ऐसे नेक कार्यों के लिए अन्य समर्थवान भी आगे आएं


nainitalsamachar
April 22, 2019

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बच्चा इंतजार नहीं कर सकता। खुशियों के क्षणों से तुरंत आनंद लेना उसके स्वभाव में होता है। उसे जो भी चाहिए अभी चाहिए। बच्चे को मनचाही या जरूरत की चीजों के लिए इंतजार करने पड़े उसके लिए बेहद कष्टदाई होता है। बिडम्बना यह है कि हमारी आज की सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था में कई बच्चे मनचाही चीजों से ही नहीं जरूरत की चीजों से भी वंचित होते हैं। ऐसे बच्चों के लिए कुछ लोग देवदूत बनकर सामने आ जायं तो जीवन का माहौल खुशनुमा बनने में कितनी देर लगती है।

नेकदिल इंसानों की मदद से मिली नई स्कूली किताबों के हाथ में आते ही बच्चे उनको पढ़ने में जुट गए। किताबों से फुरसत मिली तो नये जूतों को पहन कर दौड़ते हुये हाल का चक्कर लगाना शुरू कर दिया। कुछ तो अपनी नई स्कूली ड्रैस को अभी पहनने की फ़िराक में थे। पर ये तो घर पहुंचने पर ही संभव हो पायेगा। नई फुटबाल मिली कि मैच भी शुरू हो गया और फुटबाल पहाड़ी से गिर कर खो भी गई पर अपनी नई चीजों को खोना किसको पंसद होगा। बच्चों ने कड़ी खोज-बीन से खोई फुटबाल लाकर ही दम लिया। कई दिनों के अनचाहे इंतजार के बाद अपनी मनचाही चीजों को मिलने का उनका उत्साह देखने लायक था। ये बच्चे अपने अनजाने अभिभावकों को बस देखभर ही रहे थे। बोल तो उनकी चेहरे की खुशी रही थी। तब बच्चों के चेहरों पर आयी यह चमक दुनिया की सुन्दरतम तस्वीरों जैसे थी।

बात यह है कि दिल्ली के विक्रम अग्रवाल, मंयक जैन और गणेश तिवारी श्रीनगर (गढ़वाल) के आस-पास के विभिन्न स्कूलों में पढ़ने वाले अपने 18 बच्चों के बीच ‘खुशियों की सौगात’ के साथ 18 से 20 अप्रैल तक रहे। इन 18 बच्चों के जीवनभर की संपूर्ण शिक्षा के दायित्व को निभा रहे इन महानुभावों के चेहरों पर भी आत्म संतुष्टि का मनोहारी भाव स्वयं ही दिखाई दे रहा था। उन्हें खुशी थी कि विगत अक्टूबर से अब तक की शैक्षिक प्रगति मेें हर बच्चे ने बेहतर उपलब्धियां हासिल की हैं। अपने मन के सपनों को इन बच्चों के सार्मथ्यवान और सुनहरे भविष्य में पूरा होते देखने के रोमांचक आनंद से वे भी अभीभूत थे।

दिल्ली के इन मित्रों के नेक प्रयासों को बताने के लिए मैं अब आपको थोड़ा पीछे लिये चलता हूं। श्रीनगर (गढ़वाल) के नजदीकी स्कूलों में अध्ययनरत चन्द्रा, गरिमा, अतुल, कमलेश, रजनी, विपिन, स्नेहा, रितिक, षिवानी, दिव्यांशु, अर्जुन, रविकांत, नैनशिखा, दीपक, रेनू और सिद्वी ये वो बच्चे हैं जो विकट पारिवारिक परस्थितियों में भी अपनी पढ़ाई जारी रखे हुए हैं। श्रीकोट, श्रीनगर (गढ़वाल) में शिशु मंदिर, विद्या मंदिर और औंकारानन्द स्कूल में घनघोर आर्थिक अभावों से जूझते हुए प्राइमरी से इंटर तक की अपनी-अपनी कक्षाओं के ये मेघावी बच्चे माने जाते हैं। इनके परिवारों में हुए हादसों का स्वरूप अलग-अलग भले ही क्यों न हो परन्तु उससे इनके जीवन में बेवजह आयी गरीबी से इनकी रोज मुठभेड़ होती है। किसी पर मां-पिता का साया नहीं है तो किसी के परिवार में मां ही मेहनत-मजदूरी करके खाने भर का ही जुगाड़ कर पाती है। कोई पारिवारिक कलह से उपजी गरीबी से त्रस्त है तो किसी के परिवार में न्यूनतम नियमित आय का जरिया़ नहीं है। और भी ढ़ेर सारी समस्याओं से जूझते हुए, काबिले-तारीफ है कि ये बच्चे फिर भी किसी तरह अपनी पढ़ाई जारी रखते हुए प्रतिभा सम्पन्न और होनहार विद्यार्थियों में शामिल हैं।

