कुमाऊं का स्वतंत्रता संग्राम और सालम के रणबांकुरे


चन्द्र शेखर तिवारी
August 25, 2018

उत्तराखण्ड के भू-भाग को अंगे्रजों ने वर्ष 1851 में गोर्खाओं से छीनकर अपने अधिकार में ले लिया था। तब अंग्रेजों ने सम्पूर्ण कुमाऊं और गढ़वाल के आधे हिस्से( वर्तमान पौड़ी और चमोली जिला) को मिलाकर कुमाऊं कमिश्नरी में शामिल कर लिया था। जबकि गढ़वाल के शेष  हिस्से (वर्तमान टिहरी व उत्तरकाशी जिला) को टिहरी के राजा सुदर्शन साह को सौंप दिया था। 1857 में जब देश का पहला स्वतंत्रता संग्राम लड़ा गया तब हांलाकि पिछड़ा क्षेत्र होने के कारण उत्तराखण्ड में इसका खास प्रभाव तो नहीं पड़ा पर काली कुमाऊं (वर्तमान चम्पावत जिले का भाग ) की जनता ने अपने वीर सेनानायक कालू महरा की अगुवाई में विद्रोह कर ब्रिटिश प्रशासन की थोड़ी-बहुत जड़ें हिला ही दी थीं। उत्तराखण्ड के स्वतंत्रता संग्राम के विद्रोहियों में कालूमहर व उसके दो अन्य साथियो का नाम सबसे पहले आता है।

वर्ष 1870 में अल्मोड़ा में डिबेटिंग क्लब की स्थापना के बाद 1871 में संयुक्त प्रान्त का पहला हिन्दी साप्ताहिक अल्मोड़ा अखबार  का प्रकाशन होने लगा। 1903 में गोविन्द बल्लभ पंत और हरगोविन्द पंत के प्रयासों से अल्मोड़ा में स्थापित हैप्पी क्लब के माध्यम से नवयुवकों में राष्ट्रीय भावना का जोश भरने का काम होने लगा। प्रारम्भिक दिनों में अल्मोड़ा अखबार बुद्धिबल्लभ पंत के संपादन में निकला बाद में मुंशी सदानंद सनवाल 1913 तक इसके संपादक रहे। इसके बाद जब बद्रीदत्त पांडे इस पत्र के संपादक बने तो कुछ ही समय में इस पत्र ने राष्ट्रीय पत्र का स्वरुप ले लिया और उसमें छपने वाले महत्वपूर्ण स्तर के समाचार और लेखों से यहां की जनता में शनैः-शनैः राष्ट्रीय चेतना का अंकुर फूटने लगा। 1916 में नैनीताल में कुमाऊं परिषद् की स्थापना होने के बाद यहां के राजनैतिक, सामाजिक व आर्थिक विकास से जुड़े तमाम सवाल जोर-शोर से उठने लगे।

वर्ष 1916 में महात्मा गांधी के देहरादून और 1917 में नैनीताल व अल्मोड़ा आगमन के बाद यहां के लोगों में देश प्रेम और राष्ट्रीय आंदोलन का विकास और तेजी से होने लग गया था। इसी दौरान विक्टर मोहन जोशी, राम सिंह धौनी, गोविन्दबल्लभ पंत, हरगोविन्द पंत, बद्रीदत्त पांडे, सरला बहन, शान्तिलाल त्रिवेदी, मोहनलाल साह, ज्योतिराम कांडपाल और हर्षदेव ओली जैसे नेताओं ने कुमाऊं की जनता में देश सेवा का जज्बा पैदा कर आजादी का मार्ग प्रशस्त करने में जुटे हुए थे। 1926 में कुमाऊं परिषद् का कांग्रेस में विलय हो गया। 1916 से लेकर 1926 तक कुमाऊं परिषद् ने क्षेत्रीय स्तर पर कुली बेगार, जंगल के हक हकूकों व भूमि बन्दोबस्त जैसे तमाम मुद्दों के विरोध में आवाज उठाकर यहां के स्वतंत्रता आन्दोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

