‘शिलातार्थ‘ से झांकता उत्तराखंड


दिवा भट्ट
March 6, 2018

सन् 1959 के मई जून में की गई इस यात्रा के वृत्तान्त में वर्णित तीर्थस्थलों के पैदल यात्रापथ के विस्तृत विवरण के साथ-साथ यहाँ का भौगोलिक ऐतिहासिक परिचय भी दिया गया है। कभी उपनिषदों पुराणों की सूक्तियों को तो कभी स्थान विशेष से जुड़ी कि किवदन्तियों को भी सम्मिलित किया गया है। ……यात्रा पथ पर उपलब्ध होते भोज्य पदार्थो के भी रोचक विवरण दिये गये हैं।

हिमालय की यात्रा करने वाले हजारों वर्षो से हिमालय का वर्णन करते आ रहे हैं। उस पर अब तक किन-किन भाषाओं में कितना लिखा गया हैं, इसका हिसाब लगाना मुश्किल है। संस्कृत, हिन्दी और अंग्रेजी के अतिरिक्त  भारत की प्रान्तीय भाषाओं में भी हिमालय पर विपुल मात्रा में लिखा गया है। यह साहित्य, हिमालय, प्रकृति, धर्म दर्शन इत्यादि विषयक जानकारियाँ देने के साथ ही साथ यात्रा का मार्ग दर्शन करता हुआ यात्रियों को इसके लिए प्रेरित भी करता है। इसी क्रम में इस वर्ष 2017 में शिला तीर्थ नामक ग्रंथ का हिन्दी अनुवाद भी आया है। चित्तरंजन दास द्वारा सन् 1959 में की गई हिमालय यात्रा के दौरान लिखी गई डायरी के आधार पर तैयार की गई उड़िया पुस्तक के तृतीय संस्करण का यह हिन्दी अनुवाद डाॅ. अर्चना मोदी ने किया है। उड़िया भाषी पाठकों के बीच यह ग्रंथ काफी लोकप्रिय हुआ था। हिन्दी अनुवाद भी उतना ही रोचक, ज्ञानवर्द्धक तथा आध्यात्मिक अनुभूतियों की प्रतीति कराने वाला है। अनुवाद की भाषा सहज प्रवाहमयी है।

यात्रा आगरा से आरम्भ होती है। ट्रेन से काठगोदाम फिर बस से अल्मोड़ा, कोशी, कौसानी, देवाल होकर हाटकल्याणी गाँव पहुँचती है। यात्री दो है, चित्तरंजन दास तथा उनके शिष्य सदन। हाट कल्याणी से आगे केदारनाथ, रुद्रनाथ, तुंगनाथ, बद्रीनाथ तथा उखीमठ-त्रियुगी नारायण आदि की यात्रा में सदन के पिताजी भी मार्गदर्शक के रूप में साथ हैं। आते-जाते लेखक एक-डेढ़ माह उनके घर हाटकल्याणी में भी रहते हैं। उस बीच मार्ग में आने वाले तथा दूर तक दिखाई देने वाले सभी प्राकृतिक भौगोलिक दृश्यों का प्रायः विश्लेषणात्मक वर्णन करते हुए लेखक महत्वपूर्ण व्यक्तियों के व्यक्तित्व का परिचय भी देते हैं, जिनमें कौसानी की सरला बहन से लेकर बद्रीनाथ के मौनी बाबा, दुकानदार, देश के विभिन्न भागों से यात्रा पर आये हुये सहयात्री और सदन का परिवार शामिल हैं। सन् 1959 के मई जून में की गई इस यात्रा के वृत्तान्त में वर्णित तीर्थस्थलों के पैदल यात्रापथ के विस्तृत विवरण के साथ-साथ यहाँ का भौगोलिक ऐतिहासिक परिचय भी दिया गया है। कभी उपनिषदों पुराणों की सूक्तियों को तो कभी स्थान विशेष से जुड़ी कि किवदन्तियों को भी सम्मिलित किया गया है। हिमशृंगों की ऊँचाइर्, पहाड़ों पर उगने वाली वनस्पतियों के ऊँचाई के अनुसार बदलते प्रकार, पेड़ पौधों के स्थानीय तथा बाॅटेनिकल नाम और यात्रा पथ पर उपलब्ध होते भोज्य पदार्थो के भी रोचक विवरण दिये गये हैं। बद्रीनाथ तथा केदारनाथ के आसपास के मन्दिरों एवं पर्वतों, कुंडों से जुड़ी दन्तकथाएँ भी रोचक जानकारी उपलब्ध कराती हैं। बद्रीनाथ के प्रसंग में राहुल सांकृत्यायन का संदर्भ देते हुए लेखक ने लिखा है कि:

