कालजयी रचनाकार गीतकार नरेन्द्र सिंह नेगी


nainitalsamachar
August 26, 2018

12 अगस्त जन्मदिन के अवसर पर

योगेश धस्माना

उत्तराखंड के लब्ध गीतकार, संगीतकार और गायक नरेन्द्र सिंह नेगी एकमात्र ऐसे रचनाधर्मी कलाकार हैं, जिन्होने पहली बार गीतों में कविता को प्रतिष्ठित कर लोक संगीत से दूर होते जा रहे वाद्ययंत्रों, ढोल, तुरई, मशकबीन, मोछंग आदि आंचलिक लोक सम्पदा को पुनर्जीवन देने का काम किया है।

नरेन्द्र सिंह नेगी के गीतों की कल्पनाशीलता को देखते हुए सुप्रसिद्ध कला समीक्षक और छोटे पर्दे के कलाकार सिद्धार्थ काक और रेणुका सहाणे जब 4 जुलाई 1998 में पौड़ी पहुॅंचे तो नरेन्द्र सिंह नेगी के घर पर एक अन्तरंग बातचीत में उन्होने कहा कि ‘यार नरेन्द्र भाई पौड़ी जैसे कस्बे में बैठकर इतने वर्षो से क्या कर रहे हो? बम्बई क्यों नही चले आते?’ इस पर नेगी का उत्तर था कि मैं बाजार की कीमत पर लेखन का काम नहीं कर सकता। शायद यही वजह है कि नरेन्द्र सिंह नेगी आज शोहरत के जिस मुकाम पर होना चाहिए था, वह उन्हें नहीं मिल सका जिसके वे स्वाभाविक हकदार है। इसके बाद भी उनका गीत संगीत आज जन के जीवन को आल्हादित करता है। इसे वे अपनी पूॅजी और सफलता मानते है।

नरेन्द्र सिंह नेगी के लोकगीत-संगीत, साधना के चार दशक पूरे हो रहे है। इस अवधि में उन्होने 35 से अधिक आॅडियो कैसेट, 10 से अधिक वीडियो एल्बम निकाले और कुल 12 आंचलिक फिल्मों में वे संगीत निर्देशन का काम कर चुके है। लोकगीतों पर फुटकर रूप से उनकी 3 पुस्तकें भी प्रकाशित हो चुकी है। ‘‘खुचकण्डी’’ (1992) संस्करण भी बाजार में उपलब्ध है। नेगी की अन्य कृतियों में ‘‘गाणियूं की गंगा स्याणियूॅ का समोदर’’, पहाड़ संस्था द्वारा प्रकाशित ”मुट्ठ बोटि कि रख’’ के साथ ही हिमालयन कम्पनी द्वारा आॅंचलिक फिल्मों में गाए गीतों की ”तेरी खुद तेरो ख्याल’’ नाम से प्रकाशित पुस्तक सी.डी. के साथ 10 हजार प्रतियां श्रोताओं को निःशुल्क वितरित की गयी। इस तरह 40 वर्षों के इस सफर में उनके द्वारा लिखित और गाये गये गीतों की संख्या 5 हजार से अधिक होगी व लोक संस्कृति और लेखों की संख्या 5 हजार से ऊपर होगी। लोक गायक नेगी ने जिन आंचलिक फिल्मों में गीत संगीत दिया उनमें ‘फ्योंली’ (1983 गायन), ‘घरजंवै’ (1985 गीत-संगीत, गायन), ‘बेटी ब्वारी’ (1988 गीत, संगीत, गायन), ‘बंटवारू’ (1989 गीत, संगीत गायन), ‘फ्योंली ज्वान हवेगि (1992 गीत, संगीत, गायन), ‘छम घुंघुरू’ (गीत, संगीत, गयान) ‘जै धारी देवी’ (1997 गीत, संगीत, गायन) ‘सतमंगल्या (1999 गायन), ‘औंसी की रात ’ (2004 गीत, संगीत, गायन) ’चक्रचाल’ (2006 गीत, संगीत, गायन), व ‘मेरी गंगा होली मैंमू आॅली’ (2008 गीत, संगीत, गायन) प्रमुख हैं।
लोक गायक नरेन्द्र सिंह नेगी के गीत, संगीत और गायन की विशेषता मौलिकता के साथ, समाप्त होती गढ़वाली बोली के दुर्लभ शब्दों को जीवंत बनाए रखना भी है। काल परिस्थिति के चलते आॅचलिक बोली तीज, त्यौहार और ऋतु परम्पराओं को उन्होने न महज आॅडियो, वीडियो के रूप में सुरक्षित रखा है वरन अपने कर्णप्रिय संगीत और सुर से लोक संस्कृति के संरक्षण में एक युगान्तकारी प्रयास किया है।
लोक गायक नरेन्द्र सिंह नेगी पर कई बार कला समीक्षक यह कह कर हमला करते हुए कहते है कि उन्होने अधिकतर विरह और महिलाओं को केन्द्र बिन्दु मान कर गीत लिखे है। इस पर स्वयं लोक गायक नेगी कहते है कि ”कवि के सामने सर्वाधिक अपील करने वाले जो क्षण और दृष्य होते है उन्हें वह अपने गीतों में उतारता है। पहाड़ में महिलायें सामाजिक, आर्थिक एवं सांस्कृतिक जीवन की धुरी रही है, और राज्य बनने के बाद भी इन्हें सर्वाधिक कष्टों से जूझना पड़ रहा है, तो स्वाभाविक रूप से मेरी गीत रचना में महिलाएॅ केन्द्र में रहेंगी ही, जब तक उनके कष्ट रहेंगे।’’