1921 में उत्तरायणी के मेले पर बागेश्वर में बद्रीदत्त पांडे व अन्य नेताओं के नेतृत्व में कुमाऊं के चालीस हजार से अधिक लोगों ने कुली बेगार के रजिस्टर सरयू नदी की धारा में बहा दिये और इस कुप्रथा को हमेशा के लिए खतम करने  की शपथ ली। कुमाऊं का यह पहला और बड़ा असहयोग आंदोलन था। 1922 से 1930 के दौरान ब्रिटिश हुकूमत द्वारा जंगलों में जनता के अधिकारों पर लगायी गयी रोक के विरोध में जगह जगह आन्दोलन हुए और जंगलों व लीसा डिपो में आगजनी कर तथा तारबाड़ नष्ट करके जनता ने भारी असन्तोष व्यक्त किया।

गांधी जी जब 1929 में दूसरी बार कुमाऊं आये तो जगह जगह उनकी यात्राओं और भाषणों से यहां की जनता में और तेजी से जागृति आयी। 1930 में देश के अन्य जगहों की तरह कुमाऊं में भी अद्भुत क्रांति का दौर शुरु हुआ। इसी बीच अल्मोड़ा से देशभक्त मोहन जोशी ने स्वराज्य कल्पना के प्रचार हेतु स्वाधीन प्रजा नामक पत्र का प्रकाशन प्रारम्भ कर दिया था। ब्रिटिश हुकूमत के विरोध में आवाज उठाने पर इस पत्र पर जुर्माना लगा दिया गया और स्वाभिमान के चलते जुर्माना अदा न करने पर इस पत्र का प्रकाशन बन्द हो गया। 1930 में ही नमक कर को तोड़ने में डांडी यात्रा में गांधी जी के साथ ज्योतिराम कांडपाल सहित तीन सत्याग्रही कुमाऊं से शामिल हुए। इसी वर्ष कई जगहों पर राष्ट्रीय ध्वज फहराने की कोशिशें भी की गयी जिसमें बहुत से स्वयंसेवकों को लाठियां तक खानी पड़ीं। 25 मई 1930 को अल्मोड़ा नगर पालिका के भवन पर झण्डा फहराने के लिए लोगों की भीड़ उमड़ पड़ी धारा 144 लगने और लाठी चार्ज किये जाने के बाद भी भीड़ का उत्साह कम नहीं हुआ देशभक्त मोहन जोशी व शांतिलाल त्रिवेदी गम्भीर रुप से घायल हो गये तब सैकड़ों की संख्या में संगठित महिलाओं के बीच श्रीमती हरगोविन्द पंत श्रीमती बच्ची देवी पांडे व पांच अन्य महिलाओं ने तिरंगा फहरा दिया। 1932-1934 के मध्य कुमाऊं में मौजूद जाति-पाति व वर्ण व्यवस्था को दूर करने का कार्य भी हुआ और अनेक स्थानों पर समाज सुधारक सभाएं आयोजित हुईं। संचार तथा यातायात के साधनों के अभाव के बाद भी स्वतंत्रता संग्राम  की लपट तब यहां के सुदूर गांवों तक पहुंच गयी थी इसी वजह से 1940-41 के दौरान यहां व्यक्तिगत सत्याग्रह भी जोर शोर से चला।