‘‘तिब्बत के लामाओं की तरफ से यहाँ चाय और चंवर की भेंट आती है और मन्दिर से मिठाई, भोग वस्त्र एवं कस्तूरी प्रसाद रूप में लामाओं के पास भेजी जाती है। थोलिंग मठ से प्रति वर्ष उपहार के साथ बद्रीनाथ जी के पास चिट्ठी आती है। उस चिट्ठी में बद्रीनाथ को ‘हमारे देवता‘ कह कर संबोधित किया जाता है।’’ (पृष्ठ 154-155)

इस यात्रा काल में दिन भर में एक छोटी बस रूद्रप्रयाग से गुप्तकाशी तक जाती थी। उसमें भी लाईन लगती थी और पहले दिन बारी न आने पर दूसरे दिन तक रुकना होता। अधिकांश यात्री पदयात्रा करते हंै। संकरे -पथरीले ऊबड़-खाबड़ रास्तों पर चढ़ते-उतरते, थकते-सुस्ताते झरनों का पानी पीते हुए यात्री एक पड़ाव से दूसरे पड़ाव तक जाते हैं। पदयात्रा कर तीर्थ दर्शन करने वालों के पास स्थानीयता को जानने समझने का पूर्ण अवकाश होता है। देश के भिन्न-भिन्न प्रदेशों से आने वाले भिन्न-भिन्न भाषायी यहाँ सहयात्री बन जाते हैं, ‘‘अपनी गठरी सिर पर रख हाथ में छड़ी लिये वे पर्वत के दुर्गम यात्रा पथ तय करते हैं। अधिकतर लोगों के पैरों में चप्पल या जूता नहीं होता। जहाँ स्नान करते है वहाँ से चलते समय गीले कपड़े सिर पर डाल लेते हैं।’’(पृष्ठ 184)

ये परस्पर अपरिचित यात्री मार्ग में ही मित्र बन जाते हैं। दास जी लिखतें हैं, ‘‘तब जाकर मैंने हृदयंगम किया कि मनुष्य के साथ मिलने की रीति पोषक सतर्कताओं का बाहरी आयोजन नहीं। इन सब बाहरी सतर्कताओं का परित्याग कर जहाँ जाओगे वहीं तुम्हें लोगों का स्नेह और श्रद्धा मिलेगी।’’(पृष्ठ 187)

इन रास्तों पर खाने रहने की पर्याप्त सुविधाओं का अभाव हैं। सरकार की ओर से यात्रियों के ठहरने के लिए किसी प्रकार की व्यवस्था नहीं है। इसलिए दुकानदारों का ही आश्रय है। वही यात्री के पालक, पोषक, परिचायक और सरकार सब हैं। (पृष्ठ 58)

