मन्दिरों की नगरी कुम्भकोणम


nainitalsamachar
December 10, 2018

पार्वती जोशी

किसी भी धार्मिक स्थल की यात्रा करने का मेरा उद्देश्य न केवल अपनी धार्मिक आस्था, श्रद्धा और विश्वास की पूर्ति करना है, अपितु अपने परिवार व करीबी मित्रों के साथ उन स्थलों की धार्मिक मान्यताओं को, अपने देश की सांस्कृतिक भिन्नताओं और ऐतिहासिकता को देखना भी रहता है। जो भारतीय अपने देश की सांस्कृतिक विविधता व सभ्यता को अधिक-से अधिक समझना चाहते हंै, उन्हें भारत के दक्षिणी राज्य तमिलनाडु ने हमेशा से ही अपनी ओर आकर्षित किया है। मैं जब से कुम्भकोणम से लौटी हूँ, मेरे मन में एक बेचैनी सी है कि मैं किस प्रकार अपनी इस सकारात्मक ऊर्जा से परिपूर्ण यात्रा का वर्णन आपने पाठकों के समक्ष प्रस्तुत करूँ और उन्हें भी उन स्थानों की यात्रा के लिए प्रेरित कर सकँ।

मैंने तमिननाडु, केरल और कर्नाटक के बहुत से तीर्थ स्थानों की यात्राएँ की हैं। किन्तु जब तंजावुर जिले के छोटे से शहर कुम्भकोणम की यात्रा की, जो कि अपने मंदिरों, तालाबों और बारह कुम्भ के लिए प्रसिद्ध है, तो मुझे ये शहर किसी अजूबे से कम नहीं लगा। पूरा शहर मंदिरों का शहर है। दो हजार साल पुराने ये मंदिर द्रविड़ वास्तुकला के उत्कृष्ट नमूने हैं। इनका रखरखाव इतनी खूबसूरती से किया गया है कि ये सभी मंदिर आज भी नये लगते हैं। मंन्दिरांे के चारों ओर हरियाली का विशेष ध्यान रखा गया है। प्रति वर्ष इनके चारों ओर वृक्षारोपण किया जाता है। यह शहर त्रिचनापल्ली (त्रिची) और नागापट्टनम के लगभग बींचोबीच स्थित है।

पूर्णतया तमिलभाषी इस पवित्र धरती के दर्शन बिना किसी तमिलभाषी की सहायता से कर पाना हमारे लिए सम्भव नहीं था। इसलिए हमने अपने तमिलभाषी समधी ओर समधन के साथ वहाँ जाने की योजना बनाई। ईस्टर का हफ्ता होने के कारण हमें रेल का आरक्षण नहीं मिला, इसलिए वहाँ जाने के लिए हमने टैक्सी बुक कराई। हमारे समधी का वह पैतृक शहर है इसलिए उन्हें वहाँ के बारे में पूरी जानकारी थी। होटल व लोकल टैक्सी की उन्होंने आँनलाइन बुकिंग पहले ही करवा ली थी।

उनतीस मार्च शुक्रवार के दिन अपने ईष्ट देव का नाम लेकर हम इस यात्रा के लिए रवाना हुए। मैं, मेरे पति, छोटी बेटी शालिनी, हमारे समधी व समधन- पाँचों तीर्थयात्राओं के बहुत शौकीन हैं। यद्यपि टैक्सी के द्वारा ये बहुत लम्बी यात्रा थी, किन्तु मार्ग में कोई परेशानी नहीं हुई क्योंकि सड़कें चैड़ी, सुन्दर व हरियाली से परिपूर्ण थीं। यातायात कम होने के कारण ड्राइवर निर्विघ्न होकर गाड़ी चला रहा था। दक्षिण भारत के किसी भी राज्य में मार्ग में खाने-पीने की कोई कमी नहीं रहती, इसलिए सुबह का नाश्ता, दोपहर का भोजन, शाम काॅफी के लिए मार्ग में रुकते-रुकते हम कब तंजावुर पहुँचे, पता ही नहीं चला।