नरेन्द्र सिंह नेगी ने अपनी गीत, संगीत की यात्रा में एक पक्षीय गीत नहीं रूचे, वरन सभी ऋतुओं, समाज के ज्वलंत प्रश्नों, जैसे पलायन, पर्यावरण संरक्षण, जल संरक्षण, क्षेत्रीयता और जातिवाद जैसी कुरीतियों के विरूद्ध, श्रृंगार और करूणा के साथ जन आंदोलन के दौर में गीतों की रचना कर बहुआयामी प्रतिभा का परिचय दिया है। उत्तराखंड में मोहन उप्रेती के बाद नरेन्द्र सिंह नेगी ने ही गढ़वाली, जौनसारी गीतों को आधुनिक आवश्यकतानुसार लिपि और स्वरबद्ध कर उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर मंचों के माध्यम से देश-विदेश में प्रवासियों तक पहुंचाने का अविस्मरणीय कार्य किया है। कहना अनुचित न होगा कि गायक नरेन्द्र सिंह नेगी ने अपने गीतों के माध्यम से पहाड़ी शब्द से परहेज करने वाले प्रवासियों के बीच न सिर्फ गीतों को पहुंचाया वरन उनकी जुबान में अपने गीतों को पहुंचाया वरन उनकी जुबान में अपने गीतों को गुनगुनाने के लिए मजबूर कर गढ़वाली-कुमाऊनी से हटकर एक उत्तराखंडी होने की पहचान देने में भी ऐतिहासिक कार्य किया है। परिणामतः आज उत्तराखण्ड में विशेषकर गढ़वाल आंचल में कोई स्कूल, कालेज या फिर सार्वजनिक कार्यक्रम ऐसा नहीं, जहां नेगी के गीत न सुनाई देते हों। नेगी के गीतों में भले ही राॅक एण्ड राॅल पर मस्ती के साथ नाचने की छूट न हो किन्तु शोधार्थियों के समक्ष वह सवाल खड़े कर विश्लेषण करने को बाध्य अवश्य करते है।

इस विषय में जर्मनी के हैम्सवर्ग विश्वविद्यालय में कार्यरत विलियम बोसेक्स कहते है कि वह एकान्त के क्षणों में या तो जागर या फिर नरेन्द्र सिंह नेगी के गीतों को गाकर पहाड़ की जिंदगी के मर्म को जानने का प्रयास करते है। वर्ष अप्रैल 2005 में एक भेंट में उन्होने बताया कि उन्होंने विश्व में अधिकांश लोकगीत और संगीत को सुना और जाना है किन्तु जितनी विविधता और बौद्धिकता सम्पदा उत्तराखण्ड विषेशकर नेगी के गीतों में है, अन्यत्र कहीं देखने को नहीं मिलती है। लेखक के साथ हुई इस बातचीत में विलियम बौसैक्स (मानव विज्ञानी) बीच-बीच में नेगी द्वारा नन्दाराजजात पर गाए गीतों को सुनकर उनका सिलसिलेवार विश्लेषण करते।

