क्या उत्तराखंड में कोई दूसरा शमशेर पैदा होगा ?


nainitalsamachar
January 2, 2019

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राधा बहन

शमशेर भाई स्वयं में एक आन्दोलन थे। निर्भीक, आत्मबल से परिपूर्ण तथा हमेशा आम जन, या यूँ कहूँ अन्तिम जन के लिए समर्पित वे एक योद्धा थे। धैर्य पूर्ण गहराई व शालीनता से बोलने व चलने वाले। उनके व्यक्तित्व ओर वैचारिक स्पष्टता का ऐसा प्रभाव था कि वे पिछले 4-5 दशकों तक लोगों पर छाये रहे। उनको न्याय व जनहित के लिए प्रेरित करते रहे, उनका नेतृत्व करते रहे और समाज व सरकारों, दोनों को जन सरोकारों व सच्चाई की दिशा दिखाते रहे। उनके शब्दों में जो ताकत थी, वह उनको व्यक्तिव की पारदर्शिता से थी। इससे उनके शब्द सुने जाते थे, सराहे जाते थे और लोगों को इतना प्रभावित करते थे कि उनके कदम उनके साथ चल पड़ते थे।

ऐसे ऊर्जावान व्यक्तित्व का हमारे बीच से उठ जाना, हम समाजकर्मियों की एक बहुत बड़ी हानि है ही, पूरे समाज के लिए भी एक बड़ी रिक्त्तता है। लगता है गलत होते देखते ही किसकी मजबूत वाणी फूट पड़ेगी कि ‘‘गलत नहीं होने देंगे‘‘ ? अन्याय की भनक पड़ते ही किसकी निर्भीक कलम चल पड़ेगी ताकि कोई अन्याय को छिपा न पाये ? कहीं प्राकृतिक आपदा आ गई तो कौन करुणाद्र्र होकर रात हो तो रात में, दिन हो तो दिन में चल पड़ेगा पीड़ितों को राहत देने ? दूसरा इनके लिए शमशेर कहाँ से आयेगा ?

जितना मुझे मालूम है, शमशेर भाई के सार्वजनिक जीवन का प्रादुर्भाव वामपंथी विचारधारा के साथ हुआ था। छात्र-यूनियन और सारे कालेज जीवन के उस काल में वामपंथी विचारधारा उनके तेज-तर्रार व्यक्त्वि के अनुकूल रहती होगी। छात्रों पर उस विचारधारा का उस समय में अच्छा प्रभाव था। युवा क्रान्तिकारी होते हैं। उन्हें तुरन्त बदलाव चाहिए। उस प्रकार त्वरा व वैसे सोच को मानते हुए भी शमशेर भाई ने अपनी मौलिकता नहीं छोड़ी थी। अपनी स्वतंत्र विचारशीलता को किसी विचारधारा के अन्दर गिरवी नहीं रख दिया था। उत्तराखंड के पर्यावरण सम्बन्धी आन्दोलनों में सक्रियता से काम करते समय कई बार कई मुद्दों पर उनसे बात-विमर्श, सलाह-मशवरा होता था। वे भी कोई संघर्ष प्रारम्भ में करने के पूर्व मुझसे सलाह लेते थे। वे मेरे अहिंसक सत्याग्रह की कार्यनीति को हमेशा पुष्ट करते थे। उसमें अपना सहयोग देने को तत्पर रहते थे।

अपनी घाटी में बहती कोसी की जलधारा के दस वर्षो में सूख जाने की वैज्ञानिक घोषणा से जब हम चिन्तित हुए तो हमने कोसी को बचाने का रचनात्मक अभियान चलाया। घाटी के गाँवों की महिलाओं ने बाँज की पत्तियाँ काटना बन्द कर दिया। कोसी माँ को बचाने के लिए उन्होंने उसका जल हाथ में लेकर संकल्प लिया। यह अभियान गाँव-गाँव, एक घाटी से दूसरी घाटी महिला पदयात्राओं के माध्यम से फैलता गया। तब शमशेर भाई ने इस अभियान की बहुत प्रशंसा की और इस कार्य में लगी हमारी कार्यकत्र्ता बहनों की हौसलाअफजाई भी की। अपने कुछ वर्षो के इस अभियान के बाद हमने पूरे उत्तराखंड के लिए ‘उत्तराखंड नदी बचाओ’ पदयात्राओं का आह्वान किया। हमारी ‘कोसी बचाओ पदयात्रा’ कौसानी से रामनगर के लिए निकली। शमशेर भाई कुछ अस्वस्थ चल रहे थे। तो भी उन्होंने कोसी बाजार से सुयालबाड़ी तक पदयात्रा का पूरा प्रबन्ध भी किया और उत्साहपूर्वक अपने मित्रों की टोली के साथ पदयात्रा में भी चले। नदी बचाओ के निमित्त पहाड़ के पानी को बचाने की जो अत्यन्त अनिवार्य मुहिम हमने छेड़ी थी, उसका मर्म शमशेर भाई की समझ में पूरी तरह आया था।

