नैनीताल: खतरे की दूसरी घंटी


राजीव लोचन साह
September 18, 2018

18 सितम्बर 1880 को नैनीताल में एक भीषण भूस्खलन हुआ था जिसमें लगभग 151 लोगों को मृत्यु हो गयी थी। उसके बाद से अंग्रेजों ने नैनीताल को बसाने में काफी एहतियात बरतनी शुरू कर दी थी पर बाद के समय में उन सारे नियम कानूनों को ताक में रख दिया गया जिस कारण नैनीताल की स्थिति दिन-ब-दिन खराब होती चली गयी। आज से करीब 3 वर्ष पहले भी नैनीताल की माल रोड में एक भीषण भूस्खलन हुआ और बलिया नाला भी दरक रहा था। उस समय नैनीताल समाचार में राजीव लोचन साह ने इस पर एक विस्तृत लेख लिखा था और आज तीन वर्ष बाद स्थितियां और भी खराब हो गयी हैं। इसलिये उस समय लिखा यह आलेख आज और भी ज्यादा प्रासंगिक हो जाता है इसलिये 18 सितम्बर के अवसर पर एक बार फिर से इस आलेख को यहाँ दिया जा रहा है।                                                                       -सम्पादक

 

5 जुलाई की शाम हुई भारी वर्षा ने जिस तरह नैनीताल की हड्डियाँ ढीली कर दीं, उससे तय है कि अगर हालात काबू में न हुए तो इस खूबसूरत शहर के पोम्पेई के खंडहरों में तब्दील होने में ज्यादा वक्त नहीं है। फिर यहाँ भी लोग मैदानों की भीषण गर्मी से बचने या यहाँ की प्राकृतिक सुषमा का आनन्द उठाने के लिये नहीं आयेंगे, बल्कि उसी तरह आयेंगे जैसे ईसा पूर्व तीसरी शताब्दी में उजड़े रोमन साम्राज्य के शहर के खंडहरों को देखने जाते हैं। यह सम्भावना इसलिये भी मजबूत है, क्योंकि यहाँ के नागरिक भी हर सच्चे भारतीय की तरह बहुत दूर की नहीं सोचते और समस्याओं को सामने देख कर शुतुरमुर्ग की तरह रेत में सिर घुसेड़ने में विश्वास करते हैं। यहाँ के प्रशासनिक अधिकारी भी देश में अन्यत्र की तरह नियम-कानून तोड़ने की छूट देकर आर्थिक दृष्टि से अपना भविष्य मजबूत करने को ही अपना कर्तव्य मानते हैं। फिलवक्त तो यहाँ शासन-प्रशासन नाम की कोई चीज वैसे भी नहीं है और यहाँ की व्यवस्था हाईकोर्ट में चल रही ‘अजय रावत बनाम भारत सरकार एवं अन्य’ नामक एक जनहित याचिका चला रही है।