1942 का वर्ष कुमाऊं के स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास के लिए सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है। 8 अगस्त 1942 को जब मुम्बई में कांग्रेस के प्रमुख कार्यकर्ताओं के साथ ही गोविन्द बल्लभ पंत की गिरफ्तारी हुई तो इसके विरोध में सम्पूर्ण कुमाऊं की जनता और अधिक आंदोलित हो गयी। ‘भारत छोड़ो‘ आंदोलन को कुचलने के लिए स्थानीय नेताओं व लोगों की बड़े पैमाने पर गिरफ्तारियां की गयीं। जगह-जगह जुलूस निकालने और हड़ताल के साथ ही डाक बंगले व भवनों को जलाने तथा टेलीफोन के तारों को काटने की घटनाएं सामने आयीं। अल्मोड़ा नगर में स्कूली बच्चों ने पुलिस पर पथराव भी किया। अंग्रेजों द्वारा आजादी के सेनानियों के घरों को लूटने व उनकी कुर्कियां करने तथा उन्हें जेल में यातना देने के इस दमन चक्र ने आग में घी का काम कर दिया। वर्ष 1942 के 19 अगस्त को देघाट के चैकोट, 25 अगस्त को सालम के धामद्यौ तथा 5 सितम्बर को सल्ट के खुमाड़ में जब ‘भारत छोड़ो‘ आंदोलन के तहत सैकड़ो ग्रामीण जनों ने उग्र विरोध का प्रदर्शन किया तो भीड़ को नियंत्रित करने ब्रिटिश प्रशासन के पुलिस व सैन्य बलों ने निहत्थी जनता पर गोलियां बरसायीं जिसके कारण इन जगहों पर नौ लोग शहीद हुए और दर्जनों लोग घायल हुए। सोमेश्वर की बोरारौ घाटी में भी आजादी के कई रणबांकुरो पर पुलिस ने दमनात्मक कार्यवाही की। यहां चनौदा स्थित गांधी आश्रम को सील कर दिया गया।

सालम के रणबांकुरे

1942 के दौरान कुमाऊं में चले ‘भारत छोड़ो‘ आंदोलन के तहत अल्मोड़ा की सालम पट्टी का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। अल्मोड़ा जनपद के पूर्वी छोर पर बसा हुआ सालम का यह इलाका तल्ला और मल्ला सालम में बंटा है जिसे पनार नदी दो हिस्सों में बांटती है। उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में कुमाऊं के तमाम अन्य जगहों की तरह इस पिछड़े क्षेत्र में भी स्वतंत्रता संग्राम की थोड़ी बहुत अलख जल चुकी थी। बाद में सालम के बिनौला गांव के नवयुवक राम सिंह धौनी ने यहां की जनता में देशप्रेम के प्रति और अधिक जज्बा पैदा करने का कार्य किया जिसके कारण यहां की जनता में अभूतपूर्व जागृति आ चुकी थी। इसी जागृति की परिणति 25 अगस्त 1942 को एक अविस्मरणीय घटना के रूप में सामने आयी जिसे इतिहास के पन्नों में ‘सालम की जनक्रांति‘ के नाम से जाना गया। राम सिंह धौनी को अपनी जन्मभूमि से अत्यधिक प्रेम था। अल्मोड़ा में हाईस्कूल की पढ़ाई के दौरान ही उन्होंने अपने सहपाठियों के सहयोग से छात्र सम्मेलन सभा का गठन कर लिया था जिसके माध्यम से वे शिक्षा, देशप्रेम और राष्ट्रभाषा हिन्दी की उन्नति पर चर्चा किया करते थे। इसी बीच अमेरिका से अल्मोड़ा लौट कर आये स्वामी सत्यदेव परिव्राजक से धौनी जी का संपर्क हुआ और वे उनके द्वारा स्थापित संस्था शुद्ध साहित्य समिति से जुड़कर देश सेवा में लग गये।