उत्तराखंड में गढ़वाली, कुमाऊँनी गीतों को एक मंच में लाकर गिर्दा और नेगी की जुगलबंदी और मंच के कार्यक्रमों में जनता से सीधे सवाल-जवाब का एक नया प्रयोग था। इस जुगलबंदी के बाद दोनों क्षेत्रों के गीत, संगीत को आम उत्तराखंडी के लिए जिस सर्वमान्य शब्दावली का निर्माण नरेन्द्र और गिर्दा ने किया उससे दोनों गीतकारों की स्वीकार्यता दोनों अंचलों के श्रोताओं के बीच बढ़ी। फलस्वरूप गढ़वाली – कुमाऊॅ के संस्कृतिकर्मी एक दूसरे के न सिर्फ नजदीक आए वरन दानों क्षेत्रों के रंगकर्मियों और बुद्धिजीवियों के बीच आपसी समझ भी पहले से अधिक विकसित हुई।

लोक गायक नरेन्द्र सिंह नेगी और आयरलैंड के गीत एवं संगीतकार बाब गेडोल्फ के बीच दोनों का अध्ययन करने के बाद मैने पाया कि दोनों के जीवन में काफी हद तक समानताएॅ है। दोनों ने ही घोर आर्थिक कष्टों के बीच जीवन यात्रा प्रारम्भ की। गेल्डोफ का जिस तरह सामाजिक मूल्यों पर कहना है कि अगर कोई लड़खड़ा का नीचे गिर है और उसे हम उठाने के लिए अपना हाथ नहीं बढ़ा सकते तो हमें खुद को इंसान कहने का कोई हक नहीं है। ठीक इसी तरह लोक गायक नरेन्द्र सिंह नेगी का मानना रहा है कि यदि हमें अपनी बोली-भाषा, वेश-भूषा में पिछड़ने की बू झलकती है। तो हम लोक भाषा और कलाओं के संरक्षण, सम्वर्द्धन के हकदार भी नहीं है। उन्होनें सदैव नई पीढ़ी के रचनाकारों और गायकों को कंदराओं से उठकार मंच तक पहुंचाने मेे जो अतुलनीय कार्य किया है वह उनके द्वारा लोक संगीत और युवा गायकों को किसी सहारा देने से कम नहीं था।

प्रीतम भरतवाण, मीना राणा, मंजू सुन्द्रियाल, अनिल बिष्ट, ज्योति नैनवाल, दरवान नैथवाल, किशन महिपाल, कुमाऊॅ से सपना आर्य, राजलक्ष्मी, दीपा पंत आदि ऐसे नाम हैं। जिन्हें नरेन्द्र सिंह नेगी ने अपने साथ मंच पर लाकर मंचीय शैली से भी अवगत कराया। अनिल बिष्ट को काॅरियोग्राफी में जो मुकाम आज हासिल हुआ है, उसके पीछे नरेन्द्र सिंह नेगी की बहुत बड़ा परिश्रम रहा है।

गायक नरेन्द्र सिंह नेगी के व्यक्तिगत का कैनवास उनके सामाजिक, सांस्कृतिक सरोकारों के प्रति समर्पण और प्रतिबद्धता को व्यक्त करता है। नई पीढ़ी के लोक गायकों को प्रोत्साहित करने के साथ ही वे नई पीढ़ी के कवियों के लिए रोल माॅडल रहे है। इसके साथ ही इतिहास के काल खण्ड में विलुप्त हो चुके कवियों चक्रधर बहुगुणा, हर्षपुरी, भगवती चरण निर्माेही, जीत सिंह नेगी, बृजराज सिंह नेगी, कन्हैया लाल डंडरियाल आदि कवियों की रचनाओं को नया स्वरूप प्रदान करते हुए अपने गीतों के माध्यम से प्रस्तुत कर उन्होने पुरखों की सांस्कृतिक धरोहर से नई पीढ़ी को अवगत कराने का भी प्रशंसनीय कार्य किया है।