वास्तव में बच्चे गरीब नहीं होते हैं, गरीब होते हैं सयाने लोग। और कई सयाने तो विचारों और कार्यों से भी गरीब होते हैं। दुःखद पक्ष यह है कि इस प्रवृति का बेवजह सबसे ज्यादा खामियाजा़ परिवार के बच्चे भुगतते हैं। कहा जाता है कि जीवन में समस्यायें हैं तो समाधान भी मौजूद हैं। और यही हुआ जब दिल्ली-गुड़गांव के 6 संवेदनशील युवा उक्त बच्चों के जीवन में रोशनी बनकर आये हैं। आज की तारीक में ये युवा उक्त 18 बच्चों की संपूर्ण शिक्षा व्यय के दायित्वों को बतौर अभिभावक निभा रहे हैं।

बात यहां से शुरू हुई कि दिल्ली में विभिन्न रोजगार से जुड़े मित्र यथा- विक्रम अग्रवाल, विशाल चर्तुवेदी, मनीष भतीजा, पुलकित जैन, करुणा गुप्ता और मंयक जैन ने उत्तराखंड में गरीब परिवारों के बच्चों की शिक्षा में मदद करने का विचार बनाया। साथ काम करने वाले गणेश तिवारी जो छिनका, चमोली जनपद रहने वाले हैं से इस बावत उनकी बात हुई। गणेश तिवारी ने कर्णप्रयाग निवासी अपने मित्र देवी दत्त जोशी से बात की। जोशी जी श्रीकोट, श्रीनगर निवासी विभोर बहुगुणा के सामाजिक सेवा के कार्यों से सुपरिचित और प्रभावित थे। उन्होने इस कार्य के संयोजन की जिम्मेदारी लेने के लिए विभोर बहुगुणा से बातचीत की। विभोर बहुगुणा को लगा कि उनके सामाजिक कार्यों को एक आयाम मिल रहा है। विक्रम अग्रवाल, पुलकित जैन और मंयक जैन का इस योजना के व्यवहारिक पक्षों को जानने-समझने के लिए दो बार श्रीकोट आना हुआ। कई दौर की बातचीत के बाद यह तय हुआ कि विभोर बहुगुणा के स्थानीय समन्वयन से श्रीकोट, श्रीनगर के शिशु मंदिर, विद्या मंदिर और औंकारानन्द स्कूलों में अध्ययनरत कुछ गरीब परिवारों के बच्चों की 12वीं कक्षा तक के समस्त शैक्षिक व्ययों की मदद के साथ यह कार्य प्रारम्भ किया जाय। यह सुखद संयोग है कि पिछले शैक्षिक सत्र से इस नेक काम की शुरूवात हो गई है।

वर्तमान में ये 6 मित्र शिशु मंदिर, विद्यामंदिर और औंकारानन्द स्कूल, श्रीकोट में पढ़ने वाले 18 बच्चों के समस्त शैक्षिक व्ययों की पूर्ति के लिए सीधे स्कूल के बैंक खाते में निर्धारित धनराशि प्रत्येक माह भेजते हैं। साथ ही विभोर बहुगुणा जी के माध्यम से उक्त बच्चों की शैक्षिक प्रगति से अवगत होते रहते हैं। विभोर बहुगुणा नियमित रूप में इन बच्चों के शैक्षकों और परिजनों से संपर्क में रहकर बच्चों की पढ़ाई और आवश्यकताओं की जानकारी प्राप्त करते रहते हैं। विक्रम अग्रवाल कहते हैं कि ‘हम सभी मित्रों के मन में हमेशा रहता है कि समाज में सुविधाओं से वंचित बच्चों की शिक्षा-दीक्षा के लिए कुछ योगदान करें। यह हमारे लिए एक शुरूवात है जिसे हम आगे बढ़ाना चाहते हैं। हम निकट भविष्य में उत्तराखंड के 100 बच्चों की 12वीं तक शिक्षा के संपूर्ण व्यय का निर्वहन करने की योजना पर कार्य कर रहे हैं। सब कुछ ठीक रहा तो अगले शैक्षिक सत्र में हम यह लक्ष्य भी प्राप्त कर लेंगे।

अपने 18 से 20 अप्रैल तक के प्रवास के दौरान बच्चों, उनके अभिभावकों, अध्यापको और स्कूल प्रबंधन से विक्रम अग्रवाल, गणेश तिवारी और मंयक जैन की कई दौर की बातचीत हुई। इन बच्चों की साल भर सभी शैक्षिक जरूरतों की व्यवस्था करने के बाद वे यह देखकर बहुत खुश थे सभी बच्चे अपने भविष्य के प्रति सचेत हैं। उन्होने बच्चों और उनके अभिभावकों को पूरा भरोसा दिलाया कि डाक्टर, इंजीनियर और सेनाधिकारी बनने इन बच्चों के सपनों को हम जरूर पूरा करेंगे। विभोर बहुगुणा ने और भी कई जरूरतमंद बच्चों से उन्हें अवगत कराया, जिन्हें अगले चरण में इस नेक कार्य में शामिल किया जाना है।

मुझे विश्वास है कि विक्रम, मनीष, पुलकित, मंयक, विषाल, करुणा और विभोर की यह शुभ पहल आने वाले समय में अनेकों बच्चों के जीवन में खुशहाली लायेगी। ऐसे नेक कामों की ओर अन्य समर्थ लोग भी प्रेरित हों यह शुभकामना और उम्मीद तो की ही जानी चाहिए।

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