वन कानून में बदलाव किसके लिए ?


nainitalsamachar
April 3, 2019

भारतीय वन अधिनियम 1927 वन कानूनों में सबसे प्रमुख व पुराना है। यह कानून पूरी तरह औपनिवेशिक काल की आवश्यकताओं, जैसे कि स्थानीय जनता के अधिकारों के दमन तथा अधिक राजस्व की प्राप्ति के उद्देश्यों की पूर्ति के लिए बना था। इसके लागू होने से ग्रामवासी वनों में अधिकार से वंचित हो गये थे। कई स्थानों पर, विशेष कर कुमाऊँ में पं. गोबिंद बल्लभ पंत की अगुवाई में पिछली सदी के दूसरे व तीसरे दशक में, इस कानून के विरुद्ध संगठित आंदोलन हुए। चिपको आंदोलन भी इसी कानून से उपजी विकृतियों के ही विरुद्ध ही था। इसलिए इस कानून में बदलाव की मांग, मुख्यतः इसकी जनविरोधी धाराओं को समाप्त करने के लिये, बार-बार उठती रही है।वन कानून से वंचित लोगों को उनके वन अधिकार दिलवाने के लिए मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार के कार्यकाल में देश में वन अधिकार कानून 2006 लागू हुआ। इसे लागू करवाने का श्रेय वन आंदोलन संगठनों की सक्रियता को दिया जाता है। इस कानून में वनवासियों व वनों पर निर्भर समुदायों को वनों में वे अधिकार प्रदान किये गये हैं, जिन्हें पहले मान्यता नहीं दी गई थी। इस कानून की सबसे प्रमुख व्यवस्था यह है कि तीन पीढ़ियों से किसी वनभूमि पर काबिज परिवार को उस जमीन पर मालिकाना अधिकार मिलेगा। यदि यह कानून पूरे देश में प्रभावशाली तरीके से लागू हो जाता तो सरकारों के वनों में मनमाने तरीके से काम करने पर रोक लग जाती और वन भूमि को कार्पोरेटों को थमा देने के षड़यंत्र पर लगाम लग जाता। जाहिर है कि यह कानून कार्पोरेटों और वन महकमे की आंख की किरकरी बना हुआ है। 2014 में देश में विकास के नाम पर एनडीए की सरकार सत्ता में आयी। परन्तु विकास की आड़ में उसने जरूरत पड़ने पर जगह-जगह वनों को गैर वन घोषित कर दिया। तमाम आपत्तियों को दरकिनार कर उद्योगों को बेरोकटोक पर्यावरणीय स्वीकृति देने की प्रक्रिया तेज कर दी। पर्यावरणीय स्वीकृति के लिए सारे वन कानून की जगह पर एक कानून, जो कि प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अधीन होता, का मसौदा तैयार करवाया। इसे टी.एस.आर. सुब्रमनियम समिति की रिपोर्ट के नाम से जाना जाता है। इसकी अतार्किकता के कारण संसद की समिति ने इसे संसद में पेश होने से पहले ही रद्द कर दिया। इसके बाद प्रतिपूरक वनीकरण कोष (कैम्पा), जिसमें हजारों करोड़ रुपया जमा हो चुका है, के उपयोग के लिए एक कानून बनाया। परन्तु इसमें भी स्थानीय समुदायों, जिन्हें वन कानूनों के अंतर्गत अधिकार प्राप्त हैं, को कैम्पा के क्रियान्वयन से वंचित कर दिया। कुछ ही सप्ताह पहले सरकार की बेरुखी के कारण सर्वोच्च न्यायालय द्वारा 10 लाख आदिवासियों को उनके जमीन से बेदखल करने के आदेश दे दिये गये, जिन्हें वन अधिकार संगठनों के प्रबल विरोध के कारण फिलहाल स्टे आॅर्डर दे दिया गया है। ये कुछ चुनिन्दा उदाहरण हैं, जो केन्द्र सरकार की इस मंशा को समझने के लिये पर्याप्त हैं कि वन प्रबंधन को संशोधित करने की आड़ में वह वनवासियों के अधिकारों को छीनना चाहती है और वनों को काॅरपोरेटों को सौंपने का रास्ता आसान करना चाहती है।
इसी क्रम में अभी 7 मार्च 2019 को भारत सरकार के वन मंत्रालय ने एक नये वन कानून, जो कि 1927 के वन कानून का स्थान लेगा, का प्रस्ताव सभी प्रदेशों के वन प्रमुखों को जारी किया है। उनसे 9 जून तक इसमें टिप्पणी व सुझाव मांगे गये हैं। यह प्रयास वनवासियों के अस्तित्व के लिये सबसे अधिक घातक हो सकता है।इस नये वन कानून के प्रस्ताव को राज्यों को भेजने का समय ही चैंकाता है। इस वक्त जब पूरे देश में आचार संहिता लगी हुई है, जनता अजीबोगरीब चुनावी मुद्दो में उलझी हुई है, ठीक उसी अवधि में चुपचाप से इस प्रस्ताव पर वनाधिकारियों से सहमति मांगने का मतलब है कि इस षड़यंत्र पर जनता की नजर ही न पड़े, कोई चर्चा न हो और इस कानून का कोई विरोध न हो।सबसे पहले इस कानून के घोर आपत्तिजनक व दमनकारी प्रावधानों की चर्चा कर लें, जिन को लेकर वनाधिकार संगठन विचलित हैं-
