पहाड़ की तरह सख्त इरादे का शमशेर


ए. के. अरुण
January 9, 2019

इस इलाके का
हर शख्स जानता है
कि वह कन्धा
जब तक भी सलामत रहेगा
तब तक उसमें झोला टंगेगा।
-गिरीश तिवाड़ी ‘गिर्दा’ की यह पंक्तियां यों तो उनके खुद का ‘आत्मकथ्य’ है लेकिन शमशेर सिंह बिष्ट पर यह पूरी तरह लागू होती है।

22 सितंबर 2018 को शमशेर सिंह बिष्ट जी के निधन की सूचना मिली। उनके ज्येष्ठ पुत्र जयमित्र का फोन तड़के सुबह आया- ‘‘बब्बा नहीं रहे!’’ हम दिल्ली में उनका इन्तजार कर रहे थे। उन्हें दिल्ली फौरन लाने की सलाह दो दिन पूर्व ही हमने जयमित्र को दी थी। जय ने तैयारी भी कर ली थी। अल्मोड़ा से दिल्ली आने के लिये हल्द्वानी में रुकना अनिवार्य सा बन गया था क्योंकि बिष्ट साहब की तबियत का तकाजा था कि वे लगातार लम्बी यात्रा कर नहीं पाते। दोनों गुर्दे खराब हो जाने के बाद तो यह और भी ज्यादा मुश्किल था। पैरों में सूजन, शरीर का ज्यादा वजन और रक्त की कमी उनके शरीर की क्षमता को दिन प्रति दिन कम करती जा रही है। अल्मोड़ा से उनके पुत्र जयमित्र ने फोन पर जानकारी दी। बातचीत और पूरी स्थिति जानकर लग गया कि उनकी तबियत ज्यादा नाजुक है। खून भी काफी कम था और रक्त में केरेटिनिन की मात्रा बढ़ी हुई थी। लेकिन तब तक देर हो चुकी थी और शमशेर जी सबको अलविदा कह चुके थे।

लगभग 8 वर्ष पहले जब उनकी तबियत बिगड़ी तब राजीव लोचन साह जी ने मुझे फोन पर लगभग आदेश ही दिया था-आप आ सकते हैं तो आ जाइये, बिष्ट साहब की तबियत ज्यादा ही गड़बड़ है। सम्भवतः वह भी दिसम्बर का ही महीना था। मुझे राजीव भाई का फोन सायं 4 बजे मिला और मैंने उसी शाम रात्रि 10.00 बजे वाली बस ले ली थी, नैनीताल के लिये। सुबह अगले दिन नैनीताल पहुंचते ही राजीव जी अपनी गाड़ी के साथ तैयार थे और हम अल्मोड़ा पहुंचे। वहां बिष्ट जी की तबियत वाकई बिगड़ रही थी। तत्काल उपचार के बाद निर्णय लिया गया कि उन्हें दिल्ली लाया जाए। दिल्ली में अखिल भारतीय आर्युविज्ञान संस्थान में नियमित जांच और उपचार के साथ—साथ में अपनी होमियोपैथी भी चलाने लगा। धीरे-धीरे शमशेर भाई सामान्य होने लगे। थोड़ी गतिविधियां भी बढ़ाई लेकिन हिदायतें इतनी कड़ी की जब भी झोला कंधे पर टांगते उन्हें रोक लिया जाता। यह जरूरी भी था। तय किया गया कि शमशेर भाई महज आस-पास ही आ जा सकते हैं और साथी उनके पास जा कर उनका अनुभव लाभ लें। यही सिलसिला चला लगभग 07-08 वर्ष। समय बीतता गया और शमशेर जी भी चलते रहे लेकिन अचानक 19 दिसंबर को जब उनकी सेहत बिगड़ी तो फिर सम्हली नहीं। खून काफी कम हो गया था। रक्त में संक्रमण बढ़ गया था। कमजोरी तो काफी पहले से मानो उनके साथ दोस्ती कर चुकी थी। शमशेर जी ने भी मान लिया था कि यह साथ ही रहेगी। इस बीच नियमित दवा और अनियमित चिकित्सीय जांच के साथ सेहत कभी अच्छी तो कभी खराब होती रही। समय बीतता रहा।