दुकानें भी बहुत कम तथा बहुत दूर-दूर हैं। सोने-सुस्ताने के लिए स्थान, दरी चटाई और खाना पकाने के लिए चूल्हा, लकड़ी, बर्तन, आटा, चावल, दाल जो भी होता, वे ही उपलब्ध करातीं। इन दुकानकारों की सराहना करते हुए चित्तरंजन जी ने लिखा है,  ‘‘दुकानदार और उसका परिवार यात्रियों को यह सत्कार और आश्वासन देकर बहुत धर्म उपार्जित करते हैं। संसार में धर्म भावना बढ़ाने में सहायता करते हैं। जगत् की सभी यात्राओं में समुदाय आयोजन के बजाय  मनुष्यों से मिला हुआ यह सहयोग ही सबसे अधिक मूल्यवान होता है। परन्तु उसे पाने के लिए मनुष्य पर ही निर्भर रह कर पैदल चलना होगा। सामग्री के ऊपर निर्भर करने की अज्ञानता का परित्याग करना होगा।’’ (पृष्ठ 187)

निर्जन पर्वत पथ पर भूखे-थके यात्रियों को यथेचित मूल्य पर मिलने वाली ये ही सुविधाएं उनके लिए   बहुमूल्य बन जाती हैं। पैदल पथ पर भूख की प्रबलता का अनुभव इस प्रसंग से होता है, ‘‘हाथ-मुँह पोंछने के लिए जेब से रूमाल निकालते समय उसमें रखे सारे भुने चने एक साथ जाकर कीचड़ में गिर गये। लाख टके की संपदा खोने जैसा महसूस कर भूखे पेट के द्वारा परिचालित मन मुहुर्त भर के लिए शोकाकुल हो गया।’’ (पृष्ठ 68)

भूख के समय बेस्वाद भोजन भी स्वादिष्ट हो जाता है, ‘‘तब पेट भूख से जल रहा हो, तब किसी भी खाद्य पदार्थ को बेस्वाद कहना जीभ के लिए संभव नहीं होता।’’ (पृष्ठ 53)

सीधे और ईमानदार पहाड़ी व्यापारी पैसे तो लेते हैं, किन्तु अपने पास उपलब्ध सीमित वस्तुओं से भी पथिकों की बड़े प्रेम से सेवा करते हैं। लेखक ने हर प्रसंग पर उनकी प्रशंसा की है। उनकी तुलना में पंडों का व्यवहार अति कटु और अश्रद्धा उत्पन्न करने वाला है। पंडे भक्त्त और भगवान के बीच बाधक ही प्रतीत होते हैं, ‘‘जब भक्त्त भगवान के घर में प्रवेश कर रहा होता तब दहलीज पर पंडों ननदों के जैसे जबर्दस्ती उपहार क्यों माँगते हैं ?’’ (पृष्ठ 76)

‘‘बद्रीनाथ में यात्रियों की भीड़ बहुत अधिक होती है। इसलिए मंदिर के अहाते से दरवाजे तक यात्री लोग पंक्तिबद्ध खडे़ होते हैं। पहरेदार लोग यात्रियों की पीठ पर मुक्के से प्रहार कर अन्दर छोड़ते हैं।’’ (पृष्ठ 138)

धर्म के नाम पर दलाली करने वालों पर उनकी टिप्पणी है, जो धर्म खरीदता है और जो धर्म बेचता है वे दोनों ही धर्म से बहुत दूर चले जाते हैं। ……धार्मिकता में अनेक प्रकार की राजसिकता घुस जाने के कारण धर्म-अधर्म में परिणत हो गया है। ……जहाँ कहीं भी जो देखने जाए, वहाँ देखेंगे कि धर्म के नाम पर बाजार लगा है। (पृष्ठ 104)

पंडों के द्वारा दिखाये जाते पुण्य लाभ तथा ईश्वर प्राप्ति के लालच पर व्यंग्य करते हुए लेखक लिखतें हैं, ‘‘भगवान रूपी बनिया तुम्हारे जमा किये हुए धर्म से तुम्हारे पैरों में सोने की जंजीर पहना कर तुम्हें ले जा कर स्वर्ग में रखेंगे।’’ (पृष्ठ 193)

