रुद्रप्रयाग सड़क हादसे के बहाने हसन खान की याद..!


nainitalsamachar
December 29, 2018

मेरे साथ जमीला खाला (पत्नी हसन खान) मंजूर भाई के छोटे बेटे की शादी के समय पिछली फरवरी में नैनीताल धर्मशाला

इस्लाम हुसैन

रुद्रप्रयाग में निर्माणाधीन आलवेदर रोड में सात कश्मीरी मुसलमान मजदूर दब कर मर गए, पिछली जुलाई में उत्तरकाशी और फिर आगे गंगोत्री जाते हुए सड़क की चट्टानों को देखते हुए मुझे बार बार सड़क निर्माण में लगे मजदूरों की याद आ गई थी, रोड बनाने में कई जगह हादसे हुए खेत बगीचे बर्बाद हुए परम्परागत और पुराने रास्ते तबाह हुए। हालांकि अब खड़ी चट्टानों को तोड़ने का काम भारी मशीनें कर रही हैं लेकिन इसमें भी इंसानी कौशल का बड़ा हाथ है और तीन चार दशक पहले बिना डायनामाइट लगाकर भी सड़कों के लिए चट्टानें तोड़ने का काम अधिकतर मजदूरों ने किया। रुद्रप्रयाग हादसे में जान गंवाने वाले वाले मजदूर कश्मीर के जिस इलाके करगिल से थे वहां से उत्तराखंड का सम्बंध बहुत पुराना है। पहाड़ में अंग्रेजों के आगमन के बाद आजादी तक यहां बनने वाली अधिकांश सड़कें और बड़े निर्माणों में कश्मीरी, पेशावरी पठानों, खानों का बड़ा योगदान रहा है।

पिछले कुछ सालों से नव देशभक्तों द्वारा जो फर्जी देशभक्ति की परिभाषाएं गढ़ी हैं उसने पहाड़ में यह बात बिसरा दी है कि इस देवभूमि को सजाने संवारने कि काम मुसलमानों ने बखूबी किया है और जिस हिमालय को वे हिन्दू धर्म के देवताओं की स्थली बताकर शुद्दिकरण की चाह रखते हैं, वह हिमालय पूर्वोत्तर से लेकर पश्चिमोत्तर तक अनेक विश्वासों, धर्मों और संस्कृतियों को पालता पोसता और संरक्षित करता है। भारत पाकिस्तान के युद्ध में भारत ने जिस हिमालयी दर्रे की चोटी पर शौर्य दिखाया था उसे हाजीपीर की चोटी कहा जाता है। उसी क्षेत्र में कश्मीर के दोनो हिस्सों को जोड़ने वाले दर्रे की दूसरी बड़ी चोटी को पीर की गली कहते हैं। हिमालय की नंदा चोटी की स्तुति करने वालों को यह भी जानना चाहिए कि बगल की पश्चिमी हिमालय की रेंज को पीर पंजाल कहा जाता है।

जैसे ही मुझे पता चला कि रुद्रप्रयाग आलवेदर रोड निर्माण के हादसे में करगिल कश्मीर के सात मजदूर चट्टानों के नीचे दब कर मर गए, मुझे 1970 के आसपास की घटना याद आ गई, जब करगिल से आए जमीला खाला (मौसी) के शौहर यानी हसन खालू पिथौरागढ़ में रोड काटते हुए एक हादसे में मारे गए थे, जो करगिल कश्मीर से नैनीताल आकर रोड बनाने वाले खानो के साथ काम करते थे, और जिनके परिवार नैनीताल और बीरभट्टी के बीच किसनापुर, मोटापानी धेवता के इलाकों में अभी भी रहते हैं।

यह खान लोग पश्चिमोत्तर सीमान्त जिसे अविभाजित भारत में आमतौर पर फ्रन्टीयर कहा जाता था के माने जाते थे, जिसमें उत्तरी कश्मीर करगिल और लेह के कश्मीरी भी सम्मलित थे। जिनके वंशज अब नैनीताल अल्मोड़ा पिथौरागढ़, बागेश्वर से लेकर रामनगर, कोटद्वार, डाकपत्थर चकराता पांवटा तक बिखरे पड़े हैं। इन्होंने कुमाऊं की कई प्रमुख सड़कों के लिए अपना खून पसीना बहाया था। पिथौरागढ़ की मुख्य रोड के अलावा खैरना अल्मोड़ा रोड (जिसको बनाने में मेरे परिवार के लोगों ने भी सहयोग दिया) बेतालघाट, पहाड़पानी, देहरादून चकराता और गढ़वाल की कई सड़के खानों पठानों की हिम्मत की कहानियां कहती है। जिनको बनाने में हसन खान जैसे न जाने कितने खप गए।