सन् 2015 में मैंने हम लोगों की बनाई संस्था हील का एक शिविर अल्मोड़ा में लगाने का निर्णय लिया। सोचा गया कि पहाड़ को समझने और शमशेर भाई जैसे मित्रों से मिलने का यह अच्छा मौका रहेगा। तीन दिनों के शिविर की योजना बनी। अल्मोड़ा में शिविर संचालन और देश भर से आए लोगों के ठहरने की व्यवस्था राजीव लोचन साह ने अपने होटल सेवाय में की। वहीं रहना और छत पर व्यायाम, सुबह-शाम ट्रेकिंग, दिन में चर्चा, शाम में लोगों की चिकित्सीय जांच आदि के साथ अच्छा आयोजन हुआ। शमशेर जी से मिलकर उत्तराखंड के लिये विशेष कर ‘स्वावलम्बी स्वास्थ्य योजना’ बनाने की मेरी सोच पर वृहद चर्चा हुई। बीच में कभी शेखर पाठक तो कभी विनोद पाण्डेय तो और कई साथी आते-बतियाते और कई महत्वपूर्ण सुझाव दे जाते थे। राजीव भाई के साथ तो तीनों दिन क्या कई बार चर्चा की कि पहाड़ के लोगों को कैसे स्वास्थ्य के मामले में स्वावलम्बी बनाया जाए। प्रक्रिया चल निकली और हम काम में लग गए। शमशेर भाई कभी फोन तो कभी जब दिल्ली आते तो मिलकर अपना सुझाव देते। अपनी बीमारी को सबक मानकर वे चाहते थे कि ऐसे व्यवस्था बने कि पहाड़ के लोग कम से कम उपचार के अभाव में तिल-तिल कर न मरें।

अल्मोड़ा शिविर की योजना तय करते वक्त हील की बैठक में हम लोगों ने यह तय किया था कि शमशेर भाई और नैनीताल समाचार के राजीव भाई का नागरिक सम्मान किया जाए। पहाड़ में संघर्ष और देश में कथित नई आर्थिक नीति के नाम पर प्राकृतिक संसाधनों का दोहन, लोगों में बढ़ती बेरोजगारी, पहाड़ के पर्यावरण का नाश आदि मुद्दों पर व्यापक जन जागरण एवं आंदोलन करने वाले साथियों का नागरिक अभिनंदन हो यह हम सबने तय किया था। शमशेर भाई को इसके लिय तैयार करना आसान नहीं था। और उन्हें काफी कमजोरी महसूस हो रही थी। पहाड़ में ही रहकर पहाड़ के लिये अपनी जीवन समर्पित कर देने वाले शमशेर अपने संकल्प के साथ साथ अपनी दृढ़ता और प्रतिबद्धता के लिये भी जाने जाते हैं। सन् 1016 में जब मैंने हम सब की संस्था हेल्थ एजूकेशन आर्ट लाइफ फाइन्डेशन (हील) की तरफ से अल्मोड़ा में शिविर रखा था तब पहाड़ के अन्य साथियों की मौजूदगी में हम लोगों ने पहाड़ में रहने वाले लोगों के लिये एक जन स्वास्थ्य घोषणाएं बनाने की योजना बनाई थी। शमशेर जी ने इसे पहाड़ और उत्तराखंड के लिये सबसे जरूरी व महत्वपूर्ण बताया था। अकसर फोन पर वे इस सम्बन्ध में चर्चा करते, कुछ सुझाते और कहते थे कि पहाड़ के विभिन्न हिस्सों में रहने वाले लोगों से बात कर उनकी समस्याओं को भी इस जनस्वास्थ्य घोषणा पत्र का हिस्सा बनाइये। उपचार के लिये जब भी वे दिल्ली आते तो विशेष कर मुझे याद करते और बुलाकर ऐसी ही मुद्दों पर चर्चा करते। शमशेर जी की चिन्ता आम लोग और उनकी आम समस्याएं होती।

