स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशें किसानों के साथ धोखा है


नै स
May 29, 2018
 विवेकानंद माथने 

 

कृषि से लाभकारी कीमत प्राप्त करने के लिये देशभर के किसान दशकों से संघर्ष करते आये है। हाल के वर्षो में कुछ संगठनों द्वारा स्वामीनाथन आयोग (राष्ट्रीय किसान आयोग) की संस्तुतियाँ लागू करने की मांग की जाने लगी है। ये सिफारिश,ें जिन्हें स्वामीनाथन सदाबहार क्रांति कहते हंै, प्रथम हरित क्रांति की तरह उत्पादन केंद्रित हंै। प्रथम हरित क्रांति का अनुभव बताता है कि उस उत्पादन वृद्धि कीमत केवल किसान को ही नहीं, बल्कि पूरे समाज को चुकानी पड़ी। दरअसल स्वामीनाथन आयोग की लागत पर डेढ़ गुना समर्थन मूल्य (एमएसपी) देने की सिफारिश एक धोखा है। एक ऐसे वक्त पर, जब पूरे देश में किसानों में आक्रोश है और वे अपने अधिकार के लिये सड़क पर उतर रहे हैं, यह मांग करना नासमझी है।

देश की बढ़ती आबादी की खाद्यान्न पूर्ति के लिये डॉ. एम. एस. स्वामीनाथन के नेतृत्व में जो हरित क्रांति हुई, उसमें खेती की देशी विधियों से उत्पादन बढ़ाने की बजाय रासायनिक व यांत्रिक खेती तथा संकरित बीजों को केन्द्र में रखा गया। क्रॉप पैटर्न बदलकर एक फसली पिक पद्धति को बढ़ावा देने से जैव विविधता और फसल विविधता पर बुरा असर पड़ा। देश के एक बहुत बडे़ हिस्से में बहुफसली खेती एक फसली खेती में परिवर्तित हो गयी। किसान को अपने खेती से पोषक आहार तत्व मिलना बंद हो गया। पूरे देश में रासायनिक खेती के कारण कृषि भूमि की उर्वरा शक्ति घटी व भूजल स्तर में तेजी से गिरावट आने लगी। जमीन, पानी और खाद्यान्न जहरीले हो गयेे। आदमी की थाली में जहर पहुंचने लगा।

हरित क्रांति से कृषि उत्पादन तो बढ़ा, लेकिन किसानों पर दुतरफा मार पडने से उनकी हालत तेजी से बिगड़ती गयी। बीज, खाद, कीटनाशक, यंत्र का बढ़ता इस्तेमाल, सिंचाई, बिजली आदि के लिये किसान की बाजार पर निर्भरता बढ़ने से लागत खर्च बढ़ा। फसलों का उत्पादन बढने से फसलों की कीमत कम हुई। परिणाम स्वरूप लागत और आय का अंतर इस तरह कम हुआ कि खेती घाटे का सौदा बनी और किसान कर्ज के जाल में फंसता चला गया। इस प्रकार प्रथम हरित क्रांति किसानों की लूट करने, थाली में जहर पहुंचाने और जैव विविधता को प्रभावित करने का कारण बनी। किसानों के बर्बादी में उसकी महत्वपूर्ण भूमिका रही है। हरित क्रांति के जनक के नाते डॉ. एम.एस. स्वामीनाथन किसान की दुर्दशा के लिये सबसे अधिक जिम्मेदार माने जा सकते हंै।

प्रथम हरित क्रांति का मूल उद्देश्य कृषि रसायनों और तथाकथित उन्नत संकर बीजों के व्यापार को प्रोत्साहित करना था, जिसके द्वारा भारत में खाद, बीज, कीटनाशक और कृषि औजारों के बाजार का विस्तार किया गया। यह कहा जाता है कि द्वितीय विश्वयुद्ध की समाप्ति के बाद बारूद बनाने वाली कंपनियों ने बारूद के घटक नायट्रोजन, पोटाश और फास्फेट का वैकल्पिक इस्तेमाल करने के लिये रासायनिक खाद का उत्पादन शुरू किया। हरित क्रांति ने उत्पादन वृद्धि के नाम पर प्राकृतिक खेती करनेवाले किसान को रासायनिक खेती के झांसे में लाकर रासायनिक खेती को पूरे देश में फैलाने का काम किया। कंपनियों ने सरकारी मदद से रासायनिक खाद, बीज, कीटनाशक, कृषि उपकरण आदि किसानों को बेचकर उनकी लूट की।

अब दूसरी हरित क्रांति के लिये यूपीए के तत्कालीन कृषि मंत्री ने कहा है कि उन्हांेने स्वामीनाथन आयोग की 17 में से 16 सिफारिशंे लागू की थीं। एनडीए सरकार कह रही है कि उन्होने स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट नब्बे प्रतिशत लागू की है। अर्थमंत्री ने बजट पेश करते समय कहा कि सरकार पहले से स्वामीनाथन आयोग के अनुसार लागत के डेढ़ गुना कीमत दे रही है। अब सरकार ने सी2 पर पचास प्रतिशत मिला कर एमएसपी देने की घोषणा कर दी है। स्वामीनाथन स्वयं कहते है कि एनडीए सरकार उनकी रिपोर्ट पर अच्छा काम कर रही है। मगर फिर भी किसान की हालत बिगड़ती जा रही है। ऐसे में स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

