सिंचाई विभाग के लिये सोने की खान है बलिया गधेरा


nainitalsamachar
September 21, 2018

डी. एन. भट्ट

बलिया नाला नैनीताल झील के तल्लीताल डाँट से आरम्भ होता है। डाँट का निर्माण वर्ष 1872-73 में नगर पालिका द्वारा करवाया गया था। डाँट का नियंत्रण निर्माण पूर्ण होने के समय से ही लो. नि. वि. के पास था। वर्ष 2017 में नैनीझील, उसमें गिरने वाले नाले एवं डाँट सिंचाई विभाग को हस्तान्तरित कर दिये गये, वर्षा के मौसम में झील में क्षमता से अधिक पानी को पाँच स्लूइस गेट या डाँट के माध्यम से बलिया नाले में छोड़ा जाता है। जो रानीबाग में गौलानदी में मिल जाता है।

आजादी से पूर्व इस नाले में विशेष तकनीकी कार्य किए गये जो कि तल्लीताल डाँट से फाल संख्या 22 तक थे। इसके अतिरिक्त कच्चे भाग में 84 बैडबार को निर्माण नाले की तलहटी का कटान रोकने के लिए किया गया था। प्रशासनिक अदूरदर्शिता एवं लापरवाही के कारण समस्त बैडबार टूट गये साथ ही इस क्षेत्र की कोई सुध न लेने के कारण बलिया रैवीन में छोटे बड़े नालों का जो जाल था, वह क्षतिगस्त हो गया। उसका दुष्परिणाम यह रहा कि वर्ष 1973 में हरीनगर स्थित पालिका आवास एवं बाल्मीकि मन्दिर बलिया नाले में समा गए। तब जाकर प्रशासन की कुम्भकर्णी नींद टूटी।

उ. प्र. सरकार में तत्कालीन वित्तमंत्री पंडित नारायण दत्त तिवारी ने व्यक्तिगत रुचि लेकर एक हाई लेविल एक्सपर्ट कमेटी का गठन किया। हाई लेविल एक्सपर्ट कमेटी के विस्तृत अध्ययन के उपरान्त फाल संख्या 122 से ब्रेवरी पुल तक 2.10 कि.मी. लाइनिंग की संस्तुति के आधार पर वर्ष 1979 में रु. 95.00 लाख का प्रारम्भिक आगणन स्वीकृत हुआ।

पैसा स्वीकृत होने के पश्चात् भी लो. नि. वि. कार्य प्रारम्भ कर पाया क्योंकि शासनादेशानुसार डिजाइन का कार्य सिंचाई विभाग को करना था। वित्तीय स्वीकृति प्राप्त होने के पश्चात डिजाइन के अभाव में निर्माण कार्य प्रारम्भ न होने की दशा में स्वीकृति स्वतः ही समाप्त हो गई।

बलिया नाला प्रभावित क्षेत्र संघर्ष समिति एवं क्षेत्र की जनता द्वारा समय-समय पर आन्दोलनात्मक रुख अपनाने एवं समाचार पत्रों/समाचार माध्यमों में बलिया के अस्तित्व को नैनीझील एवं नैनीताल नगर के अस्तित्व के साथ जोडे़ जाने से तात्कालिन आयुक्त कुमाँऊ मण्डल श्री आर.एस. टोलिया द्वारा अपने पत्र के माध्यम से शासन से अनुरोध पर अधिशासी अभियन्ता, कैनाल डिजाइन डिवीजन यूनिट 5, केन्दीय परिकल्प निदेशालय आलमबाग लखनऊ द्वारा 15 वर्ष पश्चात् वर्ष 1994 में डिजाइन प्राप्त हुआ।