हसन खान सड़क बनाते हुए हादसे में मारे गए और अपने बच्चों को अल्लाह के सहारे छोड़ गए, उस दौर में ऐसे कितने हादसे में न जाने कितने लोग मारे गए, तब कोई मुआवजा सहायता कहीं से नहीं मिलती थी। सब कुछ अल्लाह के भरोसे छोड़ दिया जाता था।
जमीला खाला भी आधी उम्र में बेवा हो गईं थी। खाला नैनीताल और बीरभट्टी के बीच किश्नापुर में रहती थी बाद में खाला ने अपने बच्चों को जैसे तैसे करके पाला आज उनके बेटे बेटियों, दमादों का परिवार भीमताल से ले पिथौरागढ़ तक फैला हुआ है। जमीला खाला मेरे बचपन के साथी, और भाई मंजूर हसन की खाला थीं, सो मेरी भी खाला हुईं। यह बताना पाठकों को थोड़ा असहज करेगा कि मुसलमान होते हुए भी धार्मिक दृष्टि सें मंजूर भाई और मुझमें बहुत बड़ा ? अन्तर यह था कि नैनीताल में रहने वाले मंजूर भाई शिया मुस्लिम परिवार से हैं और मैं सुन्नी मुस्लिम परिवार से, ऐसे समय जब मुस्लिम समाज में भी धार्मिक विश्वास और मत विभिन्नता के कई झंडे लहरा रहे हों, तो यह बताना कि एक शिया मुसलमान मेरा भाई है, बहुत बड़ा खतरा मोल लेना है, क्योंकि सुन्नियों में जैसी कट्टरता बढ़ी है उसका भुक्तभोगी मैं स्वयं हूं, पिछले चार पांच सालों में मैं सुन्नियों की कट्टरता के खिलाफ व नरम सूफीवाद की बात करने पर धर्म बहिष्कृत के फतवे, और गुंडो की धमकी सहित करीब एक दर्जन सिविल और क्रिमिनल मुकदमें झेल चुका हूं। जिसमें मुझे हाईकोर्ट तक के चक्कर लगाने पड़े थे।
लेकिन मंजूर भाई और मेरे रिश्ते में सीधा सादा इंसानी और कुदरती जोड़ यह है कि मंजूर भाई की परवरिश मेरी मां के दूध से हुई है। वो मुझसे पांच महीने बड़े हैं लेकिन उनकी मां जिनका मायका बीरभट्टी के पास का था, का दूध सूखने की वजह से उनको मेरी मां ने मेरे साथ अपना दूध पिलाया था, और यह जोड़ हमारे परिवारों को अभी तक मिलाए हुए है।

मंजूर भाई के नाना जव्वाद हसन किसी जमाने में अमरोहा से आकर पीडब्ल्यूडी में रोड रोलर के मिस्त्री हो गए थे, और गेठिया में रोड रोलरों के वर्कशॉप में काम करते थे, बाद में वो रोड रोलर के ड्राइवर बन गए उनके कई शागिर्दो ने पिथौरागढ़ से लेकर चमोली की दूरदराज की सड़को को कूट काटकर सपाट बनाया, उनके दो शागिर्दों के परिवार अब भी काठगोदाम में मेरे मुहल्ले मे रहते हैं। उन्होंने पास बीरभट्टी की स्थानीय महिला से शादी कर यहीं घर बसा लिया, जिनकी दो बेटियां हुई थीं।

मंजूर भाई के परिवार के साथ मेरी अम्मा जी के परिवार की पहचान शादी से पहले की थी, मां के पूर्वज अंग्रेजों के आने के साथ ही नैनीताल के सर्विस एरिया की एक बस्ती गांजा गांव मे आकर बसे थे, जिसके पास काठगोदाम-नैनीताल रास्ते के ठीक बीच में ज्योलीकोट स्टेशन पड़ता है। मां का खानदान गांजा से लेकर वीरभट्टी किश्नापुर होता हुआ रानीखेत और न जाने कहां कहां फैल गया। पिताजी के लकड़ दादे अंग्रेजों के आने से बहुत पहले अल्मोड़ा और आसपास आकर बस गए थे।

नैनीताल और पहाड़ के बाकी हिस्सों से कश्मीर का सम्बंध अभी भी चल रहा है, दो साल पहले कश्मीर विधानसभा के करगिल क्षेत्र के एक पूर्व विधायक मंजूर भाई की रिश्तेदारी में आए थे जिनसे मैं मिला भी था, वहां की कई बेटियां उत्तराखंड में हैं। गरुड़ निवासी मेरे चाचा के समधी (बेटी के ससुर) चैबटिया रानीखेत में रहते हैं 60-62 साल पहले किशोरावस्था में कश्मीर से आकर खानों के परम्परागत काम रोड़ा, बजरी, रोड और खुदान जैसे काम में लग कर अपने कश्मीरी परिवार को बिसरा गए, पर नियति के एक खेल.ने उनको अपने खानदान और सगे भाई बंधुओं से मिला दिया। हुआ यूं कि रानीखेत में हर साल शाल बेचने वाले एक कश्मीरी युवक को सुरक्षा एजेंसियों ने संदिग्ध मानकर पकड़ लिया, उसके यह कहने पर कि वह हर साल यहां शाल बेचने आता है। सुरक्षा ऐजेन्सियों ने खान साहब से तस्दीक कराई। इस बात पर उस कश्मीरी युवक छूट गया। इस एहसान के बदले में, बाद में उस युवक ने चचा के समधी को उनके छूटे हुए कश्मीरी परिवार से ढूंढकर मिला दिया। लेकिन ऐसा सभी के साथ नहीं हुआ खासकर पाकिस्तान के सीमाप्रांत और अफगानिस्तान से जो पठान, खान संबंधित थे वो न रिश्तेदारों और अजीजों से मिलने जा सके और न वहां के लोग यहां आ सके। ऐसे न जाने कितने परिवार यहीं के होकर रह गए और बहुत से इसी आशा में मर खप गए।

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