उन्होंने कोसी बाजार से अल्मोड़ा के बीच के किसी गाँव की एक छोटी सभा में कहा था, ‘‘कोसी नदी के निमित्त से यह पहाड़वासी एक-एक बूँद पानी को तरसंेगे। इसलिए अपनी नदी बचाओ। अपने नौले, धारे-गधेरों का पानी बचाओ, ताकि पानी व मिलने से हमें अपनी जन्मभूमि छोड़नी न पड़ जाये।’’ हम अभी भी नौलों-धारों को बचाने में अपनी शक्ति भर बीच सक्रिय होते हैं तो शमशेर भाई वे शब्द ‘अपने नौलो धारों व गधेरों को बचाओ’ हमें याद आ जाते हैं।

एक समाज के लिए काम करने वाले कार्यकत्र्ता को लोगों को सुनता भी होता है और लोगों से बोलना भी होता है। अतः उसे हर मुद्दे की स्पष्ट समझ होनी चाहिए। शमशेर भाई को अध्ययन व चिन्तन की अच्छी आदत थी। अतः वे अद्यतन जानकारियों से परिपूर्ण होते थे, जिससे उनकी बातें उनके जनता को किये गये सम्बोधन भावपूर्ण ही नहीं तर्कपूर्ण भी होते थे, जो लोगों की समझ में भी आते व उनको प्रभावित भी करते थे। इसीलिए वे आजीवन जनता का नेतृत्व करते रहे। कहीं कोई अन्याय या अत्याचार हो, उन्हें दिखता था। बहुत से लोगों को उनके सामने ही हो रहा अन्याय या अनाचार चुभता नहीं, परन्तु शमशेर भाई को दिखती व चुभती थीं और वे उस चुभन को चुपचाप दबाकर नहीं रखते थे। वे कलम उठाते व उस पर लिख देते, साथियों का आह्वान करते और एक संधर्ष खड़ा करते थे।

मैं बीच-बीच में जाकर उन मुद्दों पर उनकी समझ का लाभ लेती थी, जो अन्याय जनता पर या प्रकृति-पर्यावरण पर हो था और यह मुझे बेचैन कर देता था। चार धाम आॅल वैदर रोड के अन्तर्गत धरती को थामने वाले बहुमूल्य, हजारों स्वस्थ वृक्षों का निर्मम कटान और सड़क निर्माण की अवैज्ञानिक पद्धति के द्वारा मलबे को नदियों तथा जंगलों के ढलानों और गांवों के खेतों तथा जलस्रोतों के ऊपर बेतरतीब फेंक देने के विध्वंसकारी कार्य को विकास व भक्ति का नाम देने की इस विसंगति से मैं विचलित थी।मंैने शमशेर भाई को फोन पर यह सब कहा। इस विनाश के विरोध में जो मैं कर रही थी वह भी बताया। शमशेर भाई अस्वस्थ थे। कहीं जाना-आना उनके लिए कठिन हो गया था। परन्तु फोन पर उनकी जो आवाज आ रही थी, वह पूरी तरह स्वस्थ व सतेज थी। उस वाणी के पीछे जो मस्तिष्क था, उसमें युवा शमशेर का उद्दाम मानस अनुभव और बुद्धिमत्ता हो लबरेज लग रहा था। सरकारें यही करती आई हंै और यही करेंगी। ये जंगलो और नदियों को वीरान कर देंगी। प्रकृति व खनिज सम्पदा को लूट लेंगी अपने जनहित को हानि पहुँचाने वाले मुद्दों को उठाया है। हम लोगों ने इस बात के लिए संघर्ष किया है। इस उम्र में अभी भी कर ही रहे हैं। उत्तराखंड को उजड़ने से कैसे बचाया जाये, यह एक बड़ा सवाल बन गया है। क्या करें ? मुझे लगा कि ये सब बातें कर के वे थक गये हैं। फिर भी बोले, मैं तो अस्वस्थ हूँ। पर इस मुद्दे पर लोग लड़ ही रहे हंै।

मैं भी अब उम्र के लिहाज से नये सिरे से कोई संघर्ष उठाने की शक्ति नहीं रखती। पर यही मेरी उनसे मेरी आखरी बात थी। मैं गांधी विचार, अहिंसा, स्वराज्य और शान्ति के संदेश मिशन पर मैक्सिको और इटली की यात्रा पर गई और इधर शमशेर भाई उत्तराखंड, उसके मुद्दों और उन पर अपने चिन्तन व विन्ता को अपने साथियो के कन्धों पर डाल कर अनन्त की यात्रा पर चले गये।

क्या उत्तराखंड में कोई अगला शमशेर पैदा होगा ?

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