सिंचाई विभाग की इस घोर अर्कमण्यता के कारण जिन क्षेत्रों में स्लिप जोन बनने की आशंका व्यस्त की जा रही थी, परिकल्पना आते-आते वह पूर्ण रुपेण स्लिप जोन में तब्दील हो गए। जो कार्य वर्ष 1979 में मात्र 95.00 लाख रुपय में होना था उसकी लागत बारह गुना बढ़कर रु. 1229.00 लाख हो गयी साथ ही नये क्षेत्रों में स्लिप जोन बनने से आबादी वाले क्षेत्रों जैसे रईस होटल इत्यादि का अस्तित्व मिट गया तथा नैनीताल-ब्रेवरी पैदल मार्ग का एक बड़ा हिस्सा साथ ही हजारों वर्ग मीटर वन क्षेत्र बलिया नाले की भंेट चढ़ गया, रा.इ.कालेज, कृष्णापुर, हरीनगर के रिहायशी क्षेत्रों के भवनों में दरारें आ गई एवं कैलाखान की पहाड़ियों में भी भू-कटाव होने लगा जो वर्तमान में भी जारी है।

सिंचाई विभाग के परिकल्पनिदंशालय द्वारा मानत्रित्रों के आधार पर वर्ष 1994 में रु. 1229.00 लाख की योजना लो.नि.वि द्वारा बनायी गयी तथा योजना का शासनादेश दि. 25-03-1007 को हो गया। पैसा स्वीेकृत होने के पश्चात भी कार्य फिर भी नहीं हो पाया। नवम्बर 1998 में यह योजना सिंचाई विभाग को हस्तान्तरित करने हेतु शासनादेश सं. 4707/28.5.98 शा./95 दिनांक 24.11.1998 को निर्गत हुआ। दि. 02.01.1999 को सिंचाई विभाग को योजना का औपचारिक हस्तान्तरण हुआ।

फिर नया नाटक शुरु हुआ केन्द्रीय भवन अनुसंधान संस्थान रुड़की, केन्द्रीय भूमि एवं जल अनुसंधान एवं भूकम्प अभियन्त्रण विभाग, रुड़की विश्वविद्यालय के सुझावों के समावेश के उपरान्त पुनः योजना बनायी गयी। उपरोक्त सभी संस्थानों ने विस्तृत अध्ययन कर अपने सुझाव/प्रस्ताव प्रेषित किये। इन प्रस्तावों का समावेश करते हुये संशोधित योजना रु. 1552.00 लाख उत्तराखंड शासन के शासनदेश सं0 1359/नै0-1 सिं 2001 दि. 15-10-2001 द्वारा स्वीकृत की गयी।

वर्ष 1973 में आजादी के बाद पहला भूस्खलन हुआ था। उसके 30 वर्ष पश्चात किसी प्रकार निविदाओं की औपचारिकतायें पूर्ण कर 2002-03 वर्ष में कार्य प्रारम्भ हो पाया जो वर्ष 2005 तक चला जिसमें मुख्यतः 4 कार्य क्रमशः
1. बलिया नाले के 770 मीटर ( फाल संख्या 122) से आगे 70 मीटर लम्बाई में नाले के तली का कार्य।

2. बलिया नाले के दांये पाश्र्व में हरिनगर स्लिप न. 1, 2, 3, तथा 4 में भूस्खलन प्रतिरोधक कार्य एवं उपचार तथा 2.375 कि.मी. लम्बाई में सतही नालियों का निर्माण।

3. बलिया नाले के बाँये पाश्र्व में कैलाखान स्लिप न. 1 व 2 तथा आलूखेत स्लिप न. 1 व 2 में भूस्खलन प्रतिरोधक कार्य एवं उपचार और 1.050 कि.मी. लम्बाई में सतही नालियों का निर्माण।

4. नैनीताल से वीरभट्टी के मध्य निर्मित पैदल मार्ग का 1.00 कि.मी. लम्बाई में तथा जी.जी.आई.सी मैदान से पानी के रिसाव का उपचार तथा सतही नालियों का जीर्णोद्धार।