गायक नरेन्द्र सिंह नेगी के रचना कर्म के चालीस वर्षो के सफर में कई उतार-चढ़ाव आए। एक तरफ सरकारी नौकरी, परिवार की परवरिश, संयुक्त परिवार में साथ रहते हुए नातेदारियों के साथ रहते हुए नातेदारियों के साथ मधुर सम्बंध आज दिन तक निभा रहे। यह उनके व्यक्तित्व का उदार चरित्र एवं उनकी संवेदनशीलता को व्यक्त करता है।

जीवन के 67 बसंत देख चुके नरेन्द्र सिंह नेगी उत्तरखण्डी लोक साहित्य (गढ़वाली-कुमाऊंनी) को एक गम्भीर शोधकर्ता की दृष्टि से देखते है। उनका स्पष्ट मानना है कि आज इण्टरनेट के दौर में सीडी या वीडियों एल्बम युवा गायकों के लिए रोजगार देने में सक्षम नहीं रहे, इसलिए उनका मानना है कि इस दिशा में सरकार को चाहिए कि लोक साहित्य और संगीत से जुड़े कलाकारों की स्थल रिकार्डिंग, जागरी समाज के बीच जाकर उनके दुर्लभ लोकगीतों एवं लोकगाथाओं का संकलन कर उपेक्षित कलाकारों को आर्थिक सहायता देकर ढोल और ढोली को भी सम्मान देना होगा।

गायक नरेन्द्र सिंह नेगी 20वीं. शताब्दी के उत्तरार्द्ध में एक मात्र ऐसे गायक, कवि, गीतार, लेखक, संगीतकार और फिल्मकार रहे है, जिन्होने अपनी गीत-संगीत की यात्रा से उत्तरखंड की राजनीति, समाज, दर्शन और सांस्कृतिक थाती को पुर्न स्थापित करने का मौलिक कार्य किया है। वहीं दूसरी ओर लोक संस्कृति और जनता के प्रति उनका लगाव और प्रतिबद्धता संदेह से परे है।

देश के चर्चित लोक गायक और संगीतकार भूपेन हजारिका ने जिस तरह उत्तर पूर्वी राज्यों की जीवनदायिनी नदी ब्रहमापुत्र पर गीत रचना कर पूर्वाेत्तर राज्य की सामाजिक चेतना को राष्ट्रीय जीवन की मुख्य धारा से जोड़ने का कार्य किया है, उसी के अनुरूप लैटिन अमेरिकी देश कोलम्बिया के अश्वेत गायक और संगीतकार पाल राॅबिनसन ने अपने चर्चित गीत ओल मैन रिवर के माध्यम से अश्वेत लोगों की तकलीफों और संघर्षो को आवाज दी। ठीक यही कार्य गायक नरेन्द्र सिंह नेगी ने जन-जन को जीवन एवं मोक्षदायनी गंगा और हिमालय की सुरक्षा की गुहार गीतों के माध्यम से पलायन एवं विशाल बाँध परियोजना से विस्थापित हुए लोगों के दर्द को भी अपनी आवाज़ दी है।

एक संवेदनशील गीतकार के नाते उन्होने पहाड़ के भूगोल और संस्कृति के बदलने पर जन भावनाओं को अपनी वाणी देकर उनका प्रतिकार भी किया है। सार रूप में कहा जा सकता है कि नरेन्द्र सिंह नेगी का गीत-संगीत देश के लोकधर्मी कलाकार गायक भूपेन हजारिका और कोलम्बिया के विख्यात गीतकार पाल राॅबिन्सन की तरह अपने समाज में जन-जन की आवाज़ बनने में भी सफल हुआ है। यहाॅ एक बात तीनों कलाकारों के कार्यों के मूल्यांकन के बाद उभरती है कि भूपेन और पाॅल राॅबिनसन ने राजनीतिक क्षेत्र में प्रवेश कर जन आंदोलन की धार को कमजोर किया, वहीं नरेन्द्र सिंह नेगी ने राजनैतिक दलों से एक निश्चित दूरी बनाते हुए जनपक्ष के साथ खड़े होकर जो कुछ लिखा और गाया उसके चलते वे हमेशा विवदों से दूर रहने में सफल हुए है। उत्तराखण्ड के युवा गायकों और संगीतकारों को उनका एक ही सन्देश रहा कि शोध और अध्ययन करने के उपरांत ही वे इसे पेशे के रूप में अपनांए। ऐसा करके ही यदि लोकगीतों और संस्कृति का संरक्षण करने के साथ इसे रोजगार से भी जोड़ सके तो यह उनकी उपलब्धि होगी।