स्वामीनाथन आयोग को खेती की आर्थिक व्यावहारिकता को सुधार कर किसान की न्यूनतम शुद्ध आय निर्धारण का काम सौपा गया था। वे किसानों की बिगड़ती हालात को सुधारने और उनके मौलिक अधिकारों की रक्षा करने के लिये बुनियादी सुझाव दे सकते थे। कृषि फसलों के शास्त्रीय पद्धति से मूल्यांकन करने और उसके आधार पर श्रम मूल्य देने या सभी कृषि उपज के दाम देने के लिये वैकल्पिक योजना सरकार को पेश कर सकते थे। लेकिन यह जानते हुए भी कि एमएसपी फसलों का उत्पादन मूल्य नहीं ह, उन्होंने एमएसपी में उत्पादन की भारित औसत लागत से 50 प्रतिशत अधिक मूल्य देने की सिफारिश की।

स्वामीनाथन आयोग के सिफारिशों के अनुसार यह अनुमानित किया जा रहा है कि सी2 पर पचास प्रतिशत के आधार पर एमएसपी में सामान्यतः अधिकतम दो-तीन सौ रुपये तक की बढ़ोतरी हो सकती है। यह बढ़ोतरी भी तभी संभव ह,ै जब सरकार एमएसपी पर सभी फसलों की खरीद करे या खुले बाजार में एमएसपी से नीचे फसल की खरीद पर प्रतिबंध लगाये। आज न ही सरकार के पास ऐसी व्यवस्था है और न ही इसके लिये बजट में इसके लिये कोई प्रावधान किया गया है। स्वामीनाथन आयोग की आर्थिक सिफारिशें पूर्णतः लागू होने पर भी किसान के मासिक आय में अधिकतम 1,000 रुपयों की ही बढ़ोतरी संभव है। आज किसान की खेती से प्राप्त मासिक आय औसतन 3,000 रुपये है। वह बढ़ कर 4,000 रुपये हो सकती है। अन्य स्रोत मिला कर यह आय 6,400 रुपये से 7,400 रुपये हो सकती है। जबकि सरकार कुल आय को दोगुना करने का दावा कर रही है। वेतन आयोग के अनुसार परिवार की बुनियादी आवश्यकताओं के लिये न्यूनतम मासिक आय 21 हजार रुपये होनी चाहिये। यह स्पष्ट है कि स्वामीनाथन आयोग के आधार पर एमएसपी में थोडी बढ़ोतरी से किसानों को न्याय मिलना संभव नही है। किसानों के साथ एक बार फिर से धोखा किया जा रहा है।

स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों में कृषि उत्पादन बढ़ाने के लिये जी.एम. बीज, सिंचाई की व्यवस्था, फसल बीमा, कृषि ऋण का विस्तार, समूह खेती, यांत्रिक खेती, गोडाउन आदि की सिफारिशें की गयी है। ये सारी व्यवस्थाएँ किसानों को खेती से हटा कर कार्पोरेट खेती को बढावा देने के लिये की जा रही हंै। सरकार इसी रास्ते चल कर किसानों को खेती से हटाना चाहती है। वह खेती पर केवल ऐसे 20 प्रतिशत किसान रखना चाहती है जो पूंजी और तकनीक का इस्तेमाल कर सकें। कृषि, बीमा, बैंकिंग में एफडीआई, जी.एम.बीज, ठेके की खेती, ई-नाम, आधुनिक खेती पद्धति और इजराईल खेती, निर्यातोन्मुखी खेती आदि को बढावा देने की तैयारी इसीलिये की जा रही है। यह सदाबहार हरित क्रांति किसान को जड़ से उखाडने के लिये लाई गई है। नई आर्थिक नीति लागू होने के बाद विश्व व्यापार संगठन के माध्यम से भारत की खेती पर काॅरपोरेटी कब्जा करने की शुरूआत हुई थी। स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट किसान हित का नाटक कर कारपोरेट खेती की नींव को मजबूत करने का काम रही है। कारपोरेटी साजिशें किस तरह काम करती हंै, स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट इसका उत्तम उदाहरण है।

काॅरपोरेट घराने किसान को लूट कर और खेती को घाटे का सौदा बनाकर भारत की खेती पर कब्जा करना चाहते हैं। उसके लिये वह किसान आंदोलन का भी उपयोग करना चाहते हैं। ‘स्वामीनाथन आयोग लागू करो’ की मांग के लिये स्वामीनाथन फाउंडेशन और इससे लाभान्वित होनेवाली कंपनियां काम कर रही हंै। वैश्विक तापमान वृद्धि से मुकाबला करने के लिये, किसान परिवहन के लिये बैल-शक्ति को बढावा देने और रासायनिक खेती से मुक्त नई प्राकृतिक खेती के लिये गाय-बैलों की रक्षा करने की आवश्यकता है। लेकिन उसे किसानों के लिये बोझ साबित कर गोवंश हत्याबंदी कानून हटाने की कोशिश हो रही है। सिंचाई का क्षेत्र बढ़ाने के लिये नदी जोड़ योजना की मांग सरकार और कार्पोरेट द्वारा प्रायोजित है। कंपनियों को जमीन पर कब्जा करने का रास्ता खोलने के लिये किसान विरोधी कानून हटाने के नाम पर किसान का सुरक्षा कवच बने सीलिंग एक्ट को हटाने की मांग की जा रही है। देश के किसानों और किसान संगठनों को अपने अधिकारों के लिये संघर्ष करते हुये किसान विरोधी षड़यंत्रों से सावधान रहने की आवश्यकता है।

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