बचपन में चोल राजाओं की राजधानी तंजावुर के बारे में पढ़ा था। आज उसे प्रत्यक्ष देखकर मेरी खुशी का ठिकाना नहीं रहा। हमारी योजना तंजावुर के मंदिरों के दर्शन करने के लिए दूसरे दिन आने की थी। इसलिए सीधे कुम्भकोणम के लिए निकल गये। मार्ग में सेलवन व त्रिचनापल्ली (त्रिची) के बड़े शहर आये, जिनका नाम हमने भूगोल की किताबों में पढ़ा था। बाकी छोटे-छोटे शहरों का नाम नहीं सुना था।
लगभग साढ़े तीन बजे हम कुम्भकोणम के ‘राया इन’ होटल पहुँच गये। होटल पहुँच कर, नहा-धोकर व काॅफी पीकर हम मंदिरों के दर्शन करने के लिए निकल गये। यहाँ भगवान शिव, विष्णु तथा देवी माँ के अनेक मंदिर हैं, जो अलग-अलग नामों से प्रसिद्ध हैं। एक मंदिर ब्रह्मा का भी है, जो देश में कम ही देखने को मिलता है। मुझे इस बात पर आश्चर्य हुआ कि प्रत्येक मंदिर मनुष्य की अलग-अलग इच्छाओं की पूर्ति के लिए बनाए गये हैं। जैसे अच्छा वर मिलने के लिए आदि कुम्भेश्वर मंदिर, बुरी आत्माओं से मुक्ति के लिए अय्यावती मंदिर, पाप नाश के लिए पापनाशम मंदिर, धन प्राप्ति के लिए ओप्पाल्लि अप्पन मंदिर आदि। यहाँ के अनेक मंदिर यूनेस्को के द्वारा विश्व धरोहर के रूप में मान्यता प्राप्त हैं। होटल से लगभग दस किलोमीटर दूर आदि कुम्भेश्वर स्वामी मन्दिर है। ऐसी मान्यता है कि अमृत मंथन के समय अमृत के घड़े को कुछ समय के लिए इस स्थान पर रखा गया था। उसमें से अमृत की कुछ बूँदें इस स्थान पर छलक गई थीं, जिस कारण ये भूमि पावन हो गई। वहाँ पर महाधरम सरोवर है। इसलिए इस स्थान को कुम्भकोणम के नाम से जाना जाता है।

एक अन्य कथा के अनुसार सृष्टि बीज को बचाने के लिए परमेश्वर के कहने पर ब्रह्मा ने मिट्टी से एक मजबूत घड़ा बनाया और उसके अन्दर अमृत के साथ सृष्टि बीज रखा और उसे मजबूती से बाँध दिया। प्रलय काल में जब सब कुछ नष्ट हो गया, तब वह कुम्भ समुद्र में बहतें हुए दक्षिण भारत के तमिलनाडु राज्य के उस स्थान पर अटका जो आज कुम्भकोणम कहलाता है। तब नई सृष्टि की रचना करने के लिए घडे़ में से सृष्टि बीज को निकालने के लिए शिव स्वयं हिमालय पर्वत से नीचे उतरे। उन्होंने एक तीर मारकर उस घड़े को निशान लगाया। घड़े में तीर लगने से अमृत उस स्थान पर छलक गया। इसलिए उस स्थान को कुम्भकोणम कहा गया। कुम्भ माने घड़ा और कोणम माने नाक। यहाँ पर महाधरम सरोवर बन गया। इसी स्थान पर प्रत्येक बारह वर्ष में कुम्भ मेला लगता है।