वर्ष 1919 में इलाहाबाद से बीए की परीक्षा करने के उपरान्त वे अपने गांव लौट आये और बांजधार में एक पुस्तकालय व कताई बुनाई केन्द्र की स्थापना की। रेवाधर पांडे, जगत सिंह भण्डारी व अन्य सहयोगियों के साथ पूरे सालम में पैदल घूम-घूम कर उन्होंने स्वराज्य प्राप्ति के लिए स्थानीय युवकों को प्रेरित करने  का कार्य किया। उन्होंने जनता के सहयोग से चैखुरी में प्राईवेट मिडिल स्कूल भी संचालित किया। सालम के अलावा वे देश के अन्य जगहों में भी समय समय पर शिक्षा, देशप्रेम और राष्ट्रभाषा के प्रति लोगों में जोश भरते रहे। राम सिंह धौनी जिला परिषद् के चुनाव में दो बार सालम की ओर से सदस्य भी चुने गये और बाद में बद्रीदत्त पांडे के प्रान्तीय एसेम्बली के सदस्य चुने जाने पर वे अल्मोड़ा जिला परिषद् के अध्यक्ष भी रहे। नवम्बर 1925 में वे शक्ति के सम्पादक भी बने। 1929 में मुम्बई जाकर वे पुनः अध्यापन कार्य में जुट गये और वहां के प्रवासी पर्वतीय लोगों से चन्दा एकत्रित कर अल्मोड़ा में चलने वाले राष्ट्रीय आंदोलन के लिए भेजते थे। 1930 में मुम्बई में चेचक का प्रकोप से राम सिंह धौनी बीमार हो गये और इलाज करने के उपरान्त ठीक हुए ही थे कि कुछ ही दिनों बाद वे टायफाइड के शिकार हो गये अन्ततः जीवन-मृत्यु के संघर्ष में वे अपने को बचा नहीं सके और 12 नवम्बर को सालम का यह लाल चिर निद्रा में सो गया।

राम सिंह धौनी के निधन के बाद सालम इलाके की जनता ने निश्चय किया कि वे उनके दिखाये मार्ग पर चलकर उनके छूटे कामों को आगे बढ़ते रहेंगे। 1930 में सालम के दुर्गादत्त पांडे शास्त्री जब बनारस से संस्कृत की पढ़ाई कर घर लौट आये तो उन्होंने धौनी की जगह लेकर इस इलाके के सत्याग्रहियों का नेतृत्व संभाल लिया और वे घर घर जाकर और तेजी से राष्ट्रीय जन जागरण के काम में जुट गये। पुभाऊं गांव से जब शास्त्री जी एक दिन स्वदेशी वस्तुओं को अपनाने व विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार पर भाषण देकर घर पहुंच ही थे तो उन्हें पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया और उन्हें अल्मोड़ा कारागार में भेज दिया गया। कुछ दिनों बाद जब वे रिहा हो गये तो रेवाधर पांडे, प्रताप सिंह बोरा, मानसिंह, मर्चराम, जमन सिंह नेगी व मानसिंह धानक के साथ स्वराज्य प्राप्ति के लिए पुनः जनता के बीच पहंुचने लगे। सालम के क्रांतिकारी युवक दुर्गादत्त पांडे शास्त्री की अगुवाई में बैठकें करके महात्मा गांधी के विचारों का प्रचार प्रसार करते थे।

1938 में सालम के एक और क्रांतिकारी रामसिंह आजाद भी मुम्बई से लौटकर यहां  आ गये और पूरी तरह स्वराज्य आंदोलन में सक्रिय हो गये। 1941 में महात्मा गांधी के सविनय अवज्ञा आंदोलन का असर सालम में भी पड़ा कई जगहों पर सत्याग्रहों का दौर चला जिसमें यहां के दो दर्जन के करीब कांग्रेसी कार्यकताओं को गिरफ्तार कर उन्हें अल्मोड़ा जेल भेज दिया गया। कौमी एकता दल के कई युवा कार्यकर्ताओं की सक्रियता के कारण सालम के सुदूरवर्ती गांवों में भी राष्ट्रीय जागरण का कार्य सफलता पूर्वक चलता रहा।