1. धारा 66(2):- यदि वनक्षेत्र में किसी व्यक्ति को संदिग्ध स्थिति में देखें तो वनकर्मी (कम से कम नुकसान पहंुचाते हुए ?) गोली चला सकते हैं। ऐसे वनकर्मी केे विरुद्ध इस काम के लिए कोई आपराधिक कार्रवाही नहीं की जायेगी। इस प्रस्ताव की तुलना बेहद दमनकारी ‘सशस्त्र सेना विशेष अधिकार कानून (आस्फा)’ से की जा रही है, जो देश के अशान्त क्षेत्रों (जम्मू-कश्मीर, पूर्वोत्तर राज्यों आदि) में लागू है, जिसका विरोध किया जाता रहा है व जिसे हटाने की लगातार मांग होती रही है। मणिपुर में ईरोम चानू शर्मिला ने इस काले कानून को हटाने के लिये एक 16 वर्ष तक उपवास कर सारी दुनिया का ध्यान इसकी ओर खींचा था।
2. धारा 26(3):- यदि किसी वन में आग आदि से कोई क्षति हो जाये तो सभी संबंधित हकधारियों को सामूहिक दंड दिया जा सकता है।
3. धारा 30(बी):- यदि रक्षित वन क्षेत्रों में वन कम हो जायें तो ग्रामवासियांे के हक-हकूक बंद किये जा सकते हंैं।
4. धारा 29(3):- यदि ग्रामवासी किसी संबंधित लाभकारी योजना का लाभ उठा रहे हैं, तो उनके वन अधिकार समाप्त किये जा सकते हैं।
5. धारा 34(3):- झूम खेती, जिसे कि पर्यावरणसम्मत माना गया है, को बंद किया जा सकता है।
6. धारा 28(1):- यदि सरकार की दृष्टि में जरूरी हो तो वह स्थानीय निकायों के जंगल और पंचायती वनों को अपने अधिकार में ले सकती है।
ये आपत्तियां प्रथम दृष्टया पायी गयीं हैं। हो सकता है कि और गहराई में जाकर कुछ अन्य विसंगतियाँ सामने आयें। क्योंकि कहा जा रहा है कि इन प्रावधानों में वनक्षेत्रों से निवासियों को विस्थापित करने के अधिकार, वनों में वनीकरण व वृक्षारोपण के लिए निजी कंपनियों को सौंपने जैसे अधिकार भी दिये गये हैं। इससे वन विभाग के अधिकारियों को एक तानाशाह के समान ताकत मिल जायेगी। यह राहत की बात है कि वनाधिकार संगठनों ने बगैर देर किये, समय रहते ही इन प्रस्तावों के विरुद्ध जन जागरूकता फैलाना शुरू कर दिया है।
उत्तराखंड में वन विभाग सबसे बड़ा जमींदार है, क्योंकि यहाँ के कुल 58,483 वर्ग किमी. के 70 प्रतिशत से अधिक, यानी 38,000 वर्ग किमी. पर उसका स्वामित्व है। परन्तु दुर्भाग्य है कि वन क्षेत्रों के दूरदराज इलाकों में होने केे कारण इसके भ्रष्टाचार सामने आते ही नहीं। न ही वनों की बिगड़ती हालत के बारे में आम जनता को पता चल पाता है। यह विभाग अंग्रेजों के जमाने में वनों से अधिक से अधिक लाभ कमाने के एकमात्र उद्देश्य से बना था। मनुष्य को वनों की कितनी जरूरत है और किस तरह उसका जीवन वनों पर निर्भर है, इस सच्चाई को उस कानून में पूरी तरह नजरअंदाज किया गया था। दुर्भाग्यवश आजादी के बाद भी इसके स्वरूप और तौर तरीकों में कोई बदलाव नहीं आया। औपनिवेशिक शासन के समाप्त होने के बाद भी हमारी सरकारें उस जन विरोधी वन कानून को बचाने में सफल रहे। 1952 और 1988 में लागू दो वन नीतियों के बाद भी वन विभाग की कार्यप्रणाली में कोई अंतर नहीं आया।
भारत में वन विभाग सम्भवतः सबसे अधिक भ्रष्ट और निरंकुश विभाग के रूप में स्थापित है। भ्रष्टाचार इस कदर हावी है कि इसके मूलतः एक तकनीकी विभाग होने के बावजूद इसकी कार्यप्रणाली पूरी तरह नौकरशाही में बदल गयी है। समस्याओं से निबटने में कुछ भी नयापन नहीं दिखता। विभाग की शोभा बढ़ाने वाले उच्च अधिकारियों की संख्या नियत संख्या से तीन गुनी है और जमीन पर काम करने के लिये बेहद जरूरी फाॅरेस्ट गार्ड आधे से भी कम हैं।
