अथ ‘न्यू’ महाभारत कथा


पृथ्वी 'लक्ष्मी' राज सिंह
April 18, 2019

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भकतों आज हम महाभारत काल में संचार प्रणाली के विकास को प्रकाशवान करेंगे। हालांकि समय के संदर्भ में रामायण काल पहले था या पीछे विवाद का विषय हो सकता है, निसंदेह संचार के मामले में महाभारत काल उससे बहुत आगे होगा। आज जैसे हाल हमारे हैं उन्हें देख कर तो कोई नानसंघी भी ताल ठोकते कह सकता है कि महाभारत का काल जरुर रामायण से पहले का होगा। हो रहा है कुछ आगे! कुछ भी नहीं! जितना था सब पीछे रह गया है।

कुछ तकनीकी विकास पहले हो चुका था मसलन नारद जी पत्रकारिता का नारायण नारायण शुरु कर चुके थे। अपने वर्तमान में हम कह सकते हैं नमो नमो करते सुधीर जी जैसे लोग उसी तरह की पत्रकारिता का अंश मात्र हैं। जहाजों, पैराग्लाइडिंग का अविष्कार हो चुका था। रामायण काल में तो यह बहुत आम बात हो गई थी बन्दरों के उडने का तक जिक्र आने लगता है।

आम मानव के लिए यह तकनीकें महाभारत काल तक सुलभ हो चुकी थी। पहला रेडियो कंस के पास था जिसमें कृष्ण जन्म से पहले अचानक कुछ मेगाहर्ट्ज में एक आकाशवाणी होती है। यह पहली उदघोषिका एक महिला थी।

डिस्टेंस डिजिटलाज्ड एजुकेशन में एक दलित के तीरंदाज बनने का उदाहरण हमें इसी काल में मिलता है। तब शायद यह शिक्षा मुफ्त थी और इसका चार्ज लेने के कारण गुरु द्रोणाचार्य की बहुत किरकिरी भी हुई थी। आप इसे शिक्षा का आरक्षण भी कह सकते हैं, पर इस शिक्षा का व्यवसायिक उपयोग अमान्य है। तीरंदाज केवल अर्जुन जैसा जनरल बंदा ही हो सकता है।

फिर हम इन्टरनेट बैंकिंग व आनलाइन शापिंग का शानदार नमूना भी महाभारत काल में ही देखते हैं। दुशासन द्रोपदी को घसीटते हुए ले जा रहा है, वह कार्ड स्वाइप कर रही है, फिर क्या! दुशासन थक गया पर साडी की आनलाइन सप्लाई जारी है। गौरतलब है कि यह भी महिला है।

थोड़ा भटकते हुए प्रसंगवश जोड़ते हुए कि धृतराष्ट्र अपने बेटों को द्रोपदी कांड के बाद डांट रहे हैं कि;
“हैं! बे दुरिया! दुश्शिया ने इतना किया, ठीक है पर बेकार में तुझे जंघा ठोकने की क्या पडी थी? हैं!”
“सौ हम,पांच चचा के, कुनबे के भीष्म इतने , ऊपर से ये दरबारी! दिख रही है तिलभर भी जगह कहीं! कहां बैठने को बोलूँ फिर बताओ!”; दुर्योधन ने सफाई दी। भीष्म ने तक मौन में खोपड़ी झुका ली।

यहाँ भी तकनीक है देखो पूरा शासन डिजिटलाज्ड, आनलाइन है। सब अपने आप हो रहा है। राजदरबार में टाइम ही टाइम है, जुआ चल रहा है, बहन बेटियों पर दांव लग रहा है।

हां तो टीवी पत्रकारिता का पहला ळाइव विवरण भी इसी दौर में संजय करते हैं, वही पत्रकार हैं व कैमरामैन भी, आंख के अंधे धृतराष्ट्र को जैसा आजकल भी है वैसा सुना रहे हैं। इसी दौर में प्रिन्ट मिडिया भी अपने पूरे यौवन में है, व्यास जीे केवल बोल भर रहे हैं और गणेश जी की डिवाइस उसे प्रिन्ट रूप में बदल दे रही है।

इसी दौर में आप अंत तक आते आते महाराज युधिष्ठिर को कुत्ते के साथ सैल्फि लेकर पुष्पक विमान में राइड करते पाते हैं। यह सोशल मीडिया के प्रारंभ का दौर है।
अभी अभी खुसरौ साब का किया अपडेट देख रहा हूँ। फारसी के साथ बृज भाषा में लिखते हुए वह कहते हैं
“कि दाद मारा, गरीब खुसरौ”
स्पष्ट है कि वह लाइक न मिलने के कारण स्वयं को व्यथित महसूस कर रहे हैं। यह बारहवीं शताब्दी तक भारतीय भाषाओं में सोशल मीडिया के प्रभाव को दिखाता है। जो बाद के वर्षों में अचानक गायब हो जाता है।

हालांकि नेटवर्क प्रोब्लम के भी उदाहरण इस दौर में मिलते हैं, बेचारा अभिमन्यु इसी कारण चक्रव्यूह में मारा जाता है। या कयास लगाया जा सकता है कि जरुर जयद्रथ ने वहां जैमर का प्रयोग किया हो।

क्योंकि अभी हम तकनीक को उतना विस्तार नहीं दे पायें हैं अतः महाभारत काल के कुछ प्रश्न अनुत्तरित भी हैं। मसलन कुन्ती का माद्री के साथ पांच पांडवों को बना लेना। यह वह पहलू हैं जो सच हैं पर भाषाई रूप में इनके लिए कोई तकनीकी शब्द नहीं हैं।

उम्मीद है जल्द ही त्रिपुरा की तरह कोई भाजपाई/संघी मुख्यमंत्री/ दिग्गज मुंह खोले और हमारे ज्ञानचक्षु फिर कल्पनाशीलता में उडन छू हो लें। तब तक के लिए स्टे कनेक्टेड!

पृथ्वी 'लक्ष्मी' राज सिंह