सालम के प्रवेशद्वार शहरफाटक में 23 जून 1942 को मण्डल कांग्रेस के तत्वाधान में एक बड़ी सभा आयोजित की गयी।जिसमें कुमाऊं के प्रख्यात नेता हर गोविन्द पंत ने झण्डा फहराया। कुछ देर बाद पटवारी को जब खबर मिली तो उसने दल -बल सहित झण्डा उतरवा कर भीड़ को तितर बितर कर दिया। इस घटना के फलस्वरुप मण्डल कांग्रेस ने आगामी 1 अगस्त 1942 को तिलक जयन्ती पर सालम के 11 जगहों पर झण्डा फहराने का निर्णय किया। 6 अगस्त को मुम्बई में अखिल भारतीय कांग्रेस कार्य समिति के अधिवेशन में ‘भारत छोड़ो’ और ‘करो या मरो‘ का प्रस्ताव पास होने के बाद 9 अगस्त की सुबह ही महात्मा गांधी जी को गिरफ्तार कर लिया गया। इस अधिवेशन में कुमाऊं-गढ़वाल से प्रतिनिधि के तौर पर गये गोविन्द बल्लभ पंत को भी गिरफ्तार कर लिया गया। पूरे देश सहित कुमाऊं में भी तमाम नेताओं व कार्यकर्ताओं की धर पकड़ हुई। 11 अगस्त को पटवारी दल सुुबह होते ही सालम के सांगण गांव में रामसिंह आजाद के घर पंहुच गये वहां बड़ी संख्या में कौमी दल के स्वयंसेवक मौजूद थे। रामसिंह आजाद को गिरफ्तारी का वारण्ट दिखाया गया पर वे शौच का बहाना बना कर पटवारी दल को चकमा देकर फरार हो गये। सालम के तमाम गांवों में अब कौमी दल के 200 से अधिक स्वयंसेवक पूरी ताकत से कैम्प चलाकर जनता में जोश व जागरुकता पैदा कर उन्हें ब्रिटिश सरकार के खिलाफ संगठित करने का काम करने लगे थे। ब्रिटिश प्रशासन के स्थानीय पटवारियों आदि को स्वयंसेवकों के कारनामों की जानकारी होने पर गुपचुप तरीके से रात के समय इन्हें पकड़ने की योजना बनती क्योंकि दिन के समय संगठित दल को पकड़ने की हिम्मत सरकारी अमले को नहीं हो पाती थी।

19 अगस्त को स्वयंसेवकों का सचल दल बसन्तपुर होते हुए 20 को बिनौला फिर 23 अगस्त को बांजधार,जैंती,पुभाऊं, बरम होता हुआ नौगांव पहुंच गया। यहां पर रात को जब आगामी कार्यक्रमों की रूप रेखा तय की जा रही थी तो प्रशासन के अमले शामिल पुलिस बल ने गांव को चारों तरफ से घेेर दिया और बैठक में शमिल 14 कार्यकर्ताओं को खाना खाने की मोहलत तक न देकर उन्हें गिरफ्तार कर लिया। प्रशासन के पुलिस बल की गिरफ्त में कार्यकर्ता आजादी के गीत गाते हुए व इन्कलाबी नारे लगाते हुए चल रहे थे। नारों व गीतों की आवाज रात के सन्नाटे को चीरते हुए पहाड़ियों से टकरा रही थी। आस-पास के गांवों में खबर फैलते ही लोग रात में ही बीरखम्भ़ में एकत्रित हो गये। यहां जमा भारी भीड़ के तेवर देखकर पुलिस का अमला बुरी तरह घबरा गया। गिरफ्तार स्वयंसेवकों को एक ओर बैठाकर जनता ने पुलिस बल को ललकारते हुए  स्वयंसेवकों को छोड़ने को कहा। तभी डराने की नीयत से पटवारी ने हवाई फायर किया ही था कि जनता मशालों के उजाले के बीच लाठी डन्डों से पुलिस बल पर टूट पड़ी और उन्हें लहुलुहान कर उनकी बन्दूकें छीन लीं। पुलिस बल के भाग जाने के बाद पंच सयाने कार्यकर्ताओं (रामसिंह आजाद, रेवाधर पांडे, लछमसिंह, मानसिंह धानक तथा लछमसिंह बोरा) ने जनता के मध्य तय किया कि अगले एक दो दिन इलाके के सारे लोग धामदेव व जैंती के स्कूल में एकत्रित हों। इसके बाद जनता ने रात में ही जैंती के सरकारी स्कूल में रखा सरकारी कारिंदों का सामान भी अस्त-व्यस्त कर दिया। 27 मील दूर अल्मोड़ा से लौट रहे कौमी सेवादल के खुफिया कार्यकताओं ने जब जानकारी दी कि आज ही दोपहर गोरों की फौज हथियारों से लैस होकर सालम को कूच कर चुकी है जिसकेे कल तक यहां पहुंचने का अनुमान है तब कौमी सेवादल के कार्यकताओं ने आगामी रणनीति पर विचार कर जनता को अपने घरों को लौटने को कह दिया।