ऐसा नहीं था कि शमशेर जी से केवल मैं ही प्रभावित था। बल्कि शमशेर सिंह जी को चाहने वाले पूरे देश में फैले थे। दिल्ली, बिहार, उ.प्र., पंजाब, हरियाणा के साथी अक्सर उनकी चर्चा करते और उनकी सेहत का हाल मुझसे पूछते रहते थे। शमशेर जी के साथ सन् 2005-6 में भी गहरा ताल्लुकात था-आजादी बचाओ आंदोलन के कार्यक्रमों के बहाने। अक्सर आंदोलन के मंच पर शमशेर जी राजीव लोचन साह और उत्तराखंड के कई और साथी मिल जाते थे। बातचीत और संघर्ष के उनके अनुभवों को सुनना सुखद होता था। मुझे याद है कि एक बार आजादी बचाओ आंदोलन में के राष्ट्रीय सम्मेलन में हम लोगों ने गुजरात दंगे पर गम्भीर चर्चा की। मैं उस सम्मेलन में गुजरात दंगे में तत्कालीन मोदी सरकार की संल्पितता और सक्रियता के खिलाफ एक प्रस्ताव लाना चाहता था। आंदोलन के दूसरे बांकी इस मुद्दे पर ज्यादा बेल नहीं रहे थे। मैंने शमशेर जी से चर्चा की तो उन्होंने फौरन कहा कि हां यह विषय प्रस्ताव के रूप में अवश्य उठाईये। बेहद जरूरी और संवेदनशील है। मैंने उठाया भी और शमशेर जी ने आंदोलन के सम्मेलन में इस प्रस्ताव के लिये काफी साथियों से बातें की।

शमशेर जी अपने को गुमनाम रख कर पहाड़ की सेवा कर रहे थे। जब मैंने सन् 2013 में ‘हील’ संस्था का पहाड़ में कार्यकलाप और उससे संबंधित योजनाएं बनाई थी तब कुछ साथियों से चर्चा कर यह तय किया था कि शमशेर जी का नागरिक सम्मान किया जाए। सरकारी सम्मान और पुरस्कार से तो उन्हें परहेज था लेकिन साथी राजीव लोचन साह जी से सलाह कर बेहद संकोच में ही तय किया कि उन्हें हील की तरफ ‘‘लाइफ टाइम अचिवमेंट पुरस्कार’’ दिया जाए। साथियों मैं तो उत्साह में था लेकिन खुद शमशेर जी इसके लिए तैयार नहीं थे। फिर हम लोगों ने खुफिया तरीके से अल्मोड़ा में सन् 2015 में हील के एक शिविर में यह पुरस्कार उन्हें प्रदान करने की योजना बनाई। तय किया कि समारोह में नागरिकों की तरफ से यह सम्मान शमशेर जी को दिया जाए। मौके की जरूरत और लोगों के उनके प्रति प्यार को उन्होंने सम्मान दिया और हील और नागरिकों की तरफ से यह सम्मान स्वीकार किया। हम सब के लिये यह गौरव का क्षण था।

शमशेर जी का न होना उत्तराखंड के जन संघर्ष और नवनिर्माण के लिये एक बड़ी क्षति है वे पहाड़ के पहरेदार की तरह थे। मैंने उनको शासन के अत्याचार के खिलाफ एक मजबूत आवाज के साथ अकसर पाया। वे सत्ता और पूंजी की सुनहरी चमक से कोसों दूर थे। उनकी अपनी चमक थी अपनी खनक थी, पहाड़ की तरह दृढ़, कठोर लेकिन अंदर से नरम। उत्तराखंड के नागरिक व पर्यावरण आंदोलन को अपने झोले और कुर्ते में समेटे शमशेर जी हिमालय की उस आभा में विलिन हो गए जहां से उत्तराखंड ही नहीं देश दुनिया के मानवीय आंदोलन को प्रेरणा मिलती रहेगी।

ए. के. अरुण

डॉ. ए. के. अरुण जन स्वास्थ्य वैज्ञानिक एवं राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त होमियोपैथिक चिकित्सक हैं