चैबीस घण्टों में 15-16 इंच बारिश पड़ना नैनीताल नगर के लिये असामान्य नहीं है। मगर पाँच जुलाई को महज तीन घण्टों में जो 15 इंच (लगभग 400 मिमी) वर्षा हुई, वह यहाँ के लिये भी बादल फटने जैसा ही था। यदि सत्तर से पहले की बात होती तो इस वर्षा से शायद बहुत ज्यादा नुकसान न हुआ होता। मगर इन पैंतालीस सालों में नैनीताल लगातार जर्जर होता आया है। बहुत बड़ी विडम्बना है कि इसे लूटने-खसोटने वाले इसके भाग्यविधाता बने बैठे हैं। यहाँ की बुनियादी समस्याओं की ओर ध्यान खींचने की कोशिश करने का मतलब है कि यहाँ के प्रशासन, मीडिया, राजनीतिक दलों के नेताओं, भद्रलोक, होटल व्यवसायियों और व्यापारियों को एक साथ अपना दुश्मन बना लेना। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश और ब्रजेन्द्र सहाय समिति की संस्तुतियाँ आने के बावजूद पिछले पच्चीस सालों में यहाँ के नागरिक विवेक के स्वरों का गला घोंटने में एकजुट रहे हैं। ताज्जुब नहीं कि 5 जुलाई की तेज वर्षा में नैनीताल की विश्वप्रसिद्ध मालरोड सीमान्त की किसी उपेक्षित सड़क की तरह मलबे के ढेर में बदल गई, बिड़ला विद्या मंदिर को जाने वाला मार्ग बुरी तरह ध्वस्त हो गया, हैरतअंगेज विशिष्ट कट्टा तकनीक से बने अनेक छोटे-छोटे मकान बुनियाद बह जाने से हवा में तैरने लगे, कुछ मकान ऊपर से आये मलबे से कमर तक ढँक गये और एक नाव चालक सर पर पेड़ गिर जाने से मर गया। कई जगह दरारें पड़ीं। 11 जुलाई को एक भूस्खलन के बाद बलिया नाले का नासूर भी फिर से पिराने लगा। उस एक हफ्ते नगर में आतंक की स्थिति रही। मगर जैसे ही मौसम सामान्य होता जा रहा है, हालात भी पहले की तरह होने लगे हैं। जिसका मकान टूटा है, वह मकान बनायेगा। सरकार और प्रशासन विश्व बैंक या ए.डी.बी. से करोड़ों रुपये की कुछ नयी परियोजना ले आयेंगे। केदारनाथ की तरह यह आपदा भी न जाने कितने लोगों का दलिद्दर दूर करेगी।

अंग्रेजों ने यह शहर बसाना शुरू किया ही था कि चालीस साल के भीतर ही 18 सितम्बर 1880 के भू स्खलन में 151 लोगों के काल कवलित हो जाने के बाद उन्हें मालूम पड़ गया कि वे एक बेहद अस्थिर और खतरनाक स्थान पर आ बसे हैं। तब उन्होंने एक अठमासे शिशु को इन्क्यूबेटर में पालने की तरह बेहद एहतियात के साथ इसका रखरखाव शुरू किया। पानी जमींदोज हो कर दुबारा खतरे का कारण न बने, इसके लिये एक अद्भुत नाली प्रणाली विकसित की गई, जिसमें कैच पिटों की व्यवस्था थी जो एक ओर पानी के वेग को शून्य करते थे तो दूसरी ओर मलबे-मिट्टी को झील में जाने से रोकते थे। तीखी ढलान वाले पैदल और घोड़िया मार्गों पर पनकट्टों के रूप में आड़े पत्थर लगाये गये। बहुत सा बरसाती पानी जमीन जज्ब कर लेती थी, जो रिस-रिस कर बाद तक तालाब में पहुँचता रहता था। इसीलिये झील के तीनों ओर की पहाड़ियों को नैनीताल का जलग्रहण क्षेत्र कहा जाता है। जो पानी जमीन जज्ब नहीं कर पाती थी, वह इन पनकट्टों से कट कर बगल की नालियों में चला जाता था और उन नालियों से बड़े नालों में। इस तरह पानी, जो भू स्खलन की दृष्टि से पहाड़ों के लिये सबसे खतरनाक होता है, की विनाशक ताकत पर पूरी तरह लगाम लगा दी गई। मकान बनाने के लिये 30 डिग्री से अधिक की ढलान पर जमीन काटना पूरी तरह निषिद्ध कर दिया गया। नगरपालिका के तब के बाईलाॅज पढ़ कर आँखें खुली की खुली रह जाती हैं। जनजीवन के हर आयाम को नगर के अस्तित्व के साथ तोलते हुए अंग्रेज शासकों ने ऐसे कानून बनाये कि उन्हें गीता-कुरान की तरह पवित्र मान कर उन पर लगातार अमल होता रहता, तो नैनीताल को ये दुर्दिन नहीं देखने पड़ते। हाँ, यह बात अंग्रेज भी तब नहीं सोच पाये थे कि इक्कीसवीं शताब्दी आते-आते इस अन्यथा भुक्खड़ मुल्क में इतनी गाड़ियाँ हो जायेंगी कि उन्हें कहीं खड़ा करना भी मुश्किल हो जायेगा और तब उन्हें सार्वजनिक सड़कों पर खड़ा करना हर भारतवासी उसी तरह अपना जन्मसिद्ध अधिकार मानने लगेगा, जैसे किसी भी सरकारी जमीन को अपनी पुश्तैनी सम्पत्ति मान कर उस पर अवैध निर्माण कर लेना।

