन ढलानों पर यूँ ही अविराम चलता रहेगा कविता सरीखा जीवन और चिरकाल से प्रकृति की रची इस कविता की पंक्तियों के बीच छिपे ‘कीड़े’ जैसे असंख्य राज भविष्य में भी अभिव्यक्त होते ही रहेंगे… कालखण्ड दर कालखण्ड…।

 

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