उनकी यात्रा धार्मिक लाभ हेतु नहीं है, यह वे बार-बार स्पष्ट करते है,‘‘ धर्म कमाकर स्वयं का और स्वयं के पितरों का उद्धार करने के लिए मैं पैदल नहीं चल रहा हूँ। मेरा मार्ग इसे देखने का मार्ग है, इसे अनुभव करने का मार्ग है। अनुभव अपने अंदर शान्त हो जाने का मार्ग है। यही मेरी मुक्ति है, यही मेरी विमुक्ति है। पाप मेरे जीवन का प्रमुख उत्प्रेरक नहीं है। ’’ (पृष्ठ 62)

इस तीर्थयात्री को मूर्ति अथवा कर्मकाण्ड में ईश्वर लाभ नहीं मिलता। उसे शान्त प्रकृति के मौन वार्तालाप और गतिशील सांैदर्य में ईश्वर की अनुभूति होती है, ‘‘मन तीर्थकागा के समान अधिक देखने और अधिक पाने के लिए बावला हो उठता है और अपनी चोंच इधर-उधर मारता फिरता है। …….भगवान जी की मूर्ति को आँखों के सामने देखते हुए भी भगवान को अनुभव नहीं कर पाता। परन्तु रात होने पर तीर्थ का वास्तविक रूप मानस नेत्रों के सम्मुख उद्भासित हो उठता है। दिन में तीर्थ दर्शन आतुर आसक्ति से परिपूर्ण होता है। रात को तीर्थ मन के पात्र को शान्त रस से परिपूर्ण कर देता है।’’ (पृष्ठ 158-59)

मूर्ति और मंदिर निमित्त मात्र हैं। उद्देश्य हिमालय दर्शन ही है, जो स्थिति और गति दोनों का प्रतीक बनकर ईश्वर साक्षात्कार की अनुभूति कराता है। यह अनुभूति केवल मंदिर में नहीं होती, सम्पूर्ण पथ क्रमशः उस स्थिति तक पहुँचाता है, ‘‘आँखों के सामने स्लेटी आकाश के पर्दे के उस ओर कल्पना पथ, जो शुभ समृद्ध मरीचिका सदृश नाच-नाच कर घूम रही होती है, किसी अदृश्य डोर के द्वारा वही यात्री गण को आकर्षित कर ले जाती है। उसी आकर्षण को कोई केदारनाथ कहता है, कोई कठिन केदार कहता है।’’ (पृष्ठ 71)

पर्वत पथ पर चढ़ते-उतरते या रुक कर निहारते हुए इस अनुभव से साक्षात्कार होता है, ‘‘रास्ते पर उतरते  समय जैसे किसी अशरीरी अस्तित्व के साथ एकदम एक हो गये हांे ऐसा प्रतीत हो रहा था। किसी के फैले हुए आँचल के स्पर्श से अन्तर्मन पुलकित हो रहा था।’’

‘‘यह अनुभव अनिर्वचनीय था। यह जल तोड़ आने का, यह गाँठ खोलने का अनुभव और संशय दूर करने का अनुभव, यह निकटवर्ती होने का अनुभव सब। (पृष्ठ 82)

‘‘अपूर्व था इन प्रपातों का दृश्य- कहीं धागे के जैसा तो कहीं धागों के गुच्छे की तरह, कहीं गँुथी हुई वेणी की तरह तो कहीं खुले केश की तरह।’’ (पृष्ठ 84-85)

ज्ञान, भक्त्ति, प्रेम सबकी समवेत अनुभूति कराता हिमालय परमात्मा तत्व के निकट तो ले जाता ही है, संसार को देखने वाली दृष्टि को भी अधिक उदार तथा आत्मीय बना देता है। यह अनुभव चित्तरंजन को बार-बार हिमालय आने के लिए प्रेरित करता है, ‘‘जीवन में अधिक सहज होना सीखने के लिए मैं हिमालय जाता हूँ। उसके चरणों में बैठ कर मैं जितना नीरव हुआ हूँ, मुझे लगता है उतना ही मैं किसी अन्य के साथ संयुक्त हो जाने का अनुभव कर पाया हूँ। संसार के साथ संयुक्त हुआ हूँ, मनुष्य के साथ संयुक्त हुआ हूँ। इस शोभामय सान्निध्य को आँखों में बसाकर मानो मैं दृश्य-अदृश्य चर-अचर के साथ संयुक्त होने की संवेदना को अनुभव कर पाया हूँ।’’ (पृष्ठ 246)