महाधरम सरोवर में आदि कुम्भेश्वर के परिक्रमा मार्ग में भगवान सूर्य का मंदिर स्थापित है। मान्यता है कि सूर्य ने यहाँ भगवान शिव की आराधना की थी, जिसका एक चमत्कारी पहलू यह देखने को मिलता है कि नागेश्वर लिंग पर, वर्ष के किसी खास दिन सूर्य की किरणें पड़ती हुई देखी जा सकती हैं। मंदिर के पुजारी जी ने बहुत विश्वास के साथ हमें से बात बताई। इस पर अविश्वास करने को मुझे कोई कारण नजर नहीं आया।

शाम हो आई थी, इसलिए हमने कुम्भकोणम शहर के आसपास के मंदिरों में पूजा अर्चना की। जैसे, रामास्वामी मंदिर जो कि दक्षिण का अयोध्या कहलाता है। वहाँ की दीवारों में चारों ओर रामायण काल की चित्रकलाएँ देखी जा सकती हंै। राम के जन्म से लेकर रावण वध, लवकुश का राज्याभिषेक, सीता का पृथ्वी में समाना, पूरी रामायण को चित्रकारी के द्वारा प्रदर्शित किया गया है। फिर हमने स्वामी नाथ स्वामी, वाराह पेरुमल मंदिर, नवग्रह मंदिर कुम्भकोणम ब्रह्मा मंदिर, पाप नाशम शिव मंदिर और महाकालेश्वर मंदिरों में पूजा-अर्चना की। सुन्दरेश्वर शिवलिंग तथा मीनाक्षी देवी, जो कि माँ पार्वती हैं, की सुदर प्रतिमाओं के आगे घी के दीपक जलाये और मंदिर की परिक्रमा की।
अन्य मंदिरों के दर्शन दूसरे दिन करने की योजना बनाते हुए हम होटल लौट आये। मार्च के महीने में भी वहाँ इतनी गर्मी थी कि दिन में दो-तीन बार नहाना पड़ रहा था। हम पर्वतीय प्रदेश के लोगों के लिए तो ये आर्द्रता असहनीय थी, किन्तु उस पौराणिक व एंेतिहासिक स्थान को देखने को मन में बहुत उत्साह था। रात्रि भोजन के लिये राया रैस्टोरेंट गये तो वहाँ बहुत भीड़ थी। किन्तु उसके मालिक हमारे समधी को अच्छी तरह जानते थे। इसलिए उन्होंने हमारे लिए अच्छे स्थान की व्यवस्था कर दी। साफ-सुथरे केले के पत्तलों में हमने शुद्ध शाकाहरी दक्षिण भारतीय भोजन का आनन्द उठाया। मुझे दक्षिण भारतीय सभी व्यंजन पसन्द हैं। वहाँ खाने में मसालों का चयन और उसकी मात्रा का विशेष ध्यान रखा जाता है। इसलिए खाना आराम से पच जाता है।

एक बात मुझे वहाँ पर खास ध्यान देने योग्य लगी कि केले के पत्तल में खाना इस प्रकार नियोजित करके परोसा जाता है कि परोसने के ढंग से ही पता चल जाता है कि कौन तमिल है, कौन कोंकणी या मलयाली या कन्नड़। उन सभी का खाना परोसने का ढंग अलग-अलग है। रात्रि भोजन के बाद हमने कुम्भकोणम बाजार का लम्बा भ्रमण किया फिर होटल लौट आये।

दूसरे दिन सुबह जल्दी उठकर, नहाने धोने के बाद हमने काॅफी पी। यहाँ की काॅफी बहुत ही लाजवाब होती है। फिर कुम्भकोणम के आसपास के अनेक मंदिरों के दर्शन किये, जिनमें से नव ग्रह मंदिर, काशी विश्वनाथ मंदिर, नागनाथ स्वामी मंदिर व अय्यावती मंदिर प्रमुख थे। अय्यावती बुरी आत्माओं से मुक्ति के लिए प्रसिद्ध है। उस उिन हमें तंजावुर जाना था, इसलिए होटल वापस लौट आये। इडली, बड़ा तथा चटनी, साथ में काॅफी का नाश्ता काने के बाद तंजावुर के लिए रवाना हो गये।