25 अगस्त की सुबह से ही आसपास के दर्जनों गांवों की जनता तिरंगे और ढोल बाजों के साथ देशप्रेम के नारे लगाते हुए धामदेव के तप्पड़ में एकत्रित होने लगी। कुछ ही देर बाद सूचना मिली कि गोरों की फौज पूरी शक्तिबल के साथ थुवासिमल पहुंच गयी है जिसे कुमाऊं कमिश्नर ओर से सालम की बगावत का सख्ती से दमन करने के आदेश मिले हैं। यह खबर मिलते ही जनता में उबाल आ गया और वे गोरों की फौज से डटकर मुकाबला क़रने की तैयारी में जुट गये। हजारों की संख्या में एकत्रित लागों का जोश बढ़ता ही जा रहा था। कुछ ही देर में जब गोरों की फौज पहाड़ पर पहुंचने लगी तो जनता को भयभीत करने के लिए उन्होंने हवाई फायर करनी शुरू कर दी। तब जनता ने अपना बचाव करते हए उन पर पत्थरों की बौछार करनी शुरू कर दी। इस समय धामदेव का मैदान पूरी तरह रणभूमि में बदल गया था। एक ओर गोरो की फौज तो दूसरी तरफ आजादी के रणबांकुरे। पत्थरों की मार और गोलियों की धांय-धांय से चारों ओर हाहाकार  मचने लगा। दो उत्साही नौजवान चैकुना गांव का नर सिंह धानक तथा काण्डे गांव का टीका सिंह कन्याल पहाड़ी की ओट से फौज की पोजीसन देखकर पतथरों की मार करने का निर्देश देने में लगे थे तभी एक गोली नर सिंह धानक के पेट में जा लगी और वह वहीं पर शहीद हो गये। संघर्ष जारी ही था कि थोड़ी ही देर में एक गोली टीका सिंह कन्याल को भी लगी और वह गंभीर रूप से घायल हो गये। अगले दिन अल्मोड़ा के अस्पताल में उनकी मृत्यु हो गयी। शाम होने तक यह संघर्ष खत्म हो गया। बारदात के समय पकड़ गयेे कौमी सेवादल के कार्यकर्ताओं की रायफल के बटों से बुरी तरह पिटाई कर उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। सालम के इस गोलीकाण्ड में दो लोगों के शहीद होने के साथ ही 200 से ज्यादा लोगों को चोटें आयी थी।गिरफ्तार क्रांतिकारियों में प्रताप सिंह भी शामिल थे। जब पुलिस उन्हें ले जा रही थी तब वे तन्मयता से यह गीत गाते जा रहे थे-

हर जगह दल क्रांति के हों तब बेड़ा पार हो

दुश्मनों का नाश हो अपना वतन गुलजार हो

 

 

सन्दर्भ

सालम की जन क्रांति और स्वतंत्रता आंदोलन -प्रताप सिंह धानक

उत्तराखंड के प्रमुख स्वतंत्रता सेनानी- डाॅ. धर्मपाल मनराल/ डाॅ. अरुण मित्तल

कुमाऊं की बारडोली सल्ट- देवेंद्र उपाध्याय

सर फरोशी की तमन्ना- डाॅ. शेखर पाठक

चन्द्र शेखर तिवारी

चन्द्र शेखर तिवारी देहरादून स्थित 'दून लाइब्रेरी एंड रिसर्च सेंटर' में कार्यरत हैं.