अंग्रेजों के प्रिय नगर रहे नैनीताल के दिन आजादी के बाद बहुरने ही थे। सत्ता, राजनीति और प्रशासन से मूल्यों का लोप हो रहा था। परम्परायें टूटने की शुरुआत हो गई थी। नगरपालिका के पुराने बाइलाॅज भी किनारे किये जाते रहे। नैनी झील इतनी स्वच्छ नहीं रही कि उसका पानी पहले की तरह कच्चा ही पी लिया जा सके। इस विषय पर वनस्पति विज्ञानी प्रो. एस. पी. सिंह, जो सालों बाद गढ़वाल विश्वविद्यालय के कुलपति रहे, ने एक शोध कर साबित किया कि नैनीताल अब पहले की तरह ताजे पानी की झील नहीं रह गया है। इसका सबूत है इसके किनारे उगने लगा एक पौधा, पोटो मोजीटोन पैप्टिनेटस, जो मरणशील तालाबों का सूचक है। इस शोध पर एक पत्रकार ने वर्ष 1976 में एक खबर बनाई, जो व्यापक रूप से छपी। इसका असर यह हुआ कि नैनीताल में उस साल पर्यटन उसी तरह चैपट हो गया, जैसे 2013 की केदारनाथ आपदा के बाद सम्पूर्ण उत्तराखंड में हुआ था। वह इमर्जेंसी का जमाना था। नैनीताल के भद्रलोक, होटल व्यवसायियों और व्यापारियों ने मिल कर उक्त पत्रकार, विद्या भाष्कर त्रिवेदी को ‘मीसा’ में जेल भिजवा दिया। यहाँ यह बताना प्रासंगिक होगा कि इमर्जेंसी में नैनीताल नगर का एक भी राजनीतिक नेता जेल नहीं गया था। खबर सनसनीखेज अवश्य थी, मगर पत्रकार को यह सजा देना तो निहायत अनौचित्यपूर्ण था। होना तो यह था कि उस खबर से चिन्तित हो कर नैनीताल को बचाने और सँवारने के लिये तभी से एकजुट प्रयास शुरू हो जाते। मगर कहाँ ? नैनीताल नगर को तो अभी आगे और दुर्दिन देखने थे।