कुम्भकोणम से तंजावुर लगभग चालीस किलोमीटर है। कावेरी नदी के किनारे-किनारे चलते हुए करीब पौने दो घन्टे में हम तंजावुर पहुँच गये। यह देखकर बहुत ही बुरा लगा कि महिमामयी कावेरी नदी पूरे मार्ग भर सूखी हुई थी। उसमें बिल्कुल पानी नहीं था। तंजावुर तमिलनाडु का एक जिला है, जो अपने मंदिरो क लिए प्रसिद्ध है। हम तंजावुर के कुछ प्रमुख स्थलों को देखने के बाद अपने गंतव्य स्थल बृहदेश्वर मंदिर पहुँच गये। बचपन से ही इस मंदिर को देखने की मेरे मन में इतनी तमन्ना थी कि उसे सामने देखकर मैं बच्चों की तरह चंचल हो गई। मैंने अपने समधी मिस्टर सम्पत कुमार और समधन विजया का आभार व्यक्त किया, क्योंकि उन्हीं की वजह से हमें ये सौभाग्य प्राप्त हुआ था।
बृहदेश्वर मंदिर सातवीं सदी के चोल नरेश राज राजा द्वारा बनवाया गया, भगवान शिव को समर्पित एक विशाल व भव्य मंदिर हैं, जो पूरा ग्रेनाइट पत्थर से निर्मित किया गया है। राज राजा द्वारा बनवाये जाने के कारण इसे राज-राजेश्वर मंदिर भी कहा जाता है। यह विश्व की विशालतम संरचनाओं में गिना जाता है, इसलिए यूनेस्को के द्वारा इसे विश्व धरोहर घोषित किया गया है। इसका गुम्बद इतना ऊँचा है कि इसकी परछाई पृथ्वी पर नहीं पड़ती। इसे तंजावुर के किसी भी कोने से देखा जा सकता है।

मंदिर के अन्दर जाकर पहले हमने नन्दी की विशाल प्रतिमा के दर्शन किये। फिर मंदिर मंे स्थापित शिवलिंग के दर्शन करने पर मुझे इसका बृहदेश्वर नाम सर्वथा उपयुक्त लगा, क्योंकि वह शिवलिंग विशाल व भव्य था। मंदिर में दर्शनों के बाद जब हम बाहर निकले तो पूर्णिमा की चाँदनी रात में, तेरह मंजिल ऊँचे इस मंदिर की विशालता, भव्यता, बनावट, वास्तुकला व शिल्पकला देखकर कुछ पलों के लिए हमारी आँखें स्थिर रह गईं। हम इसे स्तब्ध होकर निहारते रह गये। लौटते समय देखा कि इसकी दीवारों में तमिल लिपि में कुछ लिखा हुआ है। मैंने विजया से पूछा तो उन्होंने बताया कि मंदिर की सभी दीवारों में इसका इतिहास और श्लोक लिखे हुए हंै। उन्होंने कुछ अनुवाद करके हमें सुनाए। हम अभिभूत हो गये। मैंने इतनी यात्राएँ की हैं, किन्तु बृहदेश्वर मंदिर की यात्रा मैं कभी नहीं भूल पाऊँगी। उस दिन लौटते हुए बहुत देर हो गई, तो हमने रात्रि का भोजन कुम्भकोणम के ही रेस्टोन्ट में किया।