वर्ष 2005 में निर्माण कार्य पूर्ण होने के दो वर्ष पश्चात ही जो प्रतिरोधक कार्य किए गये थे उनमें दरारें आ गयी तथा वर्ष 2014-15 आते-आते फाल संख्या 22 के आगे 70 मीटर तली का कार्य एवं नैनीताल ब्रेवरी पैदल पुल में डाली गयी सी.सी. के अलाव सारा कार्य ध्वस्त हो गया या दूसरे शब्दों में कहें तो निर्माण सामग्री जहाँ से आयी थी ( गौला से ) वहीं पहुँच गई। आश्चर्य की बात है कि बड़े-बड़े विशेषज्ञों और नामों द्वारा विस्तृत अध्ययन एवं सुझावों के पश्चात भी ऐसा क्यों हुआ ? क्या इस पर कोई जाँच आख्या आई ? क्या शासन द्वारा किसी की जिम्मेदारी तय की गयी ?

इसी बीच वर्ष 2016 में नाबार्ड से बलिया नाले के नाम पर फिर 41 करोड़ स्वीकृत करा लिए गये हैं। मेरी विश्वस्त जानकारी के अनुसार 41 करोड़़ में से आधा 21 करोड़ रु. खर्च भी हो गया है। यह सब कार्य ब्रेवरी पुल से नीचे छीणा गाँव तक करवाये जा रहे हैं। जहाँ कटाव हो रहा है वहाँ से 4 कि.मी. दूर कार्य का क्या औचित्य है। यह तो हमारे भाग्य विधाता लोग ही बता सकते हैं।

अब हवा में एक नया शिगूफा तैर रहा है कि बलिया नाले का ट्रीटमेंट का कार्य जापानी पद्धति से होगा। इसमें सौ करोड़ के आस-पास व्यय होगा। नैनीताल और नैनीताल का अस्तित्व जाये भाड़ में फिलहाल तो बलिया नाला कुछ लोगों के लिए दुधारु गाय है। चाहे जितना दूध निकाल लो।

जब हरीनगर वाले इलाके में भूस्खलन हुआ तो बरबस मुझे आज से लगभग 25 वर्ष पूर्व श्री चन्द्र शेखर सनवाल (इंजिनियर यू.पी.पी.डब्ल्यू. डी.) का सुनाया एक वाकया याद आ गया। छटे दशक की बात है। श्री माधो सिंह बिष्ट यू०पी० पी० डबल्यू० डी० के मुख्य अभियन्ता थे क्योंकि यू०पी० की ग्रीष्मकालीन राजधानी नैनीताल थी इसलिए चीफ साहब का नैनीताल आना जाना लगा रहता था लेकिन एक खास बात थी, माधो सिंह साहब सालभर में साल में अवश्य एक दो बार काठगोदाम में ट्रेन से उतरने के बाद सीधे वीरभट्टी पुल तक जीप से आते और वहाँ से बलियानाले के किनारे-किनारे निरीक्षण करते हुए पैदल तल्लीताल धोबीघाट तक आते। उन दिनों में सहायक अभियन्ता था। एक दिन मैंने हिम्मत करके चीफ साहब से पूछ ही लिया सर आप इस रास्ते क्यों आते हैं। माधो सिंह साहब बोले सनवाल मैं इस रास्ते में इसलिए आता हूँ ये बलिया रैवीन नैनीताल की टाँगें है अगर ये कमजोर पड़ेंगी तो तालाब के लिए भविष्य में खतरे का सबब बन जाएंगी अगर तालाब नहीं रहा तो नैनीताल का क्या होगा।

नोटः मुझे तो विशेषज्ञों की टीम में कृषि प्रशिक्षण संस्थान देहरादून का नाम आने से आज भी आश्चर्य है। जो संस्थान कृषि सम्बन्धों प्रशिक्षण देता है। उसने अध्ययन करके क्या सुझाव दिए होंगे ? समझ से परे है।

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