नरेन्द्र मोदी का जादू टूटने लगा है


राजीव लोचन साह
December 17, 2018

 (PTI Photo)

अभी-अभी पाँच राज्यों में सम्पन्न विधानसभा चुनावों से इतना तो सिद्ध हो गया कि नरेन्द्र मोदी का जादू लगभग टूट गया है और कांग्रेस एक बार फिर से अपने पाँवों पर खड़ी हो गई है। 2013-14 के दौरान मोदी की सर्वस्वीकार्यता का वह छद्म बनाया ही काॅरपोरेट मीडिया द्वारा गया था, जब उसे लगा था कि घोटालों में घिरी, अन्यथा उसके प्रिय रहे मनमोहन सिंह सरकार की विदाई अवश्यम्भावी है। तब काॅरपोरेटों को भाजपा में नरेन्द्र मोदी अपने सबसे अनुकूल लगे थे और उसने उन्हें एक अनिवार्य ब्रांड के रूप में जनता के मन में स्थापित कर दिया था। मीडिया के लगातार प्रयासों के बावजूद सच्चाई अब सामने आ ही गई है। मगर मोदी का पूरी तरह खत्म होना बहुत आसान नहीं है, क्योंकि उसके लिये सारे विपक्षी दलों को एकजुट होना होगा और वह कतई सम्भव नहीं है। सबके अपने-अपने स्वार्थ और लालच हैं, जिनके लिये वे एक दूसरे को लंगड़ी मारते रहते हैं। और अगर भाजपा अगले लोकसभा चुनाव में हार भी गई तो बहुत से बहुत इतना ही होगा कि देश में साम्प्रदायिक सद्भाव लौटेगा और इतिहास तथा संस्कृति को विकृत करने की कोशिशों पर रोक लगायेगी। बांकी भ्रष्टाचार और लूट-खसोट पर रोक लगना सम्भव नहीं है। वह काम कांग्रेस द्वारा ही शुरू किया गया था। कांग्रेस उसे धीरे-धीरे छिप-छिप कर करती थी, भाजपा धड़ल्ले से, पूरी बेशर्मी के साथ। लूट और भ्रष्टाचार का खत्म होना पूरी तरह केन्द्रीकृत हो गये लोकतंत्र में सम्भव ही नहीं है। उसके लिये गांधी द्वारा सुझाये गये और काफी हद तक 73वें-74वें संविधान संशोधन कानूनों में परिकल्पित विकेन्द्रित शासन ही एकमात्र विकल्प है। मगर उस विकल्प को जनता समझ नहीं पायी है और राजनीतिक दलों और काॅरपोरेटों को वह अपने अनुकूल नहीं लगता। अतः यह तय है कि भाजपा-कांग्रेस के बीच झूलती जनता के लिये खुशहाली एक सपना ही बना रहेगा। मगर पहले चरण में इतना भी क्या कम है कि देश के भाईचारे को तहस-नहस करने वाली ताकत कमजोर हो जाये?

राजीव लोचन साह