विराज कुंजः सहकारी उद्यमिता का सफल उदाहरण


अरुण कुकसाल
May 2, 2019

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ऋषिकेश-बद्रीनाथ (296 किमी) राष्ट्रीय राजमार्ग पर कर्णप्रयाग से 12 किमी. आगे एक गांव है ‘ढुंगल्वाली’। वर्ष 1992 की 1 मई को ‘अतंरराष्ट्रीय मजदूर दिवस’ की अहमियत को साकार करते हुए ‘ढुंगल्वाली’ गांव के तीन युवाओं (विनोद कोठियाल, राजेन्द्र सिंह नेगी और जगदम्बा प्रसाद कोठियाल) के अपने और संपूर्ण क्षेत्र के सर्वागींण विकास के लिए रखे ‘नींव का ढुंग’ (पत्थर) के बदौलत हजारों परिवारों में खुशहाली आई है।

बात अप्रैल, 1992 की है। ‘ढुंगल्वाली’ गांव के उच्च शिक्षा प्राप्त युवा विनोद और राजेन्द्र रोज जीवकोपार्जन के तमाम विकल्पों पर चर्चा करते थे। तब उनका यह भी मानना था कि गांव में रहकर यथा-योग्य रोजगार पाना बेहद कठिन है। इसलिए देर-सबेर उन्हें जीवकोपार्जन के लिए देश के महानगरों की ओर जाना ही होगा। परन्तु मन के किसी कोने में यह आस भी थी कि गांव में रहकर भी बहुत-कुछ किया जा सकता है। खेती, पशुपालन, फल-सब्जी और जड़ी-बूटी उत्पादन, तीर्थयात्रा से जुड़कर वे रोजगार की संभावनाओं को विचार-विमर्श में तलाशते। राष्ट्रीय राजमार्ग से अपने गांव के जुड़े होने की सार्थकता से वे वाकिफ थे। उन्हें बस उद्यमीय अवसरों की तलाश थी। उनकी बातचीत घट गधेरा के पास तुन के विशालकाय पेड के नीचे बने सड़क के मुंडेर पर होती थी। वे अक्सर देखते कि आने-जाने वाली प्राईवेट गाड़ियां के यात्री पेड की छाया और गधेरे के पानी से आकर्षित होकर कुछ देर के लिए रुक जाया करते हैं। संयोग से किसी समझदार पर्यटक ने उनसे चलते-चलते कह दिया कि पहाड़ के गढ़वाली कस्बों की भीड़-भाड से अलग हटकर यहां पर खाने का ढ़ाबा होता तो कितना आनंद आता।

विनोद और राजेन्द्र को लगा कि अब सोचने का नहीं वरन काम करने का वक्त है। बस फिर क्या था, अगले दिन प्रातः से ही गैंती, फावड़ा, कुदाल, बेलचा लेकर घट गधेरे के पास वाली जमीन पर ढ़ाबा निर्माण का कार्य शुरू हो गया। गांव का एक अन्य साथी जगदम्बा भी उनके इस काम में साझेदार हो गया। गांव में विभिन्न घरों में जहां-तहां रखे मेज, कुर्सी, स्टूल, बैंच, मोढे़, टेंट, तिरपाल, सूखी घास, डंडे, रस्सियां, बर्तन, स्टोव और आपसी बचत के 1 हजार रुपये से राशन लाकर शाम तक ढ़ाबा चालू भी कर दिया। इस नवजात ढ़ाबे को उन्होने अपने नाम के पहले अक्षर को मिलाकर ‘विराज’ (विनोद, राजेन्द्र और जगदम्बा) नाम दिया। जगदम्बा ने रसोइया का तो विनोद और राजेन्द्र ने ग्राहकों को खाना परोसने और बर्तन धोने-साफ करने का जिम्मा ले लिया। तीनों की साझी मेहनत रंग लाई। पहले सप्ताह ही उन्होने अपनी कार्यशील पूंजी 10 हजार रुपये तक बढ़ा ली थी।

दो-चार दिनों में ही विराजकुंज में निजी वाहनों से लेकर ट्रकों की लाइन लगने लग गई। टोकन सिस्टम चालू करना पड़ा।अच्छी बात यह भी हुई कि नजदीकी गांव-इलाके युवा भी अपने खेतों और बगीचों के उत्पाद को बेचने के लिए विराजकुंज के आस-पास आने लगे। नतीजन 1 माह में ही 15 लोगों के विभिन्न काम-धन्धे यहां पर शोभायमान हो गये।

विनोद, राजेन्द्र और जगदम्बा ने इस उभरते हुए बाजार को तुरंत एक व्यवस्थित रूप देना शुरू किया। उन्होने स्थानीय उत्पादों से बने पकवानों को वरीयता देकर ग्राहकों में उन्हें लोकप्रिय बनाया। विराजकुंज को मांस-मदिरा से पूर्णतः वर्जित रखा। पहाड़ी अनाज, दाल, मसाले, बीज, जड़ी-बूटी, पेय पदार्थ की आकर्षक पैकिंग करके उसे उचित दाम पर बेचना शुरू किया। ‘विराज कुंज’ की लोकप्रियता का आलम यह था कि सीजन समाप्त होने के बाद भी स्थानीय लोगों के लिए यह मनपंसद जगह बन गई थी।

गढ़वाल में कस्बों से हटकर एकांत स्थान में ढ़ाबा चलाने का प्रारंभिक श्रेय ‘विराज कुंज’ को है। ‘विराजकुंज’ को फलीभूत करने में तत्कालीन पर्वतीय विकास सचिव डाॅ. आर. एस. टोलिया का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। उन्हीं के प्रयासों से मूलभूत अवस्थापना सुविधाओं को विराजकुंज में उपलब्ध हो पाई थी।

सहकारिता की भावना को आगे बढ़ाते हुए इन युवाओं ने पर्यावरण संरक्षण, आपदा प्रबंधन, तकनीकी एवं व्यावसायिक प्रशिक्षण केन्द्र के रूप में विराजकुंज को विकसित किया है। आज 20 से अधिक विभिन्न व्यावसायिक इकाईयां इस स्थल पर सफलतापूर्वक कार्य कर रही हैं। पहाड़ी ग्रामीण परिवेश में उद्यमिता और सहकारिता की इस सफल कहानी को उत्तराखंड विद्यालयी शिक्षा के कक्षा-8 की सामाजिक विज्ञान की पाठ्यपुस्तक में एक पाठ के रूप में शामिल किया गया था। वाकई, आज विराजकुंज की पहचान एक व्यावसायिक स्थल के साथ-साथ ‘समग्र ग्रामीण विकास केन्द्र की भी है।

अरुण कुकसाल

अरुण कुकसाल विभिन्न क्षेत्रों में सेवाएँ देने के बाद स्वैच्छिक सेवा निवृति लेकर अब स्थायी रूप से श्रीनगर में रहते हैं और सामाजिक कार्यों व स्फुट लेखन में व्यस्त हैं.