कितनी बेशर्मी है राज्य बनने के बाद राज्य में हर चीज बंद हो रही है


चारू तिवारी
November 15, 2018

पिछले महीने 10 अक्टूबर से 25 अक्टूबर तक स्थाई राजधानी गैरसैंण संघर्ष समिति के तत्वावधान में हमने पंचेश्वर से उत्तरकाशी तक जन संवाद यात्रा की। इस यात्रा में हमने पहाड़ के उन तमाम सवालों पर लोगों से बातचीत की ​जिनके चलते पहाड़ से लोगों को बाहर खदेड़ने का इंतजाम किया जाता रहा है। इन सवालों में एक महत्वपूर्ण सवाल था राज्य में बंद होते स्कूल और उच्च शिक्षण संस्थान। हमने 18 सालों में राज्य से बंद किये गये 3600 प्राइमरी स्कूल, 40 हाई स्कूल और इंटर कॉलेजों को बंद करने की सूची, हमारे पांच नवोदय विद्यालयों को देहरादून में समायोजित करने, बीस पॉलीटेक्नीकों को बंद करने की सरकार की घोषणा की खिलाफत की थी। इन स्कूलों को बंद कर 340 स्कूलों को शिशु मंदिरों को देने की साजिश में सरकार लगी है। आने वाले दिनों में सरकार हमारे बंद स्कूलों के साथ क्या करने जा रही है यह समझना मुश्किल नहीं है।

हमारी इस यात्रा में एक महत्वपूर्ण मुद्दा था हमारे एनआईटी श्रीनगर का। हमने हर जगह इस बात को रखा कि जहां एक और भाजपा—कांग्रेस इन 18 सालों में निजी संस्थानों को औने—पौने दामों में जमीनें मुहैया कराती रही है वहीं हमारे एनआईटी के लिये इनके पास जमीन नहीं है। और अपनी स्थापना के बाद लगातार इस संस्थान के साथ जिस तरह का व्यवहार सत्ता में बैठे पूंजीपतियों के दलालों ने किया है उसका परिणाम यह हुआ कि आज इस एनआईटी को साजिशन बाहर ले जाने की साजिश कामयाब होती दिख रही है। जमीर के बिकने की भी हद होती है। सबको राष्टभक्ति का प्रमाण पत्र बांटने वाली भाजपा और उसके मातृ संगठन आरएसएस की करतूतें हम लोग पिछले दिनों देख चुके हैं। इन नालायक और जनविरोधी लोगों ने जिस तरह हमारे एनआईटी को श्रीनगर से ऋषिकेश स्तानांतरित करने के मंसूबे बनाये हैं, यह पूरी पहाड़ की अस्मिता के साथ खिलवाड़ है। हमारे प्रगतिशील जनमंच श्रीनगर के साथी लगातार एनआईटी को बचाने के लिये आंदोलन करते रहे हैं। जब से सुमाड़ी में जमीन का मामला आया लोगों ने सरकार से कहा कि वह सही जमीन की व्यवस्था करे, लेकिन इनकी साजिश को इस बात से समझा जा सकता है कि बजाय जमीन के मसले को सुलझाने के सरकार और उसके नुमाइंदो ने इस संस्थान के अस्तित्व के सामने और भी सवाल खड़े कर दिये।

इस बीच जहां कांग्रेस और भाजपा सरकार मिलकर मजखाली के नानीसार में जिंदल को प्राइवेट स्कूल बनाने के लिये ग्रामसभा की 354 नाली जमीन मुहैया कराने के लिये ग्रामीणों के दमन पर उतर आई। पोखड़ा में प्राइवेट हिमालय गढ़वाल विश्वविद्यालय के लिये सभी राजनीतिक दलों ने जमीन दिलाने में दलाली की वहीं हमारे सरकारी संस्थान के लिये इनके पास एक इंच जमीन नहीं थी। इससे समझा जा सकता है कि ये कितने खतरनाक लोग हैं। इन्होंने अंतिम हथियार के रूप यहां पढ़ रहे छात्रों को हथियार बनाया। वे मूलभूत सुविधायें न होने की बात कहकर संस्थान छोड़ने लगे। अब सरकार कहने लगी है कि चूंकि बच्चे संस्थान छोड़कर जा रहे हैं इसलिये संस्थान को ऋषिकेश स्थानान्तरित किया जाना है। एक तरफ सरकार ऋषिकेश में जगह तलाश रह है दूसरी तरफ मुख्यमंत्री लगातार कह रहे हैं कि एनआईटी कहीं नहीं जायेगा। उन्हें यह बात जलदी साफ करनी चाहिये। यह सारी परिस्थितियां सत्ता में बैठे लोगों ने बनाई हैं। यह एक दिन की बात नहीं है, बल्कि लगातार पहाड़ से बड़े संस्थानों, स्कूलों, अस्पतालों को समाप्त कर यह हमें यहां से खदेड़ने और सरकारी संस्थानों को नाकारा साबित कर बड़े पूंजीपतियों को यह सब सौंपने की साजिश है।

हम सब लोगों से अपील करते हैं कि एनआईटी को बचाने के लिये श्रीनगर में लंबे समय से प्रगतिशील जनमंच ने जो संघर्ष किया है उसे पूरे उत्तराखंड में ले जाने की जरूरत है। इस आंदोलन में हम सब लोग भागीदारी करें। यह उसी तरह का आंदोलन होना चाहिये जैसे कभी गढ़वाल विश्वविद्यालय आंदोलन को बनाने का आंदोलन था। अगर अभी इस पर कोई सशक्त विरोध हम नहीं कर पायेंगे तो इनके लिये हमारी सारी चीजों को यहां से बाहर ले जाने का रास्ता मिल जायेगा। कितनी बेशर्मी है कि राज्य बनने के बाद राज्य में हर चीज बंद हो रही है। स्कूल बंद हो रहे हैं, पॉलीटेक्नीक बंद हो रहे हैं, नवोदय विद्यालय बंद हो रहे हैं, अस्पताल पीपीपी मोड पर दिये जा रहे हैं, सेना को दिये जा रहे हैं, परिसीमन से सीटें कम हो रही हैं, जनविरोधी कानून से कृषि भूमि कम हो रही है, बड़े बांध बनने से नदियां समाप्त हो रही हैं, सिडकुल में उद्योग बंद हो रहे हैं, विभागों में नौकरियां कम हो रही हैं, गांवों से लोग कम हो रहे हैं, पहाड़ में गांव समाप्त हो रहे हैं, इनकी नीतियों से बुरांश और बांज समाप्त हो रहे हैं। तो पनप क्या रहा है? माफिया—सरकार—राजनीतिक दलों के नेता—दलाल—नौकरशाही का गठजोड़। इन सब बातों का विरोध करने वालों को ‘विकास विरोधी’, ‘नक्सल’, ‘माओवादी’, ‘राष्टद्रोही’ आदि नामों से नवाजा जा रहा है। आइये इन्हें बताते हैं हम कौन हैं। श्रीनगर में प्रगतिशील जनमंच के एनआईटी बचाओ आंदोलन से जुड़कर हम सब पहाड़ को बचाने की मुहिम को आगे बढ़ायें। लड़ेंगे, जीतेंगे।

चारू तिवारी

दिल्ली में रह कर फ्रीलान्स रूप से पत्रकारिता कर रहे चारू तिवारी उत्तराखंड के आन्दोलनों की परम्परा से सक्रिय रूप से जुड़े हैं.