प्रकृति के सूक्ष्म तत्व को इस गहराई तक अनुभव करने के लिए मन की आँखें खोलनी पड़ती हैं; मन के कान खोल कर उसे सुनना पड़ता है। दास जी लिखते हैं, ‘‘सुनने के कान हों तो पर्वत मनुष्य से बात करता है। जो सुन पाता है, वही केवल साक्षात्कार कर पाता है।’’

‘‘जो वर्जिन मेरी की तरह कुमारी हो सकेगा, वही केवल भगवान को धारण कर सकेगा।’’ (पृष्ठ 244)

कभी वे कहते है, ‘‘धन और विद्या का नशा मनुष्य को सभी प्रकार के साक्षात्कार से दूर कर देता है।’’ (पृष्ठ 244)

“हिमालय यात्रा में स्थान-स्थान पर ऐसी विविध अनुभूतियाँ होती हैं। संपूर्ण हिमालय एक तीर्थ बन जाता है, शिलातीर्थ। हिमालय का शैल रूप शिलातीर्थ में परिणत हो गया।”

प्रस्तुत ग्रंथ केवल तीर्थस्थल एवं तीर्थ पथ का ही ज्ञान नहीं कराता, अपितु हिमालयवासियों से भी मिलाता है। मार्ग में आने वाले गाँवों-कस्बों, चट्टियों-दुकानों का लेखक सूक्ष्म निरीक्षण करते हैं। मार्ग में मिलने वाले और अपने छात्र सदन के परिवार तथा गाँववासियों का स्वभाव-आचरण तथा उनकी कठिन जीवनचर्या का अध्ययन-विश्लेषण करते चलते हैं। कभी इस समाज की तुलना उड़ीसावासियों से करते हैं तो कभी इन स्थलों के साथ यूरोप-अफ्रीका आदि देशों की तुलना करते हैं। पर्वतीय लोकगीतों को चुन कर उनको अपनी भाषा में समझाते हैं तथा कुमाऊँनी-गढ़वाली एवं उड़िया भाषा के समोच्चरित-समानार्थी शब्दों की सूची भी बना लेते हैं। सदन के साथ एक-डेढ़ माह तक उनके घर पर रहते हुए उनके घर, रसोई, खेत, गौशाला, वन, चारागाह, बुग्याल  आदि सब जगह जाकर इस अद्भुत जीवन को देखते हुए आश्चर्यचकित होते हैं और टिप्पणियाँ करते रहते हैं:   ‘‘पहाड़ी गाँवों में कोई आलसी होकर नहीं बैठ सकता। जीवन का सारा समय यहाँ पत्थरों के साथ संग्राम में बीत जाता है। जीवन जीने के इस युद्ध में छोटे बच्चे भी मुक्त नहीं होते।’’ (पृष्ठ 196-97)

‘‘पहाड़ी किसान के लिए कभी भी आराम नहीं है। उसके घर हमेशा विवाह के घर जैसी काम की हड़बड़ी लगी रहती है।’’ (पृष्ठ 202)

‘‘पहाड़ी प्रदेश में जैसे झरना ध्वनि से परिपूर्ण होता है, वैसे ही पहाड़ी किसान का जीवन कर्म से भरपूर होता है। न रात, न दिन, न सुबह, न शाम; झरने की धारा द्वारा बने जलस्रोत की तरह निर्बाध बहता रहता है।’’ (पृष्ठ 195)

