गुमनामी की मौत मरने को मजबूर खड़िया खदानों के मजदूर


nainitalsamachar
May 3, 2019
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—चंद्रशेखर
बागेश्वर जिले में खड़िया खनन क्षेत्र में खड़िया माफिया के कानून इस देश के कानून से अलग हैं। सरकारें आती—जाती रहती हैं लेकिन उनके अपने मजदूरों के लिए बनाए गए काले कानून आज तक भी जस के तस लागू हैं।
न हो क़मीज़ तो घुटनों से पेट ढक लेंगे, ये लोग कितने मुनासिब हैं इस सफ़र के लिए। कवि दुष्यंत की कविता बागेश्वर जिले के खड़िया खनन क्षेत्रों में काम करने वाले मजदूरों के लिए सटीक बैठती है। हाल ये हैं कि इन मजदूरों के ठिकाने के बारे में खड़िया कारोबारी के अलावा किसी को पता नही होता। और ये मजदूर भी गजब के होते हैं, बस पैसा कमाया और निकल गए। कुछ हादसा हो गया तो इन मजदूरों की नियति में गुमनामी की मौत के अलावा कुछ नही आती।
बागेश्वर जिले में वर्तमान में 38 खड़िया खदानें चल रही है। जिनमें 1200 से अधिक मजदूर काम कर रहे है। यहां काम करने वाले 70 प्रतिशत मजदूर नेपाली और बिहारी मूल के हैं। यह बरसात के बाद सितंबर माह से 15 जून तक काम करने के लिए यहां पर आते है। तीन माह काम बरसात के कारण बंद रहता है तो वह यहां से चले जाते हैं। नौ महीने तक यह खड़िया खदानों में हाड़ तोड़ काम करते है। ज्यादातर मजदूरों के बच्चे भी इनके साथ ही रहते हैं।
सबसे बड़ी विडंबना यह है कि इतनी बड़ी तादात होने के बाद भी सबसे असुरक्षित यह ही मजदूर है। इन मजदूरों का आज तक श्रम प्रवर्तन विभाग में किसी प्रकार का पंजीकरण नही हैं। अगर काम के दौरान कोई हादसा भी होता है तो इनको कुछ नही मिलता है। बस ठेकेदार की कृपा पर यह जिंदा रहते है। वह भी कुछ रुपए देकर इतिश्री कर देता है। इन खड़िया खानों में आए दिन हादसे होते रहते है। लेकिन खनन माफिया के प्रभावशाली होने के कारण इन मजदूरों की आवाज खड़िया खानों से बाहर नही निकल पाती।
खड़िया खानों में काम करने वाले मजदूरों को आठ से दस रुपया प्रति कट्टा के हिसाब से पैसा मिलता है। एक मजदूर प्रतिदिन 500 से 600 रुपया आमदनी कर लेता हैं। इसके अतिरिक्त उसे कुछ नही मिलता है। काम के दौरान किसी प्रकार के हादसे आदि का जिम्मेदार एक तरह से वो खुद ही होता है। खड़िया खनन क्षेत्र में काम करने वाले नेपाली, बिहारी मजदूर अगर किसी हादसे का शिकार हो जाए तो उनके मुआवजे का कोई प्राविधान नही है। श्रम प्रवर्तन विभाग में अभी तक जिले के असंगठित क्षेत्र के केवल 4237 मजदूर ही पंजीकृत है। जबकि जिले में मनरेगा मजदूर ही है। इसके अलावा विभिन्न सरकारी विभागों, अवस्थापना विकास में लगे श्रमिक है। ऐसे में सरकार की मंशा पर सवाल उठना लाजिमी हैं। श्रमिक कार्ड पर सरकार से 60 साल होने पर 1500 रुपया पेंशन, अंतेष्टि को 10 हजार रुपया, स्वाभाविक मौत पर 3 लाख 20 हजार रुपया, दुर्घटना पर 5 लाख रुपया, इलाज के लिए 7 हजार, लड़की की शादी को 1 लाख रुपयों की सुविधा मिलती है। श्रम प्रवर्तन अधिकारी सुरेश चंद्र का कहना है कि खनन क्षेत्र में काम करने वाले मजदूरों का पंजीकरण नही होता हैं। अगर कोई हादसे का शिकार होता है तो किसी प्रकार का मुआवजा नही मिलता।
खड़िया खनन में राजनीतिके हर पार्टी के कारिंदों से लेकर हर बड़ा वर्ग गहरे तक जुड़ा पड़ा है। लेकिन उनके सिर्फ अपने ही स्वार्थ हैं। और पैंसे की हवस में वर्षों से सभी धरती का सीना छलनी  करते आ रहे हैं। भूकंपीय जोन में होने के बावजूद भी सरकारी भू—वैज्ञानिकों की खड़िया खनन क्षेत्रों पर चुप्पी भी अपने आप में कई सवालात तो खड़े करती ही है।
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