सत्तर के दशक में उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा समस्त नगरपालिकाओं को भंग कर उन पर प्रशासक के रूप में सरकारी अधिकारियों को बिठला कर नगरीय स्वशासन का गला घोंट दिया गया। नगरपालिकायें भ्रष्टाचार के केन्द्र के रूप में उभरने लगीं। नैनीताल नगरपालिका, जो अपने अद्भुत कानूनों के कारण उन्नीसवीं सदी से ही विशिष्ट थी, भी इस बीमारी से नहीं बच सकी। मगर नैनीताल के लिये सबसे दुर्भाग्यपूर्ण वर्ष 1984 का रहा। उस बार पंजाब में भिंडरवाला के आतंक, आॅपरेशन ब्ल्यू स्टार और इदिरा गांधी की हत्या से उत्पन्न विक्षोभ के बीच गर्मियों के पर्यटक कश्मीर नहीं जा सके और हजारों लोगों को नैनीताल और मसूरी की ओर मुँह करना पड़ा। नैनीताल का छोटा सा हिल स्टेशन तब इतने सारे पर्यटकों को ठहराने की क्षमता भी नहीं रखता था। उसी दौर में दिल्ली के धंधेबाजों ने नैनीताल की व्यावसायिक क्षमता को भली भाँति पहचान लिया। उस साल नैनीताल में अवैध रूप से संचालित होने वाली टूरिस्ट कोचों का प्रचलन शुरू होने से ठगी का एक नया सिलसिला शुरू हुआ। रही सही कसर उसी साल नवम्बर में तत्कालीन मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी द्वारा नैनीताल झील विकास प्राधिकरण बना देने और लगभग उसी कालखंड में मारुति कार के अवतरण से पूरी हो गई। नैनीताल को बचाने-सँवारने के लिये ऐसी एक संस्था की जरूरत यहाँ के सभी हितैषी महसूस कर रहे थे, मगर ऐसा किसी ने नहीं सोचा था कि प्राधिकरण खुद ही चोरी करने और फिर सजा से बचने की तजवीजें सुझाया करेगा। लिहाजा, जिस नैनीताल में 1984 से पहले तक कोई ‘स्टार’ होटल नहीं था, ‘काॅमर्शियल फ्लैट्स’ का किसी ने नाम नहीं सुना था, 1984 से वहाँ ऐसे भारी भरकम निर्माणों की बाढ़ आ गई, जो प्राधिकरण की नजरों में ‘वैध’ थे और नैनीताल के अस्तित्व के लिये बेहद खतरनाक। भूमि के कारोबारियों ने नगरपालिका, जल संस्थान, बिजली विभाग के छोटे-बड़े कर्मचारियों को भी भली भाँति सिखा दिया कि इस धंधे में चोखी कमाई है। इस खेल में सबसे ज्यादा दिक्कत नैनीताल के उन पुराने बाशिन्दों को हुई, जो परिवार बढ़ने पर ईमानदारी से अपने लिये एक अदद नई छत भी नहीं बना सकते थे। उन्हें मजबूरी में हल्द्वानी की ओर खिसकना पड़ा।

प्राधिकरण प्रायोजित विनाशकारी मकानों का निर्माण और भूमि के कारोबारियों की गतिविधियाँ नैनीताल के बाहर समूचे झील परिक्षेत्र तक फैल गईं। मगर नैनीताल नगर के अन्तर्गत चिन्ता और विवेक की एक छोटी सी आवाज भी समानान्तर चलती रही, जिसके अन्तर्गत वर्ष 1992 में प्रख्यात वैज्ञानिक और कुमाऊँ विश्वविद्यालय के संस्थापक कुलपति डाॅ. डी. डी. पंत की अध्यक्षता में ‘नैनीताल बचाओ समिति’ का गठन हुआ। समिति के लगातार प्रयासों, छिटपुट आन्दोलनों और विशेषकर इसके ऊर्जस्वी सचिव एडवोकेट प्रदीप लोहनी द्वारा किये गये शोध और पत्राचार के बाद मुलायम सिंह सरकार द्वारा ब्रजेन्द्र सहाय समिति की अध्यक्षता में एक समिति बनाई गई। इस समिति ने नैनीताल की समस्याओं को भलीभाँति चिन्हित किया और इस नगर को बचाने के लिये कुछ जरूरी सुझाव भी दिये। दुर्भाग्यवश सहाय कमेटी की संस्तुतियों पर कभी ध्यान ही नहीं दिया गया और आज तो नैनीताल के भाग्यविधाता इस समिति का नाम भी नहीं जानते। सहाय समिति ने अपनी रिपोर्ट के दूसरे हिस्से, जो गोपनीय ही रही और कभी सार्वजनिक नहीं हो पायी, में बाकायदा उन अधिकारियों के नाम भी लिखे थे जिन्होंने उस कालखंड में नैनीताल को बर्बाद करने में सक्रिय भूमिका निभाई थी। ‘नैनीताल बचाओ समिति’ की सक्रियता के दौर में ही समिति के एक सदस्य प्रो. अजय रावत सर्वोच्च न्यायालय में जनहित याचिका दायर कर नैनीताल नगर के लिये कुछ निर्देश ले आये। ये निर्देश शासन-प्रशासन के लिये बहुत बाध्यकारी नहीं थे, अतः नैनीताल में विनाश का खेल चलता रहा। इस जनहित याचिका का सबसे कमजोर पक्ष यह था कि इसमें नैनीताल के तत्कालीन जिलाधिकारी, जो नैनीताल की बर्बादी के सूत्रधार थे, को दोषों से बच निकलने का पूरा मौका मिल जाता था। इस विन्दु पर सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश ब्रजेन्द्र सहाय समिति की रिपोर्ट के आड़े आ जाते थे।