अगले दिन हम लोगों ने कुम्भकोणम के 25 से 35 किलोमीटर के दायरे में बने हुए विष्णु भगवान के अनेक मंदिरों, जैसे- चक्रपाणि, सारंगपाणि, उप्पलिप्पन (समृद्धि प्राप्ति का मंदिर), वाराह पेरुमल मंदिर, पेरुमल मंदिर, गाँगेय कोंडा, चोलापुरम मंदिर आदि। सभी मंदिर मंत्रमुग्ध करने वाले थे। उप्पलिप्पन मंदिर में हाथी को केले व खजूर खिलाये तो उसने हम सबको बारी-बारी से अपनी सूँड उठाकर आशीर्वाद दिया। मुझ जैसी डरपोक ने भी वहाँ बँधी हुई गायांे को घास के पुलिंदे (जो वहीं पर से खरीदकर लेने पड़ते हैं) और खजूर का एक पूरा पैकेट हाथी को खिलाया। हाथी को देखकर मेरी जान निकली जा रही थी और सब लोग मुझ पर हँस रहे थे।
इन तीन दिनों में हमने कुम्भकोणम ओर तंजावुर के बहुत से मंदिरों के दर्शन कर लिए थे, लेकिन वहाँ तो सौ से भी अधिक मंदिर हैं। इसलिए भविष्य में वहाँ फिर आने की सोचकर, दिन के भोजन के उपरांत हमने बंगालुरू के लिए प्रस्थान किया। लौटते समय मिस्टर सम्पत ने अपना घर (जहाँ वे बचपन में रहते थे), अपना स्कूल तथा काॅलेज सब दिखाये। उन्होंने बताया कि अंग्रेजों के समय में कुम्भकोणम ‘कैम्ब्रिज आॅफ साउथ इंडिया‘‘ कहलाता था। ये हमारे लिए नई जानकारी थी।

इस यात्रा से लौटते हुए मैं प्रकृति के साथ जुड़ाव महसूस करना चाहती थी। मार्ग में पड़ने वाले शहरों, नदियों, झाीलों व जंगलों से निकटता महसूस करना चाहती थी। कुम्भकोणम जाते समय विजया मुझे एक-एक स्थान के बारे में, उस तक पहुँचने से पहले ही जानकारी दे देती थीं। लेकिन इतनी विस्तृत जानकारी देती थीं कि मेरा ध्यान ही नहीं लग पाता था। मेरे लिए वह जानकारी आधी-अधूरी ही रही। तब मैंने महसूस किया कि यदि आपका ध्यान गहरा हो तो प्रकृति भी आपसे बात कर सकती है। तभी आप उसके साथ जुड़ाव महसूस करते हैं। कुम्भकोणम से लौटते हुए बहुत अधिक थकान के कारण जब सब लोग सो गये, तब केवल ड्राइवर और मैं जागे हुए थे। मैंने बहुत सुकून महसूस किया और गाड़ी से बाहर देखते हुए प्रकृति को निहारकर धीरे-धीरे उसमें जुड़ने लगी।

जिस कावेरी नदी की हम बातें कर रहे थे, मैने देखा, वह तो मार्ग भर सूखी हुई थी। मैं सोचने लगी कि तमिलनाडु और कर्नाटक राज्य इसी कावेरी नदी के पानी के लिए आपस में लड़ रहे हैं। या ये उनकी राजनौतिक लड़ाई है ? जो थोड़ा-बहुत पानी उसका बचा हुआ है, उसकी रक्षा के लिए कोई ठोस कदम क्यों नहीं उठाते ? जैसे तमिलनाडु के कोयम्बटूर में ईशा फाउण्डेशन के सन्त जग्गी वासुदेव (सद्गुरु) प्रकृति को बचाने के लिए वृक्षारोपण जैसे अनेक कार्य कर रहे हैं। कावेरी ओर अरासालर नदियों से घिरे हुए ये शहर कितने खूबसूरत है ? इस कावेरी नदी के कारण ये भूमि इतनी उपजाऊ थी कि ये स्थान पहले दक्षिण का ‘धान का कटोरा‘ कहलाता था। यदि इसी तरह ये नदियाँ सूख गई तो यहाँ के पर्यटन को, किसानो को कितना नुकसान होगा ? यही सब सोचते-सोचते रात के करीब नौ बजे हम बंगालुरू पहुँच गये।

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