नईमा खान उप्रेती उत्तराखंड कला साहित्य संस्कृति का स्वर्ण युग !


nainitalsamachar
June 21, 2018

naima khan upreti

बेडु पाको गीत गाने वाली पहली गायिका नईमा खान !

नईमा खान उप्रेती अल्मोड़ा की वादियों वो लड़की जो बचपन से गाने शौक रखती थी हर साल अपने स्कूल के गर्ल्स कॉलेज के म्यूजिक कॉम्पेटिशन की टॉपर रही पर एक साल दूसरे नम्बर पर आयी इस बात से नईमा बड़ी हैरान हुयी और अपने साथियों से कहने लगी यह कौन जज है जिसने मुझे दूसरे नम्बर ला दिया मैं तो गाने में टॉपर रही और जज कोई और नही मोहन उप्रेती थे जो उस समय इलाहाबाद में पढ़ रहे थे अल्मोड़ा में जज बन आये उस समय नईमा उनको जानती नही थी उसके बाद मोहन उप्रेती भी अल्मोड़ा में कला साहित्य सँस्कृति रंगमंच में संलग्न हो गए और धीरे धीरे नईमा खान उनके साथ रंगमंच मे गाने लगी नईमा खान ने अभिनय , नृत्य करती पर गाने में उनकी रुचि सबसे अधिक रही वो फिल्मों में पार्श्व गायिका बनना चाहती थी किन्तु मोहन उप्रेती जी के साथ जुड़ने के बाद लोक संगीत साहित्य संस्कृति रंगमंच पहचान बन गयी , नईमा खान पहली महिला गायक जिसने बेडु पाको गीत को गाया , बेडु पाको गीत की धुन परिमार्जित कर फ़ास्ट मोहन उप्रेती ने की, मोहन उप्रेती नईमा खान के कही कुमाऊनी लोकगीत प्रिय हुए जैसे पार भिड़ा की बसन्ती छोरी, सुर सुर मुरली बाजगे , ओ लाली ओ लाली हौसिया जो एचमवी म्युजिककंपनी से इसका रिकोर्ड आया  और कही घस्यारी गीत भी नईमा खान ने मोहन उप्रेती के संग गाये घस्यारी गीतों मे नृत्य भी किया घस्यारी के वनों में लहराते चलते हुए हाउ भाव को देखते हुए नृत्य सम्राट उदय शंकर ने घस्यारी नृत्य naima khan upretiबनाया जो काफी लोकप्रिय हुआ। पंजाबी रंगमंच से प्रभावित होकर हीर रांझा शैली राजुला मालूशाही नृत्य नाटिका में भी उन्होंने काम कर कही लोक गाथाओं को लोकप्रिय किया साथ ही रामी बौराणी नृत्य नाटिका में नईमा खान और मोहन उप्रेती ने काम किया नईमा खान और मोहन उप्रेती गीत गाते कब एक दूसरे हमसफ़र बन गए इस बाद का समाज मे मोहन उप्रेती और नईमा खान विरोध बहुत हुआ पर दोनों दिल सुन विवाह के बंधन में बन गए , मोहन उप्रेती कुमाऊ ऐसे हिन्दू ब्राहमण परिवार से आते थे जहां प्याज खाने को वर्जित उस समय और नईमा खान एक संम्पन मुस्लिम परिवार मेपली अल्मोड़ा के पहाड़ में रंगी एक मुस्लिम लड़की थी जैसे तैसे दोनों की शादी हुयी मोहन उप्रेती समाज मे परिवर्तन लाने वाले नई विचारधारा के व्यक्ति थे उन्होंने मुस्लिम लड़की शादी नही की वो उत्तराखंड में पहले ब्राहमण या ऐसे वर्ग से थे जहां हुड़के से ज्यादा कांधे जनयो ऊंची जातियों की शान रहा हो किंतु मोहन दा तो अपने मिजाज के आदमी थे उन्होंने हुड़के को भी अपने गले मे डाला  जो उनके तन बदन कांधे आभूषण बन गया हुड़का जो जीवन भर डला ही रहा उन्होंने कला को ऊंच नीच जाती बंधन से मुक्त किया ऐसा नही नईमा खान और मोहन उप्रेती को समाज में सुनना नही पड़ा अल्मोड़ा में कही भी हुड़का लेकर नईमा खान के साथ जाते तो लोग कहते आ गए हुडक्या हुड़कानी पर इन कलावन्तों ने समाज से ज्यादा अपने कला शिल्प को सुना यही कारण उत्तराखंड के गीत एनएसडी जैसे विश्व प्रसिद्ध रंगमंच संस्थान तक उत्तराखंड के गीत नाटक लोक गाथा संगीत पहुँचा यही नही दूरदर्शन से लेकर बॉलीवुड तक उत्तराखंड का गीत संगीत मोहन उप्रेती और नईमा खान की मेहनत द्वारा पहुँचा naima khan upretiनईमा खान एनएसडी में रंगमंच पढ़ाई के साथ एक मुकाम उत्तराखंड कला साहित्य सँस्कृति को दे दिया , नईमा खान दूरदर्शन में ब्लैक एंड वाइट के दौर से जुड़ी रही जब दूरदर्शन में पहली बार कलर प्रोग्राम बनी उसकी सहायक प्रोड्यूसर नईमा खान रही उन्होंने दूरदर्शन में कही प्रोग्राम और फिल्मों का निर्माण किया वो अभी पर्वतीय  कला केंद्र  की अध्यक्ष थी जो उत्तराखंड के  कला साहित्य सँस्कृति समर्पित संस्था जिसके संस्थापक मोहन उप्रेती थे 15 जून 2018 को दिल्ली मयूर विहार स्थित अपने किराए के मकान में उनका निधन हुआ  पहाड़ और उत्तराखंड गायिकी रंगमंच साहित्य सँस्कृति गीत संगीत की एक स्वर्णिम अध्याय का अंत हुआ जो उत्तराखंड कला साहित्य सँस्कृति प्रेमियों उनकी स्मृति सदा अमर रहेगी उनका अंतिम संस्कार नही हुआ उन्होंने अपना शरीर दिल्ली एम्स को अपनी देह को दान दिया था ऐसी समाज की विदूषी महिला युगों में पैदा होती जिन्होंने पहाड़ और अल्मोड़ा से निकल कर उस समय रूड़ी वादी परम्परा से निकल कर गाना नहीगाया दूसरे धर्म मे विवाह भी किया ।, कला साहित्य गीत संगीत और टीवी फ़िल्म में अपना मुकाम स्थापित किया ऐसी शख्शियत को नमन !

‘दि अड्डा’ वैब मैगजीन से साभार

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