बहरहाल, सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय और ब्रजेन्द्र सहाय समिति की संस्तुतियों के आने के तत्काल बाद उत्तराखंड राज्य आन्दोलन गर्मा उठा और एक बड़े आन्दोलन के नीचे नैनीताल बचाने का आन्दोलन ठंडा पड़ गया। वैसे भी हर आन्दोलन की एक आयु होती है। राज्य आन्दोलन के शान्त होने के साथ-साथ नैनीताल बचाओ आन्दोलन भी कमजोर पड़ गया। इस बीच नैनीताल नगरपालिका के एक चेयरमैन और अधिकारियों ने अब तक ‘असुरक्षित’ माने जाने वाले सात नम्बर क्षेत्र में जमीन कब्जाने और उन पर कट्टा तकनीक से मकान बनाने का एक बड़ा आन्दोलन चला दिया। यह इलाका इस वक्त नैनीताल का सबसे बड़ा नासूर है। यहाँ रहने वाले लोग समाज के सबसे कमजोर आर्थिक स्थिति के लोग हैं और जान हथेली पर रख कर यहाँ अपना जीवन चला रहे हैं। इन्हें यहाँ बसाने वालों ने तो अपने पैसे और वोट सीधे किये, मगर न सिर्फ इन्हें मरने के लिये छोड़ दिया, बल्कि नैनीताल नगर के ऊपर मँडरा रहे खतरे को कई गुना बढ़ा दिया।

1998 में नैनीताल में खतरे की पहली घंटी बजी। पाषाण देवी मंदिर के ऊपर से पहाड़ टूटा और कई दिनों तक शिलाखंड नैनी झील में गिरते रहे। इससे दस बारह साल पहले चाईना पीक में टूटफूट हुई थी, मगर उससे पूरे नगर में आतंक की स्थिति पैदा नहीं हुई थी। अब तो नैनीताल हाईकोर्ट ने ठीक उसी भूस्खलन की जड़ में भारी भरकम निर्माण कर उस पर कानून का ठप्पा भी लगा दिया है। देश के कानून के आगे प्रकृति की क्या बिसात ? मगर तब 1998 में ठंडी सड़क के इलाके में हो रहे भू स्खलन से सचमुच नैनीताल के भविष्य के आगे प्रश्नचिन्ह लग गया। यह गनीमत थी कि जिस इलाके से भारी-भारी पत्थर गिरे, वहाँ उन दिनों तक नाममात्र के ही मकान हुआ करते थे। इसलिये कोई जनहानि नहीं हुई। उस भूस्खलन के कुछ वर्षों बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी नैनीताल में कुछ समय बिताने आये। योजनाकारों को खुश करने के लिये उन्होंने झील संरक्षण के नाम पर कई करोड़ का पैकेज पकड़ा दिया। इस पैकेज से नैनीताल का और कुछ भला हुआ हो कि न हुआ हो, इतना अवश्य हुआ कि नगर की सारी छोटी-बड़ी, पैदल और घोड़िया सड़कें कंक्रीट और डामर की बन गईं। नैनीताल की कमजोर पहाड़ियों की चोटियों तक गाड़ियों द्वारा पहुँचना सबके लिये सम्भव हो गया और जिनके पास गाड़ी खरीदने के लिये पैसे थे, मगर उनकी पार्किंग के लिये नहीं, उन्हें मुफ्त पार्किंग की सुविधा मिल गई। अब नैनीताल का खूबसूरत फ्लैट्स ही विद्रूप होकर ‘पार्किंग’ नहीं है, इस नगर की हर सड़क फ्री पार्किंग जोन है।