उत्तराखंड के गाँवों-कस्बों में बीसवीं सदी के अन्तिम वर्षों तक अनेक व्यक्ति चर्खा तथा कतुवा कातते दिखाई देते थे। चलते-फिरते कतुवा कातने का कौतुक देख कर भी दास जी आश्चर्य से भर जाते हैं। अब ये दृश्य दुर्लभ होते जा रहे है, अतः आज की युवा-बाल पीढ़ी के लिए भी यह एक कौतुक ही है:

‘‘हाथ में थोड़ा ऊन और लकड़ी की तकली पकड़ वे सूत कातते-कातते पैदल चलते हैं। पहाड़ों में अनेक लोग पैदल चलते समय ऐसे ही सूत कातते दिखाई देते हैं।’’

इसी प्रकार यात्रा पथ में तथा हाट कल्याणी गाँव में निरन्तर कर्मरत महिलाओं को देखकर भी उन्हें अचरज होता है। उन्होंने अनेक स्थानों पर अपने उद्गार और टिप्पणियाँ व्यक्त किये हंै:

‘‘पहाड़ियों का जीवन इतना कठिन है कि वहाँ स्त्री को भी पुरुष के साथ कदम मिला कर काम पर निकलना पड़ता है। पहाड़ी घर की लक्ष्मी केवल गृह-लक्ष्मी होकर रहने से घृणा करती है, पुरुष के साथ वह उसकी सहचरी बनकर निकल पड़ती है। कठिन गृहस्थी को सहनीय बनाने में व पुरुष की सभी प्रकार से सहायता करती है। झटपट गृहकार्य निबटा कर वह खेत जाकर खेती के कार्यो में सहायता करती है, फिर शाम को घर लौट कर कितने प्यार से सभी के लिए भोजन की थाली सजा देती है।’’ (पृष्ठ 204)

‘‘सामाजिक जीवन जितना भी भिन्न-भिन्न क्यों न हो, फिर भी शारीरिक श्रम करते समय वे सभी एक हो जाती हैं। दर्जी के परिवार की स्त्री खेतों में काम करने जाती हैं, ब्राह्मण परिवार की स्त्री भी जाती है। दोनों ही लक्ष्मी का रूप धारण कर गृहस्थी को ऐश्वर्य से परिपूर्ण करने जाती हैं। पत्थर से फसल बीनने जाती हैं।’’ (पृष्ठ 205)

उत्तराखंड में जातीय वर्गीकरण होते हुए भी कार्य और आपसी व्यवहार में जातीय भेदभावपूर्ण वैमनस्य  नहिवत् है। विशेषतः स्त्रियों की स्थिति में इस ओर संकेत करते हुए दास जी अपनी टिप्पणी करते हैं, तो पहाड़ी माँ का चित्र खींचते हुए वे उसके सम्मुख नतमस्तक हो जाते हैं:

‘‘पीठ पर सोल्टा, कमर के कपड़ों में हँसिया खोसा हुआ, मेहनत के पश्चात् थका हुआ परन्तु उज्जवल और गंभीर मुखमंडल, पहाड़ी माँ कहने पर यही तस्वीर मेरी आँखों के सामने तैर जाती है। तंत्रशास्त्र में नारी को शक्ति कहा गया है। ये ही है यथार्थ में शक्तिमयी। पृथ्वी का एक नाम है ‘सर्व सहा,‘ पहाड़ी घर की स्त्री को इस नाम से यथार्थ में विभूषित किया जा सकता है। यदि पहाड़ी घर की स्त्रियाँ अपने ऊपर संसार का सारा बोझ ग्रहण किये न होतीं तो पहाड़ी घर की गृहस्थी कदापि संभव न हो पाती। पत्थर और अरण्य से मनुष्य की सारी लड़ाई व्यर्थ हो जाती। पहाड़ी परिवार के साथ लगभग डेढ़ महीने रहने के बाद पहाड़ी स्त्रियों को मैं जितना जान पाया हूँ उससे उनके चरणों में मेरा मस्तक उतना ही नत हो गया है।’’ (पृष्ठ 204)