उत्तराखण्ड में भूपेन हजारिका की तरह लोक संगीत को राष्ट्रीय फलक तक पहुचाने वाले नरेन्द्र सिंह नेगी को प्यार-स्नेह से उनके साथी ”नरू भाई’’ कहकर बुलाते हैं। यह कालजयी कलाकार अपनी प्रयोगवादी रचनाधर्मिता के चलते पहाड़ के जन जीवन में लोक संगीत की एक किवदन्ति बन चुके है। हमारे लिए नरेन्द्र सिंह नेगी एक चलते फिरते लोक संग्रहालय से कम नहीं है। जर्मनी के प्रख्यात कवि बे्रख्त के सिद्धांत को मानते हुए नरेन्द्र सिंह नेगी ने न केवल करूणा और श्रृंगार के गीत लिखे वरन समय और समाज की आवश्कतानुसार अन्याय, शोषण और भ्रष्टाचार के विरूद्ध जनता की मूकवाणी को भी अपनी आवाज दी।

लोक गायक नरेन्द्र सिंह नेगी ने ’नौछमी नारेण’ और ’अब कथगा खैल्यो’ वीडियों एल्बमों के माध्यम से सरकार की जन विरोधी नीतियों और भ्रष्टाचार पर जिस तरह से निशाना साधा, उसे हमारी सड़ी-गली राजनीति पचा नहीं सकी। परिणामतः सरकार के स्तर पर दोनों प्रमुख राजनीतिक दलों ने उनसे दूरी बनाए रखी। किन्तु आज जनता के बीच अपनी कविता और कंठ के माध्यम से घर कर चुके नरेन्द्र सिं नेगी को जनता ने गढ़ गौरव सम्मान (1995 प्रवासी चण्डीगढ़), ओ.एन.जी.सी. द्वारा हिमगिरी गौरव सम्मान (1995), उत्तराखण्ड लोक मंच मसूरी (1997), आकाशवाणी लखनऊ सम्मान (1998), मोहन उप्रेती सम्मान (2002 अल्मोड़ा) सहित देश के प्रमुख नगरों में नागरिक अभिनन्दन सहित विदेश में ओमान, दुबई, अमेरिका, कनाडा और मैलबोर्न (आस्ट्रेलिया) में प्रवासी उत्तरखण्डियों द्वारा सम्मानित कर जिस तरह इस लोक गायक को बिना वाद्ययंत्रों के भी सामने बिठाकर सुना गया, वह सही अर्थो में सरकारी सम्मान और सार्थकता को व्यक्त करता है। विगत एक वर्ष से अस्वस्थ चल रहे नरेन्द्र सिंह नेगी अपनी सृजन यात्रा को जारी रखे हुए हैं। इसके बाद भी उनके शुभ चिंतक निरन्तर उनके दीर्घ एवं अरोग्यपूर्ण जीवन की कामना करते हैं। ताकि वे लम्बे समय तक युवा पीढ़ी और संस्कृति कर्मियों को उनके रचना धर्म के प्रति संवेदित कर सकें। इस कालजयी व्यक्तित्व के द्वारा सामाजिक, सांस्कृतिक संचेतना के प्रयासो के प्रति पर्वतीय समाज आशा भरी दृष्टि से उन्हें अपना साधुवाद एवं शुभकामनाएँ देता है, वे शतायु हों ऐसी कामना उत्तराखण्डी समाज करता है।
(डाॅ॰ योगेश धस्माना)
मो॰नं॰- 7464906945

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