मगर दूसरी तरफ कंक्रीट की हुई तीखी ढलान वाली ये सड़कें गधेरों में भी तब्दील हो गईं। अंग्रेजों के जमाने में बेहद वैज्ञानिक दृष्टि से बने नालों की तो अब देखरेख भी नहीं होती, नैनीताल के जागरूक नागरिक इनके पत्थर उखाड़ कर अपने मकानों की बुनियाद में लगाते हैं और मलबा बह कर नीचे जाने के लिये इनके किनारे लावारिस छोड़ देते हैं। तेज बरसात में उफनता पानी अब इन्हीं सड़कों के माध्यम से नीचे की ओर उतरता है और सारा मलबा और कचरा नैनी झील में पहुँचाता है। इन्हीं सड़कों के माध्यम से यह घरों और दुकानों के अन्दर भी घुसता है।
5 जुलाई को हुई बारिश के बाद मालरोड में आये मलबे ने खतरे की दूसरी घंटी बजा दी है। इसने खतरे का एक नया आयाम भी खोला है। नैनीताल नगर में हो रहे भारी भरकम निर्माणों की चिन्ता तो दबी जबान से ही सही, होती ही है। मगर यहाँ के बेतहाशा ट्रैफिक के बारे में कोई चिन्ता व्यक्त नहीं करता। मकान तो बनने के कुछ सालों के बाद एक बार स्थिर होने पर एकबारगी उतने खतरनाक नहीं रहते, यदि उनके आसपास जल निकासी की व्यवस्था सही हो। मगर बेतहाशा दौड़ते वाहन पहाड़ों के अणु-परमाणुओं को लगातार हिला कर इतना कमजोर कर देते हैं कि वह कभी टूट कर नीचे गिर सकता है। 5 जुलाई को यही हुआ। अपने घर तक गाड़ी से जाने की चाहना में एक पूर्व न्यायाधीश ने अपनी ताकत का इस्तेमाल कर एक ऐसी सड़क बनवा दी, जिसने न केवल निषिद्ध क्षेत्र में मकानों का बनना आसान कर दिया, बल्कि रोजाना सैकड़ों टैक्सियों के लिये पर्यटकों को ‘हिम दर्शन’ करवाना भी सुलभ कर दिया। बिड़ला मार्ग पर स्तुति गैस्ट हाऊस के पास कुछ प्रभावशाली लोगों ने अपनी ताकत का इस्तेमाल कर सड़क को इस तरह जबर्दस्ती चैड़ा करवा दिया कि उसका आगे निकला हुआ हिस्सा हवा में टँगा हुआ था। अब ट्रैफिक के भार से कभी न कभी तो उसे टूटना ही था। लिहाजा उस सड़क के मलबे ने बह कर मालरोड को दलदल बना दिया। सौभाग्य रहा कि 1998 की तरह इस बार भी इससे कोई जनहानि नहीं हुई। मगर अभी तो ऐसे कई मकान, कई सड़कें टूटने को तैयार बैठे हैं।
इसीलिये कहा कि यह खतरे की दूसरी घंटी है।

नैनीताल को बचाने की कोशिश कर रही आवाजें अभी मौन नहीं हुई हैं। शासन-प्रशासन की उपेक्षा और निहित स्वार्थों की धमकियों और प्रताड़ना के बीच भी वे अभी अपने को बचाये हुए हैं। हाईकोर्ट ने भी एक जनहित याचिका के रूप में महत्वपूर्ण पहल की है, हालाँकि अदालत को सूचना पहुँचाने वालों को नैनीताल के इतिहास, परम्पराओं और पर्यावरण सम्बन्धी अपनी जानकारियाँ दुरुस्त करनी होंगी, अन्यथा न्याय कम होगा और अन्याय ज्यादा।

बहरहाल अब खतरे की तीसरी घण्टी का इन्तजार नहीं किया जा सकता…..क्योंकि तब होगा सम्पूर्ण विनाश!

राजीव लोचन साह