सन् 1959-60 का यह वृत्तान्त तत्कालीन उत्तराखंड की जिन स्थितियों का दर्शन कराता है, वे आज काफी बदल भी गई हैं। लेखक कभी स्त्रियों की अशिक्षा के विषय में लिखते हैं कि पहाड़ी कन्याएँ बाहरी दुनिया के विषय में कुछ नहीं जानतीं, पढ़ाई करना उनके भाग्य में नहीं होता, तो कभी तत्कालीन रीति रिवाजों और आज की अपेक्षा सुरक्षित वातावरण की तरफ भी संकेत करते हैं। उन दिनों स्त्रियाँ हर समय पूरे आभूषण पहन रखती थीं। मन्दिरों-तीर्थों की यात्रा में विशेष रूप से सज-धज कर जाती थीं।

‘‘तीर्थयात्रा पर जा रही हैं, इसलिए बहुत प्रेम से गहनों और आभूषणों के द्वारा पूरे शरीर को सुसज्जित करके तैयार हुई थीं।’’ (पृष्ठ 36)

इसकी तुलना 2013 की केदारनाथ आपदा के बाद हुई लूटपाट से की जा सकती है। क्या आज कोई महिला इस प्रकार आभूषणों से सज कर गाँव-घर से बाहर निकल सकती है ? पिछले छः दशकों में हमारे रहन-सहन से लेकर तीर्थ, सड़कों, शिक्षा-व्यवसाय सभी में कितना कुछ बदल गया है ? हम सोचते हैं कि हम आगे बढ़ गये हैं, किन्तु पिछले कालखण्डों के ऐसे वृत्तान्त आईना लेकर सामने आकर हम को सच्चाई स्वीकार करने के लिए प्रेरित करते हैं। इस दृष्टि से भी शिलातीर्थ एक पठनीय यात्रावृत्त बन जाता है। इसकी भाषा, इक्के-दुक्के शब्दों को छोड़ कर, इतनी सहज है कि ग्रंथ अनूदित नहीं बल्कि मूल भाषा जैसा आनन्द देती है।

इस ग्रंथ के लेखक अब इस दुनिया में नहीं है। वे गांधी जी, रवीन्द्रनाथ टैगोर तथा श्री अरविंद के दर्शनों से काफी प्रभावित थे। उनकी दो सौ से अधिक पुस्तकों में ‘शिलातीर्थ’ भी एक महत्वपूर्ण पुस्तक है। आगरा, शान्ति निकेतन, डेन्मार्क, फिन्लैंड, जर्मनी तथा इजरायल अदि देशों में अध्ययन और शिक्षा के प्रयोग करने के बाद उन्होंने अपना जीवन भ्रमण तथा लेखन में व्यतीत किया। उनके इन अनुभवों की प्रतीति इस ग्रंथ को पढ़ते समय भी होती है। ‘शिलातीर्थ’ में उल्लिखित लेखक के शिष्य हाट कल्याणी के सदन अर्थात सदन भाई मिश्रा ने हिंदी संस्करण की भूमिका लिखी। उन्होंने बाद में बेरीनाग ग्राम स्वराज्य मंडल की स्थापना करके पर्यावरण संररक्षण तथा ग्राम स्वराज्य के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य किये। वर्तमान में हिमालय ट्रस्ट संस्था चलाते हैं और गरुड़-बागेश्वर में रहकर अपने कार्यों को आगे बढ़ा रहे हैं।

 

शिलातीर्थ /लेखक: चित्तरंजन दास / हिंदी भाषान्तर: डाॅः अर्चना मोदी / नवपल्लव प्रकाशन, भुवनेश्वर, उड़ीसा / प्रकाशन वर्ष: 2017 / मूल्य 200 रु.

दिवा भट्ट

कुमाऊँ विश्वविद्यालय के अल्मोड़ा परिसर में हिन्दी की प्राध्यापिका रह चुकी डॉ. दिवा भट्ट हिन्दी की सुपरिचित साहित्यकार हैं.