चिपको आंदोलन व देश भर में चले अन्य वन आंदोलन केवल वन विभाग की गलत कार्यप्रणाली के विरुद्ध विद्रोह थे। पर इस आंदोलन को सरकार ने इस तरह घुमा दिया कि 1981 में 1000 मी. से अधिक ऊँचाई के क्षेत्रों में हरे पातन पर रोक लगाने पर आंदोलन समाप्त हो गया। वन अधिकार का पूरा विषय विमर्श से ही गायब हो गया। चिपको आंदोलन के शीर्ष नेता वन विभाग के की ‘गुड बुक्स’ में आ गये। राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय ख्याति पा चुके ये नेता वन निगम के माथे पर सारा दोष मढ़ देने के साथ ही वन विभाग को क्लीन चिट देने लगे। 1996-ं97 में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा ‘गोंडा बर्मन बनाम भारत सरकार’ मामले में चंडी प्रसाद भट्ट ने कहा था कि वन निगम देश का सबसे भ्रष्ट विभाग है। हो सकता है, वह हो भी। परन्तु वन विभाग के विरुद्ध उन्होंने कुछ भी नहीं कहा। जब कि मामला वन संरक्षण अधिनियम 1980 की व्याख्या को लेकर था, जिसका वन निगम से कोई प्रत्यक्ष वास्ता नहीं था। इसी केस में बनी समिति, जिसमें वे भी एक प्रमुख सदस्य थे, ने जो संस्तुतियां दीं, उनसे वन विभाग में भ्रष्टाचार और उसकी निरंकुशता कम होने के बजाय बढ़ी।
जरूरी है कि नये वन कानून की विवेचना के साथ ही नये सुझावों पर वन सरोकार से जुड़े कार्यकर्ता व्यापक अध्ययन और चर्चा करें। सतही अनुमानों या विरोध से काम नहीं चलेगा। इससे सिर्फ संदर्भ भटकेगा। जो आन्दोलन खड़ा हो, उसका नेतृत्व किसी एक व्यक्ति के पास न हो। वह सामूहिक रहे। केवल वन कानून बना देने या रोक देने से वन नहीं सुधरेंगे। न ही कागजी बाजीगरी से वनों पर निर्भर समुदायों की स्थिति सुधरेगी। आज वनों की सबसे बड़ी समस्या है उनका तेजी से अवनत होना। उनकी उत्पादकता भी तेजी से घट रही है और विविधता भी, जिससे जो पारिस्थितिकीय उपादान व लाभ मिलने चाहिये थे, वे नहीं मिल रहे हैं। वनों की विविधता घटने से इनके मोनोकल्चर में बदल जाने या फिर अनुर्वर हो जाने की आशंका है।
एक आश्चर्यजनक, मगर दुःखद तथ्य है कि हमारे पास वनों के संबंध में कोई प्रमाणिक आंकड़े तक नहीं हैं। वन सर्वेक्षण विभाग से जो द्विवर्षीय आंकड़े जारी होते हैं, वे किसी काम के नहीं हैं। इसलिए वनों की स्थिति पर एक ‘श्वेत पत्र’ बनना बेहद जरूरी है, ताकि समस्या को पूरी तरह समझा जा सके। तभी समस्या का निवारण करने के लिए उपचार भी तय होंगे। तभी पता चलेगा कि कितना वन कानून को ठीक करने से काम चलेगा, कितना अन्य तौर-तरीकों, प्रक्रियाओं को ठीक करने से। यह एक बहुत बड़ा अवसर है कि वन कानून को दमनकारी बनाने के सरकारी प्रयासों के विरोध करने के साथ-साथ हम वनों की पूरी स्थिति को सामने लायें और समस्या जड़ से समझें। इस आन्दोलन के बहाने एक आमूल-चूल बदलाव की आधारशिला रखी जाये।
जलवायु परिवर्तन के खतरों के कारण जंगल अब केवल वनों पर प्रत्यक्ष रूप से निर्भर समुदायों की चिंता का विषय नहीं रह गये हैं। प्रकृति की सबसे बड़ी धरोहर होने के कारण वन पूरे देशवासियों और विश्ववासियों को प्रभावित कर रहे हैं। जलवायु परिवर्तन स्वास्थ्य सुरक्षा और भोजन सुरक्षा को तबाह कर सकता है। इसलिए सरकारों द्वारा सत्ता में बने रहने के लिए वनों को कार्पोरेटों को सौंपने के प्रयास का विरोध करने के साथ इस विरोध को व्यापकता भी दी जानी चाहिये। पिछली गलतियों से सबक लेकर एक नया वन आंदोलन खड़ा करना चाहिये, जिसमें सिर्फ वनवासियों की नहीं, बल्कि पूरे देश के नागरिकों की भागीदारी हो। इस बात को साफ-साफ रेखांकित करना होगा कि वन और प्रकृति किसी एक के निजी स्वार्थ के लिए नहीं हैं, बल्कि जन कल्याण का आधार हैं।

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